इंटरसेक्शनलहिंसा तराना बर्क : #MeToo आंदोलन की शुरुआत करने वाली एक्टिविस्ट

तराना बर्क : #MeToo आंदोलन की शुरुआत करने वाली एक्टिविस्ट

#MeToo की प्रणेता ब्लैक एक्टिविस्ट तराना बर्क भी खुद यौन हिंसा और शोषण की सर्वाइवर हैं। उन्होंने 2006 में #MeToo आंदोलन की शुरुआत की थी।

#MeToo आंदोलन यौन शोषण और यौन उत्पीड़न के खिलाफ एक आंदोलन है, जहां महिलाएं पुरुषों द्वारा किए गए यौन अपराधों के आरोपों को सार्वजनिक करती हैं। #MeToo एक ऐसी मुहिम है, जिसके माध्यम से दुनियाभर की महिलाओं ने सोशल मीडिया पर अपने साथ हुई यौन हिंसाओं के अनुभव साझा किए हैं। असल में, इस आंदोलन में महिलाओं को अन्य महिलाओं का सहयोग मिलता है और घटना के सालों बाद भी, जब वे मानसिक रूप से इस बात को दुनिया से साझा करने के लिए तैयार होती है, तब वे स्वतंत्रता से अपनी बात रख पाती हैं। #MeToo की प्रणेता न्यूयॉर्क की ब्लैक एक्टिविस्ट तराना बर्क हैं, जो खुद यौन हिंसा और शोषण की सर्वाइवर हैं। उन्होंने दूसरी महिलाओं को शोषण के ख़िलाफ़ बोलने के लिए साल 2006 में #MeToo आंदोलन की शुरुआत की थी। हालांकि एक दशक बाद 2017 में इस आंदोलन से दुनियाभर की महिलाएं जुड़ीं, जिसपर तराना बर्क ने कहा “यह अंतर्राष्ट्रीय आंदोलन दुनिया भर में शोषण झेल रही महिलाओं के लिए है।”

तराना बर्क गर्ल्स फ़ॉर जेंडर इक्विटी नामक समूह के साथ काम करती हैं, जिसका उद्देश्य स्थानीय समुदायों में महिलाओं को आत्मनिर्भर जीवन के अवसर उपलब्ध कराना है। यह संगठन जैविक-मानसिक-सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखते हुए समाज द्वारा औरतों की राह के आने वाली समस्याओं जैसे लिंगभेद, रंगभेद, समलैंगिक समुदाय के ख़िलाफ़ सामाजिक रुख और यौन हिंसा इत्यादि से निपटना सिखाता है। तराना बर्क एक गरीब परिवार से आती थी। उनके बचपन और टीनएज में उनके साथ शारीरिक शोषण और बलात्कार हुआ था। उनकी मां ने उन्हें इन घटनाओं के बाद पैदा हुई तकलीफ से निकलने में मदद की और आगे की पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित किया। तराना बर्क स्त्री शोषण की समस्या से जूझने से परिचित थी। वे भली-भांति जानती थी कि औरतों को पितृसत्तात्मक समाज मे उपेक्षा ही मिलती है और इसी कारण वह अपने साथ हुए शोषण के बारे में बता नहीं पाती हैं। इसलिए उन्होंने यह मुहिम शुरू की, जहां यौन हिंसा की सर्वाइवर महिलाओं को दूसरी महिलाओं का सहयोग मिलता है और वे आरोपी के ख़िलाफ़ खुलकर बोल सकती हैं।

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मशहूर टाइम पत्रिका ने 2017 के #MeToo मुहिम में शामिल अन्य महिलाओं सहित तराना बर्क को ‘टाइम पर्सन ऑफ द ईयर’ के रूप में कवर पेज पर ‘ द साइलेन्स ब्रेकर्स’ के समूह को ‘टाइम पर्सन ऑफ द ईयर’ 2017 घोषित किया था। इसके अलावा बर्क को 2018 में राइडएनऑवर प्राइज फ़ॉर करेज, शी नोज़ मीडिया कैटलिस्ट अवॉर्ड और 2019 में ट्रेलब्लेज़र अवॉर्ड विनर दिया गया है।

नारीवाद के तीनों चरण के बाद सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक क्षेत्रकों में अपना स्थान बनाने के लिए लगातार वे संघर्षशील हैं, लेकिन फिर भी समाज की वैचारिकी में औरतों को लेकर कोई विशेष बदलाव नहीं आया है। आज भी औरतों को लगभग प्रत्येक कार्य क्षेत्र में हतोत्साहित किया जाता है

