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सैनिटरी पैड, जो किसी भी महिला के लिए एक ज़रूरी चीज़ की श्रेणी में आना चाहिए वह सैनिटरी पैड आज भी एक औरतों के एक बड़े तबके के लिए लग्ज़री के समान है। नैशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 2015-16 के मुताबिक सिर्फ 36 फीसद भारतीय महिलाएं सैनेटरी नैपकिन का इस्तेमाल करती हैं। बाकी महिलाएं पुराने कपड़े, मिट्टी, पत्ते जैसी चीज़ों का इस्तेमाल करती हैं। 36 फीसद के साथ भारत थाईलैंड, इंडोनेशिया और चीन इन सभी देशों से पीछे है जहां लगभग 50 फीसद महिलाएं सैनेटरी नैपकिन का इस्तेमाल करती हैं। लेकिन सवाल ये है कि आखिर क्यों भारत की एक बड़ी आबादी की पहुंच में सैनिटरी पैड आज भी नहीं है?

इसकी एक बड़ी वजह यह है कि भारत के अधिकांश हिस्सों में सैनेटरी पैड मिलते ही नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के साल 2017 के एक सर्वे के मुताबिक लगभग 43 फीसद भारतीय महिलाओं को पीरियड्स के दौरान सैनेटरी पैड मिल ही नहीं पाते। इन महिलाओं को पैड क्यों नहीं मिल पाते? इसमें सरकार की क्या गलती है, आइए इसे समझने की कोशिश करते हैं। 

यह सुनिश्चित करने के लिए की सैनेटरी नैपकिन ज्यादा से ज्यादा महिलाओं तक पहुंचे, सरकार ने कई कदम उठाए हैं। साल 2011 में भारत सरकार ने मासिक स्वास्थ्य रक्षा योजना की शुरुआत की थी। इस योजना के तहत सरकार ग्रामीण इलाकों में रहनी वाली लड़कियों तक सैनेटरी पैड पहुंचाना चाहती थी। इस योजना के अलावा समय-समय पर सरकार ने और भी कई योजनाएं निकाली हैं। जैसे साल 2018 में ओडिशा सरकार ने कालिया योजना शुरू की ताकि स्कूली छात्राओं को निशुल्क पैड मिल सके।  लेकिन जैसा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े बताते हैं, इतनी सारी योजनाओं के बावजूद भी सैनेटरी पैड भारतीय लड़कियों और महिलाओं तक नहीं पहुंच पाते। आखिर सरकार कहां चूक रही है?

लंबी सरकारी प्रक्रियाएं और सीमित फंड

सरकारी योजनाओं की लंबी प्रक्रियाओं और सीमित फंड्स के कारण सैनेटरी पैड की नियमित सप्लाई नहीं हो पाती। मासिक स्वास्थ्य रक्षा योजना और दूसरी योजनाओं के अंतर्गत सैनेटरी पैड की प्राप्ति ‘कॉम्पिटिटिव बीडिंग’ के ज़रिए होती है। इस पूरी प्रक्रिया के तहत टेंडर जारी किया जाता है, आवेदकों को बुलाया जाता है और जो आवेदक कम से कम कीमत पर सारी जरूरतों को पूरा कर देता है उसके साथ एक करार किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया के बाद ही सैनेटरी नैपकिन्स की सप्लाई शुरू हो पाती है। अक्सर इस पूरी प्रक्रिया में बहुत समय लग जाता है। इसी कारण सैनेटरी पैड की नियमित सप्लाई नहीं हो पाती। 

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जब तक सेनेटरी पैड औरतों तक नहीं पहुंच पाएंगे और महिलाएं कपड़े, राख, पत्तों जैसी चीज़ों का इस्तेमाल करने को मजबूर रहेंगी।

