इंटरसेक्शनलजेंडर गर्भनिरोध के लिए घरेलू हिंसा का सामना करती महिलाएं

गर्भनिरोध के लिए घरेलू हिंसा का सामना करती महिलाएं

गर्भनिरोधों और परिवार नियोजन के लिए जब महिलाएँ घरेलू हिंसा का शिकार होने लगे तो नतीजा जनसंख्या विस्फोट ही होगा।

देईपुर गांव की रहने वाली पूजा (बदला हुआ नाम) का पति संतोष जब मुंबई से वापस आया तो दोनों के बीच शारीरिक संबंध बने और पूजा गर्भवती हो गई। ग़रीबी के चलते पूजा की शादी सत्रह साल में ही कर दी गयी। अभी शादी को छह महीने ही बीते थे। पूजा का शरीर अभी पूरी तरह बच्चे के लिए तैयार नहीं था और बच्चा जन्म से कुपोषित और विकलांग पैदा हुआ। संतोष मुंबई में रहकर मज़दूरी का काम करता है। लॉकडाउन में जब संतोष फिर घर आया तो पूजा दोबारा गर्भवती हो गई। दो ही महीने में उसकी तबियत बिगड़ी और पता चला कि उसका मिसकैरेज हो गया। इसके बाद पूजा ने नसबंदी करवा ली, जिसके बाद से लगातार वो माहवारी में अधिक रक्तस्राव और सफ़ेद पानी समस्या से पीड़ित है।    

वहीं कोटिला गांव की बबिता (बदला हुआ नाम) ने चार बच्चों के जन्म के बाद ज़बरदस्ती अपनी नसबंदी करवाई। बात करने पर उसने बताया कि उसका पति सेक्स के दौरान किसी भी तरह का गर्भनिरोध इस्तेमाल नहीं करता और न ही उसे करने देता है। लेकिन अब वो और बच्चे नहीं चाहती थी, इसलिए उसने घर वालों को बिना बताए अपनी नसबंदी करवा ली। लेकिन इसके बाद उसे अक्सर पेट और कमर में दर्द की समस्या बनी रहती और आए दिन पति उसके साथ मारपीट करता। गर्भनिरोध के उत्पादों के बारे में जब हम गांव के संदर्भ में देखते है तो उत्पादों की सूची छोटी और महिला केंद्रित ही नज़र आती है। इन दो घटनाओं में हम परिवार-नियोजन और गर्भनिरोधकों के ज़मीनी सरोकार को अच्छे से समझ सकते है। यों तो गर्भनिरोध के लिए कई उत्पाद मौजूद है, लेकिन ग़रीबी और अजागरुकता के कारण ग्रामीण परिपेक्ष्य में ये बेहद सीमित हो चुके है।

पुरुषों के आनंद के लिए भेंट चढ़ता महिला स्वास्थ्य   

अगर बच्चे पैदा हो रहे है या फिर पैदा नहीं हो रहे है इन दोनों स्थिति में महिला को ही ज़िम्मेदार ठहराया जाता है। यानी कि प्रसव का दर्द हो या फिर परिवार-नियोजन की ज़िम्मेदारी दोनों की महिला के कंधे पर रखी जाती है। कई महिलाओं, आंगनवाड़ी और आशा कार्यकर्ता से जब मैंने इस संदर्भ में बात किया तो उन्होंने बताया कि ‘गांव में महिलाएं कई बार कंडोम ले जाती हैं। हम उन्हें मुफ़्त में कंडोम उपलब्ध भी करवाते हैं, लेकिन इसके इस्तेमाल से पुरुष सीधे मना कर देते हैं। वे कहते हैं कि कंडोम से वे सेक्स का आनंद नहीं ले पाते हैं।’ इन क्षेत्रों में अधिकतर पुरुषों को शराब की लत है और शराब पीने के बाद वे महिलाओं से सेक्स करते है। ऐसे में कई बार जब महिलाएं उन्हें कंडोम का इस्तेमाल करने के लिए कहती है तो वे उनके साथ बुरी तरह मारपीट करने लगते है।’ यही वजह है कि सेक्स पुरुषों के आनंद और सुकून वहीं महिलाओं के लिए चिंता, शारीरिक पीड़ा और अतिरिक्त बोझ का पर्याय बन जाता है। गांव में पुरुषों के इसी आनंद के चलते महिला का स्वास्थ्य इस कदर भेंट चढ़ता है कि कभी उन्हें फेल नसबंदी व मिसकैरेज या फिर जन्मजात कुपोषित व विकलांग बच्चों की ज़िम्मेदारी उठानी पड़ती है। इतना ही नहीं, परिवार नियोजन को लेकर गांव में हम आए दिन घरेलू हिंसा की घटनाएं देखते है।

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किशोरियों में परिवार नियोजन की नदारद जानकारी

