FII is now on Telegram
4 mins read

हाल ही में साल 2020 के शांति नोबेल पुरस्कार की घोषणा की गई जिसमें इस बार विश्व खाद्य कार्यक्रम को सम्मानित किया गया। विश्व खाद्य कार्यक्रम को यह सम्मान उसके द्वारा वैश्विक स्तर पर भुखमरी के खिलाफ किए गए प्रयासों के लिए दिया जा रहा है। विश्व खाद्य कार्यक्रम (डब्ल्यूएफपी) ने पिछले साल दुनिया के 88 देशों के करीब 10 करोड़ लोगों को सहायता उपलब्ध कराई। यूएन खाद्य एजेंसी के प्रयास मुख्यतः आपात सहायता, राहत और पुनर्वास, विकास सहायता और विशेष अभियानों पर केन्द्रित हैं। विश्व खाद्य कार्यक्रम का दो-तिहाई काम संघर्ष प्रभावित देशों में है। इन क्षेत्रों की आबादी के, बिना संघर्ष वाले देशों की आबादी की तुलना में, कुपोषण की चपेट में आने की संभावना तीन गुना ज़्यादा है।

नोबेल पुरस्कार समिति की अध्यक्ष ने कहा कि कोविड-19 संकट के दौर को देखते हुए कहा कि इस महामारी ने वैश्विक खाद्य असुरक्षा में भी इज़ाफ़ा किया है और एक साल के अंदर लगभग 26.5 करोड़ लोगों के सामने भूखे रहने का संकट पैदा हो सकता है। उन्होंने सयुंक्त राष्ट्र खाद्य एजेंसी की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि विश्व खाद्य कार्यक्रम ने संघर्षों और प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित बेहद ख़तरनाक और दुर्लभ इलाक़ों में करोड़ों लोगों की मदद की है, इनमें यमन, सीरिया और उत्तर कोरिया जैसे देश भी शामिल हैं।

हाल ही में जारी हुए ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2020 में 107 देशों में भारत 94वें पायदान पर है। यह रैंकिंग बताती है कि भारत में भुखमरी की स्थिति कितनी गंभीर हो चुकी है।

और पढ़ें : साहित्य में नोबेल पुरस्कार 2020 से सम्मानित हुई कवियित्री लुइस ग्लिक

वहीं, इससे पहले जुलाई महीने में संयुक्‍त राष्‍ट्र ने एक आंकलन करते हुए खाद्य सुरक्षा एवं पोषण की स्थिति पर रिपोर्ट जारी की गई थी जिसमें कहा गया था कि कोविड-19 महामारी के कारण साल 2020 में कुपोषण तालिका में 8.3 करोड़ से 13.2 करोड़ लोगों का इज़ाफा हो सकता है जिसे यूएन ने बढ़ाकर 26.5 करोड़ के करीब कर दिया है। संयुक्‍त राष्‍ट्र की एजेंसियों के अनुमान के मुताबिक, पिछले साल करीब 69 करोड़ लोग भुखमरी की चपेट में आए थे। यह संख्‍या पूरी दुनिया की आबादी का करीब नौ फीसद है। साल 2018 से इसमें करीब एक करोड़ जबकि साल 2014 से करीब छह करोड़ की बढ़ोतरी दर्ज की गई। संयुक्‍त राष्‍ट्र की रिपोर्ट पर नजर डालें तो लगता है कि दशकों तक भूखमरी के सूचकांक में लगातार गिरावट दर्ज की गई थी, लेकिन साल 2014 से भुखमरी के आंकड़ों में काफी बढ़ोतरी देखी गई। रिपोर्ट के मुताबिक, एशिया में दुनिया की सर्वाधिक कुपोषित आबादी रहती है, अनुमान यह है कि एशिया में 38.1 करोड़ लोग कुपोषण के शिकार हैं।

और पढ़ें : नोबेल विजेता अर्थशास्त्री एस्थर डफ्लो का परिचय किसी की पत्नी होना नहीं

