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अगर कभी कोई हमसे उनके साथ हुई यौन हिंसा या यौन शोषण के अनुभव को बांटता है तो अक्सर हमारे पास उन्हें कहने के लिए तसल्ली देने वाले शब्द नहीं होते या होते भी है तो हम उन्हें अपने शब्दों से चैन कम और दुःख ज्यादा देते हैं। आज हम अपने लेख के ज़रिये आपको बताएंगे वे 9 बातें जो हमें यौन हिंसा के सर्वाइवर को नहीं कहनी चाहिए।

जो तुम्हारे साथ हुआ है वैसा हम सब के साथ हुआ है, इसमें कुछ विशेष बात नहीं है।

आज हम एक ऐसी दुनिया में रहते है जहां लिंग आधारित यौन शोषण एक बहुत ही सामान्य बात है। इसी वजह से हम यौन शोषण के सर्वाइवर के अनुभवों को इतनी तवज्जो ही नहीं देते जब तक कि वो कोई दिल दहला देने वाला हादसा न हो। अगर कोई सर्वाइवर अपना अनुभव हमसे बांटता भी है, तो हम उसे तुरंत ही अपना अनुभव सुना देते हैं। ऐसा करके हमें लगता है कि हम उन्हें तसल्ली दे रहे है लेकिन वास्तविकता तो यह है कि अपना अनुभव सुनाकर हम उनके जख्मों की गहराई को खारिज़ कर देते है।

लेकिन तुम ऐसी हिंसा करने वाले के खिलाफ कोई कानून कार्रवाई क्यों नहीं करती?

हम सभी ये जानते है कि यौन हिंसा के मामले अगर कोर्ट पहुंच भी जाए, तो ऐसे मामलों में फैसले आने में कई साल लग जाते हैं। खासतौर पर तब जब पीड़िता या सर्वाइवर निचले सामजिक और आर्थिक तबके से आती है। अगर मामले में ट्रायल शुरू भी हो जाए तो पीड़िता को उस घाव से बार-बार गुजरना पड़ता है, इतना की न्याय पाने की प्रक्रिया ही एक सजा बन जाती है। यौन हिंसा के सर्वाइवर के चरित्र पर उंगलियां उठाई जाती हैं, गिरफ्तार कर लिया जाता है, जान से मारने की धमकियां दी जाती हं, हत्या तक कर दी जाती है। हमारा पूरा सिस्टम उसे न्याय देने की जगह उसी को कष्ट पहुंचाता है। ऐसे में हमें सर्वाइवर को कानून का दरवाजा खटखटाने की सलाह खुद नहीं देनी चाहिए।

तुम अब कभी पूरा महसूस नहीं कर पाओगी।

ऐसा कहकर हम सर्वाइवर को यह महसूस करवाते है कि उनके लिए अब बिना दर्द की जिंदगी जीना लगभग नामुमकिन हो जाएगा। हम सर्वाइवर के पूरे अस्तित्व को उसकी लैंगिकता तक सीमित कर देते है और उनसे उनकी जिंदगी में आगे बढ़ने का अधिकार छीन लेते है।    

क्या सच में ऐसा ही हुआ था, क्योंकि तुम्हे पूरा हादसा याद नहीं है?

जब भी कोई सर्वाइवर अपने उस हादसे के बारे में बताता है तो यह अपने आप में एक बहुत ही ट्रिगररिंग प्रक्रिया होती है जो सर्वाइवर को बहुत ही ज्यादा भावनात्मक रूप से कमजोर कर देती है। ऐसे में जो लोग सर्वाइवर को सुन रहे हैं उनका साथ उस समय बहुत ही जरूरी होता है। लेकिन अफ़सोस की बात तो यह है कि हमारी कानूनी प्रणाली और समाज उसे सहारा देने की जगह सर्वाइवर के पूरे अनुभव पर ही सवालिया निशान लगा देते है।    

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तुमने ये सब बताने में इतनी देर क्यों लगा दी?

यौन हिंसा की सच्चाई को स्वीकारने में काफी समय लगता है। ऐसे हादसों से उभरने में ही पीड़िता को काफी वक़्त लग जाता है और उसी के बाद ही यह सब सोचा जा सकता है कि उसके साथ क्या हुआ, क्यों हुआ और उसे उसकी शिकायत करनी चाहिए या नहीं। इन सब में वक़्त लगता है और इसीलिए पीड़िता से यह उम्मीद रखना बहुत ही गलत होगा कि वो हादसा होते ही उसकी रिपोर्ट करवा देगी। इसके अतिरिक्त अगर हिंसा करने वाला कोई शक्तिशाली पद पर हो या पीड़िता को सपोर्टिव माहौल न मिले या उसे क़ानूनी मदद न मिले, तो भी उसके लिए इस अनुभव के बारे में बताना मुश्किल हो जाता है। हमें ये भी समझना चाहिए कि पीड़िता के पास ये पूरा अधिकार है अपने अनुभव के बारे में बताने या न बताने का, कब बताने का और कैसे बताने का।   