उदाहरण के तौर पर साल 2016 में दिल्ली सरकार स्कूलों में सैनेटरी नैपकिन्स की सप्लाई इसलिए शुरू नहीं करवा पाई क्योंकि कोई भी योग्य आवेदक नहीं मिला। जहां तक रही सीमित फंड्स की बात, कर्नाटक सरकार की SUCHI योजना, जिसके द्वारा सरकार किशोरी लड़कियों तक निशुल्क सेनेटरी पैड पहुंचाना चाहती थी, पैसों की कमी की वजह से रुक गयी।

वितरण की समस्या

जिन माध्यमों के ज़रिए सैनेटरी पैड का वितरण किया जाता हैं, उनमें भी काफी समस्याएं है। सैनेटरी पैड को अधिकतर स्कूलों और आंगनवाड़ी केंद्रों के ज़रिए बांटा जाता है। इस वजह से सैनेटरी पैड की नियमित सप्लाई नहीं हो पाती।  स्कूल और आंगनवाड़ी केंद्र हर समय नहीं खुले होते। लेकिन पीरियड्स ये सब देख कर नहीं आते। ऐसी परिस्थितियों में लड़कियों को मज़बूरी में, सैनेटरी नैपकिन के अभाव में न चाहते हुए भी, पुराने गंदे कपड़े, पत्ते, राख जैसी चीज़ों का इस्तेमाल करना पड़ता है।

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स्कूल और आंगनवाड़ी केंद्रों की इन समस्याओं को समझते हुए सरकार ने साल 2016 में प्रधानमंत्री जनऔषधि परियोजना की शुरुआत की। इस योजना के तहत सैनेटरी पैड का वितरण जन औषधि केंद्रों से शुरू किया गया। बाकी दूसरी योजनाओं की तरह, ये योजना भी ज्यादा सफल नहीं हो पाई। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक साल 2019 में त्रिपुरा, मणिपुर और गोवा के जन औषधि केंद्रों से सैनेटरी पैड की कोई बिक्री नहीं हुई और हिमाचल प्रदेश में सिर्फ़ 80 यूनिट्स की ही बिक्री हुई।  जन औषधि केंद्रों से सैनेटरी पैड्स बांटने की और भी चुनौतियां है। इन केंद्रों से वो महिलाएं पैड नहीं खरीद पाती जिन्हें पैड के बारे में कोई जानकारी नहीं है या जिन्होंने कभी इनका इस्तेमाल ही नहीं किया।

कई बार देखा गया है कि जिन स्टेकहोल्डर्स पर सैनेटरी पैड को बांटने की जिम्मेदारी है वे भी अपनी जिम्मेदारियां ठीक से नहीं निभा पाते। इस कड़ी में आशा वर्कर्स एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं जिनके ज़रिये सरकार महिलाओं और लड़कियों तक सैनेटरी पैड पहुंचा पाती है। हालांकि इसमें भी कई लापरवाहियां सामने आती रहती हैं। साल 2017 कि हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, हजारों सैनेटरी नैपकिन्स एक सिविल हॉस्पिटल के बहार फेंके हुए मिले। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि आशा वर्कर्स ने उनका वितरण नहीं किया था। इन कामों में जुटी आशा कर्मचारियों की भी अपनी चुनौतियां हैं। PGIMER, चंडीगढ़ की साल 2016 में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक आशा कर्मचारी पैड बांटने के बदले मिलने वाली राशि से संतुष्ट नहीं हैं       

भारतीय महिलों और लड़कियों को सेनेटरी पैड न पहुंच पाने के पीछे बहुत सारी वजहें हैं। जब तक सरकारें इन सारी समस्याओं को सोच समझकर, योजनाबद्ध तरीके से सुलझाने की कोशिश नहीं करेगी तब तक इस समस्या का पूरी तरह समाधान नहीं हो पाएगा। जब तक सेनेटरी पैड औरतों तक नहीं पहुंच पाएंगे और महिलाएं कपड़े, राख, पत्तों जैसी चीज़ों का इस्तेमाल करने को मजबूर रहेंगी।

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तस्वीर साभार : livelaw

Sonali is a lawyer practicing in the High Court of Rajasthan at Jaipur. She loves thinking, reading, and writing.

She may be contacted at sonaliandkhatri@gmail.com.

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