भारत में भुखमरी और खाद्य सुरक्षा

हाल ही में जारी हुए ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2020 में 107 देशों में भारत 94वें पायदान पर है। यह रैंकिंग बताती है कि भारत में भुखमरी की स्थिति कितनी गंभीर हो चुकी है। इससे पहले भारत में साल 2019 में ही भारत ग्लोबल हंगर इंडेक्स में 117 देशों की सूची में 102वें पायदान पर था। वैश्विक भुखमरी सूचकांक में दुनिया के 117 देशों में इस साल भारत का स्कोर 30.3 है जो इसे ‘सीरियस हंगर कैटेगरी’ में लाता है। इतना ही नहीं भारत अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल से भी पिछड़ा हुआ हैं। वहीं, दूसरी तरफ वेल्थ हंगर हिल्फे एंड कन्सर्न वर्ल्‍डवाइड की तैयार की गई रिपोर्ट के मुताबिक साल 2019 में भारत दुनिया के उन 45 देशों में शामिल था जहां भुखमरी का स्तर काफी गंभीर है। इन सभी समस्याओं के समाधान को खोजें तो इसके लिए भारत को अपनी खाद्य सुरक्षा को और भी अधिक मजबूत करना होगा साथ ही इसके लिए जमीनी स्तर पर लग कर काम करने की आवश्यकता है।

हाल ही में कुछ विशेषज्ञों और अर्थशास्त्रियों ने भी कोरोना वायरस के चलते देश में गरीबी और भुखमरी का खतरा बढ़ता हुआ देख इसपर चिंता जताई थी। उनका मानना है कि यदि सही तरीके से भारत के लोगों को भोजन नहीं उपलब्ध कराया गया और दिहाड़ी मजदूरों की बढ़ती समस्याओं का समाधान नहीं किया गया तो देश में गरीबी और भुखमरी को दस्तक देने से कोई नहीं रोक सकता।

और पढ़ें : कोरोना राहत कार्य में हावी पितृसत्ता का ‘नारीवादी विश्लेषण’| नारीवादी चश्मा

फिर विडंबना भी देखिए कि भारत के पास पर्याप्त मात्रा में खाद्य भंडारण होने के बावजूद खाद्य सुरक्षा का संकट बना हुआ है जो प्रशासन और सरकार की नीतियों पर एक तरह का सवाल खड़ा करता है। वहीं, हाल ही में किसान बिल पास होने के बाद स्टॉक प्रतिबन्ध की सीमा को भी हटा दिया है तथा केवल आपदा और युद्ध की स्थिति में ही यह प्रतिबन्ध लागू किए जाएंगे इस फैसले के बाद भी कई विशेषज्ञ यह आशंका जता रहे है कि इससे भारत के खाद्य भंडारण में कमी आएगी साथ ही भुखमरी जैसी स्थिति और भी अधिक विकराल रूप धारण कर सकती है। दुनियाभर में सबसे अधिक 14.5 प्रतिशत यानी 19.44 करोड़ कुपोषित भारत में मौजूद हैं। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) की रिपोर्ट के हिसाब से भारत में पैदा होने वाला 40 प्रतिशत भोजन व्यर्थ हो जाता है, यह मात्रा ब्रिटेन में हर वर्ष प्रयोग होने वाले भोजन के बराबर है।

भारत में भुखमरी और कुपोषण की समस्या को खत्म करने को लेकर कोई सकारात्मक प्रयास नहीं हुए हैं। देश में भुखमरी और कुपोषण से मुक्ति के लिए यूं तो हर साल करोड़ों, अरबों रूपए खर्च होने के बाद भी समस्या अपने भयावह रूप में बनी हुई है। यहाँ अब भी ऐसे लोग राह चलते दिखाई दे जाएंगे जिनके लिए दो वक़्त की रोटी का प्रबंध करना एक बहुत बड़ी चुनौती है जिससे वे हर रोज़ जूझते है। जहां एक तरफ विश्व खाद्य कार्यक्रम वैश्विक स्तर पर भुखमरी को जड़ से मिटाने के लिए युद्ध मुद्रा में कार्यरत है वहीं भारत केवल अपने ही देश में भूखे लोगों की समस्या का निपटान नहीं कर पा रहा है वो भी तब जब भारत के पास पर्याप्त मात्रा में खाद्य भण्डारण उपलब्ध है लेकिन अफसोस कि यह भंडारण या तो पड़े-पड़े सड़ जाता है या फिर प्रशासन में फैले भष्ट्राचार के कारण ये अनाज गरीब समुदाय तक पहुंच ही नहीं पाता और कालाबाजारी का शिकार हो जाता है।

और पढ़ें : कृषि विधेयकों के ख़िलाफ़ आखिर क्यों सड़कों पर हैं देश के किसान


तस्वीर : सुश्रीता भट्टाचार्जी

Support us

Leave a Reply