साल 2017 में हॉलीवुड अभिनेत्री एलिसा मिलानो ने सोशल मीडिया पर फ़िल्म प्रोड्यूसर हार्वे वीइंस्टीन के ख़िलाफ़ यौन हिंसा का आरोप #MeToo के तहत लगाया। जल्द ही यह आंदोलन ‘हैशटैग’ के ज़रिए सोशल मीडिया पर वायरल होने लगा। अभिनेत्री ने लिखा, ‘अगर सभी औरतें जो शारीरिक और यौन शोषण से गुज़री हैं, #MeToo शेयर करें तो हम लोगों को इस समस्या की गहराई का एक अंदाज़ा दे सकते हैं।’ इसके बाद हॉलीवुड की अन्य मशहूर अभिनेत्रियों ने अपने अनुभव साझा किए। धीरे-धीरे यह आंदोलन दुनिया भर में फैल गया और अलग-अलग देशों में भिन्न भाषाओं में भी लोगों ने अपने अनुभव साझा किए।

तस्वीर साभार: BBC

‘व्हाट वर्क्स टू प्रिवेंट वॉयलेंस अगेंस्ट वीमेन एंड गर्ल्स’ की डायरेक्टर रेचल जेवकस के अनुसार “यौन हिंसा विशेषकर सार्वजनिक क्षेत्र में महिलाओं के लिए रोज़ की सच्चाई है। इसके कारण महिलाओं की स्वतंन्त्रता सीमित होती है। सार्वजनिक क्षेत्र पर पुरुषों का नियंत्रण है, वे सार्वजनिक क्षेत्र की प्रत्येक चीज़ पर अपना स्वामित्व मानते हैं और इसी प्रक्रिया में सामाजिक नियमों के तहत वे औरतों का शोषण करते हैं।” जनवरी में हुए एक ऑनलाइन सर्वे ‘स्टॉप स्ट्रीट हरासमेंट’ में पाया गया कि 81 प्रतिशत महिलाएं किसी न किसी तरह की यौन हिंसा से गुज़रती हैं।

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भारत में भी महिलाओं ने #MeToo के माध्यम से खुलकर यौन हिंसा से संबंधित अपने अनुभवों को साझा किया। यहां यौन शोषण के मसले को अक्सर ‘ इव टीज़िंग’ कहकर उसकी गंभीरता कम कर दी जाती है। यहां कार्यस्थल से लेकर सड़क चलत” महिलाओं को मौखिक या शारीरिक रूप से हिंसा का सामना करना पड़ता है। यहां महिलाएं घरों औ सार्वजनिक क्षेत्रों में शारीरिक और मानसिक शोषण से जूझती हैं। शोषण और हिंसा के ख़िलाफ़ मज़बूत कानून होने के बाद भी इन घटनाओं में कमी नहीं आई है। भारतीय परिवेश में पितृसत्ता की जड़ें गहराई तक जमी हैं। यौन हिंसा के अनुभव किसी भी स्त्री के लिए इतने त्रासद होते हैं कि उन्हें सार्वजनिक करने से पहले वह सौ बार सोचती है।

मानवीय सभ्यता में आर्थिक विकास, लोकतंत्र और तमाम संस्थानों के सुदृढ़ीकरण की प्रक्रिया के बावजूद भी महिलाओं की स्थितियों में कोई क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं हुआ है। हालांकि नारीवाद के तीनों चरण के बाद सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक क्षेत्रकों में अपना स्थान बनाने के लिए लगातार वे संघर्षशील हैं, लेकिन फिर भी समाज की वैचारिकी में औरतों को लेकर कोई विशेष बदलाव नहीं आया है। आज भी औरतों को लगभग प्रत्येक कार्य क्षेत्र में हतोत्साहित किया जाता है और इसी प्रक्रिया में स्त्री को नीचा दिखाने और कुंठा के कारण तथा पुरुषत्व को स्थापित करने के लिए उसका शारीरिक शोषण किया जाता है।

समाज में औरतें सदैव से हाशिए पर रही हैं, उन्हें सार्वजनिक कार्यक्षेत्र में संलग्न होने और अपने ‘स्पेसेज़ रिक्लेम’ करने के लिए और पितृसत्ता जनित पुरुषों के रोष की ख़िलाफ़त के लिए दूसरी महिलाओं का सहयोग चाहिए। तराना बर्क द्वारा शुरू की गई यह मुहिम महिलाओं को यह अवसर उपलब्ध कराता है, जिससे किसी भी शक्तिशाली पुरूष के ख़िलाफ़ बोलने और उसके शोषणकारी चरित्र को सराव्जनिक करने में एक स्त्री को अन्य स्त्रियों का सहयोग मिलेगा।

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तस्वीर साभार : TIME

About the author(s)

मेरा नाम गायत्री है. आजकल मैं हिन्दी-साहित्य पढ़ने की कोशिश में लगी हूँ. मेरा गाँव उत्तर-प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र में पड़ता है. खाली समय में गाय चराना और चाय पीना मुझे पसंद है. यहाँ दर्ज लेख मेरे सामने घट रही घटनाओं के प्रतिबिम्ब हो सकते हैं.

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