“अगर तुम एक नारीवादी हो तो तुम्हें अपनी कहानी को सार्वजनिक करना चाहिए।

ये हो सकता है कि नारीवादी महिलाओं को अपने साथ हुए यौन शोषण के बारे में बताने में बहुत ज्यादा झिझक न हो,  लेकिन सार्वजनिक रूप से अपने इस अनुभव के बारे में बताने का मतलब होता है बेमतलब के सवालों का सामना करना, अपने करियर और बाकी दूसरे रिश्तों को खतरे में डालना, मानहानि के केस का खतरा मोल लेना, वगैरह-वगैरह। इसलिए ये जरूरी नहीं है कि हर नारीवादी महिला अपने अनुभव को सार्वजनिक रूप से बताना चाहेगी।

“मैंने सोचा कि तुम लोग किसी रिश्ते में थे।”

ये कहना या सर्वाइवर की वैवाहिक स्थिति की आड़ लेकर उसके अनुभवों को रफा-दफा करना बेहद ही समस्या-ग्रसित एप्रोच है। कई बार ऐसी हिंसा करने वाले लोग पीड़िता के करीबी लोग ही होते हैं। लेकिन समाज हमें सिखाता है इस प्रकार की हिंसा को किसी ‘गैर’ से, ‘अनजाने’ व्यक्ति से, ताकि हमें सहमति, शादी में होने वाले रेप, हमारे अपनों द्वारा किये गए यौन शोषण आदि पर बात ही न करनी पड़े।  दो लोगों के बीच दस साल या दस सेकंड पहले क्या रिश्ता था, इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, सहमति हर बार जरूरी होती है।  

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हम तुम्हारे साथ है, लेकिन अगली बार थोड़ा ध्यान रखना।”

अक्सर परिवारजन, मित्रगण, सहकर्मी आदि सर्वाइवर को अगली बार ‘थोड़ा ज्यादा ध्यान’ रखने की सलाह देते है।  बिना नुकसान की लगने वाली ये सलाह अक्सर हादसे की पूरी जिम्मेदारी अपराधी की जगह सर्वाइवर पर डाल देती है। इसका मतलब ये भी होता है कि अगर सर्वाइवर ने थोड़ी और कोशिश की होती तो भयानक हादसा टल जाता। महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ होने वाली यौन हिंसा ‘अजनबी’ और ‘प्रेमी’ दोनों ही करते पाए गए हैं। वे यौन हिंसा का सामना दिन में भी करती हैं और रात में भी, भीड़-भरे इलाकों में भी और अलग-थलग जगहों पर भी, जब वे नशे में थी तब भी और जब नहीं थी तब भी। इसलिए जब भी हम एक सर्वाइवर को ‘सावधान’ रहने की सलाह देते हैं, तो मुख्यतौर पर हम उन्हें यह कह रहे हैं कि वे जितनी जगह लेती हैं, वे जिस तरीके से सामान्य तौर पर जीती हैं, वैसे न जीए।     

सुरक्षा के लिए, मैं अपने सहकर्मियों के साथ बहुत ज्यादा मित्रता नहीं रखती।” 

सबसे पहले तो बहुत ज्यादा मित्रता रखने का क्या मतलब होता है, एक इंसान दूसरे इंसान के प्रति अपनी मित्रता को कैसे नाप सकता है और अगर हम इस प्रकार के तर्क को स्वीकार भी कर ले तो तब क्या किया जाना चाहिए जब इस प्रकार की हिंसा करने वाला कोई अंजान व्यक्ति होता है। हम ऊपर दी गई सलाह इसलिए देते है क्योंकि हम ये मानते है कि इस शोषण के लिए लड़की/ महिला ही जिम्मेदार होगी, उसी ने पुरुष को इस हिंसा के लिए उकसाया होगा। वहीं दूसरी ओर शायद ही कभी लड़कों और मर्दों को उनकी सीमाओं के बारे में सिखाया जाता है। इस प्रकार की सामाजिक कंडीशनिंग से मर्द यह मानने लगते है कि इस प्रकार के अपराध करने के बावजूद भी वे बड़ी ही आसानी से बच जाएंगे।  

इसीलिए जो लोग इस प्रकार की हिंसा के साक्षी बनते हैं/ सुनते हैं, ये उनकी जिम्मेदारी है कि वे सर्वाइवर को अपनी बातों से और दर्द न दे। महत्वपूर्ण ये भी है कि वे सर्वाइवर से ये पूछे कि वो उनसे किस प्रकार की प्रतिक्रिया की उम्मीद रखती है।

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तस्वीर साभार : अश्वरी कुलकर्णी

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