हाल ही मैं किशोरियों के साथ स्वास्थ्य संबंधी सर्वेक्षण कर रही थी, जिसमें स्कूल-कॉलेज जाने वाले और स्कूल ड्रॉप आउट लड़कियां भी शामिल थी। उनसे जब मैंने परिवार नियोजन के संदर्भ में सवाल किया तो पाया कि अस्सी प्रतिशत लड़कियों को इसके बारे में कोई जानकारी नहीं थी। ग़ौरतलब है कि कोरोना महामारी के कारण आर्थिक तंगी से जूझते परिवारों में तेज़ी से लड़कियों की शादी तय की जा रही है, ऐसे में लड़कियों का परिवार नियोजन के बारे जागरूक न होना भी उनके लिए किसी जोखिम से कम नहीं है, क्योंकि जब तक वे परिवार नियोजन के बारे में इसके उत्पादों और योजनाओं के बारे में जान पाती है तब तक वे तीन-चार बच्चों की माँ बन चुकी होती है।

गर्भनिरोधों के लिए जब महिलाएँ घरेलू हिंसा का शिकार होने लगे तो नतीजा जनसंख्या विस्फोट ही होगा।

गर्भनिरोधक उत्पादों से जुड़े मिथ्यों का प्रचार

गर्भनिरोधक के सीमित इस्तेमाल के पीछे इससे जुड़े मिथ्यों और ग़लत धारणाओं का प्रचार होना भी एक बड़ा कारण है। सरकार की तरफ़ से पुरुषों के लिए भी नसबंदी की योजना है, जिसके लिए उन्हें सरकार की तरफ़ से कई लाभ भी दिए जाते है। लेकिन लोगों में यह धारणा है कि अगर पुरुष नसबंदी करवाएगा तो उसे कमज़ोरी आ जाएगी या वो सेक्स का आनंद भी नहीं ले पाएगा। ये मिथ्य गांव में इस कदर प्रचलित है कि पुरुष नसबंदी से पुरुष क्या महिलाएं तक भागती है। वहीं दूसरी तरफ़ गांव में सस्ते मिलने वाले कंडोम और अन्य गर्भनिरोध अक्सर नक़ली कम्पनियों के होते हैं, जिसके चलते कई बार महिलाओं ने बैठक में बताया कि सेक्स के दौरान उन्होंने ने कंडोम का इस्तेमाल किया लेकिन इसके बावजूद वे गर्भवती हो गई, क्योंकि कई बार संभोग के दौरान ही कंडोम फट जाते है। इसलिए कंडोम के इस्तेमाल को वे पैसे की बर्बादी मानते हैं।

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गर्भनिरोधक उत्पादों के साथ सत्ता का भी सवाल

महिला स्वास्थ्य, परिवार-नियोजन और गर्भनिरोध इन सभी को जब हम करीबी से देखते है तो इसमें पितृसत्ता को पाते है। यानी वो सत्ता जिसमें महिला को कम समझा जाता है, ये वही विचार है जिसकी वजह से महिला को बच्चे पैदा की करने और पुरुषों को यौन सुख पहुंचाने वाली मशीन समझा जाता है। इसलिए सेक्स में सुख और सुकून का ख़्याल सिर्फ़ पुरुष के संदर्भ में देखा जाता है। पर वहीं महिला के स्वास्थ्य, सुरक्षा और सहमति को सिरे से ख़ारिज कर दिया जाता है। ये मान लिया जाता है कि परिवार-नियोजन की सारी ज़िम्मेदारी सिर्फ़ महिला है और इसके लिए चाहे वो ढेरों बच्चे पैदा करें या फिर गर्भनिरोधों का इस्तेमाल ये सब उसके ज़िम्मे है।

शायद ये पितृसत्तात्मक सोच ही है जिसके चलते पुरुषों के लिए गर्भनिरोध के कम उत्पाद बनाए गये हैं। लेकिन समय रहते हमें इस सोच को बदलने और महिला स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए जनसंख्या विस्फोट को रोकने का प्रयास करना होगा। वरना पूरा देश कभी भी ग़रीबी और बेरोज़गारी के दलदल से नहीं निकल पाएगा। बाक़ी गर्भनिरोधों और परिवार नियोजन के लिए जब महिलाएं घरेलू हिंसा का शिकार होने लगे तो नतीजा जनसंख्या विस्फोट ही होगा।

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तस्वीर साभार : रोहित जैन

About the author(s)

बनारस से दूर करधना गाँव की रहने वाली वंदना ने सामाजिक और आर्थिक संघर्ष के बीच अपनी पढ़ाई पूरी की और एक स्वयंसेवी संस्था में क्षेत्र समन्विका के पद पर कार्यरत है। वंदना अपनी लेखनी के ज़रिए गाँव में नारीवाद, जेंडर और महिला मुद्दों को उजागर करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

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