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मार्च से पहले ही मैं सपना (बदला हुआ नाम) से मिली थी। शादी के बाद वह पहली बार मायके आई थी। सपना ने बीकॉम किया हुआ था, फिर किसी संस्था में नौकरी भी कर रही थी। उसने अपनी जिदंगी में ख़ूब संघर्ष भी किया, स्कूल जाने के लिए, नौकरी के लिए, अपने और भाई के बीच होने वाले भेदभाव के ख़िलाफ़ और शादी न करने के लिए। उसकी कुछ लड़ाई सफ़ल हुई और उसकी कुछ बातें मानी गई लेकिन कुछ पर कोई असर नहीं हुआ। वह स्कूल गई फिर कॉलेज भी गई, लेकिन अपनी शादी नहीं रोक पाई। शादी के साथ-साथ उसकी नौकरी भी छूट गई। हम अच्छे दोस्त थे। लॉकडाउन के दौरान जब वो मायके गई तो एक़बार फ़ोन पर उससे बात हुई, उसने बस इतना बताया कि कुछ ठीक नहीं। फिर एक हफ़्ते बाद उसकी आत्महत्या की खबर आई।

बाद में पता चला कि दहेज को लेकर उसके साथ हमेशा मारपीट की जाती थी। उसने शुरुआत में ही इसके बारे में अपने घर में बताया था लेकिन घर वालों ने यह कहकर इसे नज़रंदाज़ कर दिया कि ‘तुम ख़ुद बहुत बोलती हो। इसलिए झगड़ा होता होगा।’ सपना पहली लड़की नहीं, ऐसी बहुत-सी लड़कियां हैं जो अपने घर-परिवार में हिंसा का सामना करती हैं और एक समय के बाद वहीं अपना दम तोड़ देती हैं।

परिवार किसी भी समाज की पहली ईकाई होता है। ये परिवार ही है जिसमें एक इंसान अपना विकास करता है। वहीं से वह बोलना, चलना, सोचना, समझना और व्यवहार करना सीखता है। पर देखते-देखते कब यह परिवार हमें किसी विशेष व्यवहार में ढाल देता है पता ही नहीं चलता। ये सब इतना आसान होता है कि स्वाभाविक लगता है, लेकिन जब कोई घटना होती है तब पता चलता है कि ये सब इतना सहज नहीं है। इसमें कितनी सारी कमियां है, जो एक बड़ी दुर्घटना का कारण बनती है। मैं ख़ुद भी ग्रामीण परिवेश के मज़दूर परिवार से ताल्लुक़ रखती हूं, घर में आठ भाई-बहन और माता-पिता हैं। हम सभी की परवरिश भी वैसे ही होती है जैसे बाक़ी के घरों में लड़के-लड़कियों की। भेदभाव और लड़कियों के लिए इज़्ज़त के नामपर ख़ास पाबंदियों के साथ।

हमारे घर में भी लड़कियों को एक बोझ और उसकी शादी उस बोझ को टालने का तरीक़ा माना जाता है। मतलब कोई भी कैसे भी लड़का मिले बस लड़की की जल्दी से शादी करके हटाओ। अक्सर घर में हम बहनों को ये सुनने को मिलता है कि ‘जब अपने घर जाना तब ये शौक़ पूरे करना। या जब तुम्हारा परिवार होगा तब पता चलेगा।’ ये बातें तब कही जाती है जब हम अपने बुनियादी शिक्षा और भाई की तरह अन्य अवसरों की बात करते है। उसपर जब भी हमें ग़रीबी और लड़की होने के नामपर जब चुप करवाया जाता है तो यही कहते है कि ‘तुम्हारा परिवार होगा तब पता चलेगा।’ ये ऐसा होता है जैसे जिस जगह मैंने जन्म लिया है वो मेरा परिवार है ही नहीं। कई बार हम बहने आपस में बात करती है कि जब हम लड़कियाँ अपने ससुराल जाती है तो किसी भी गलती पर ये बोला जाता है कि ‘परिवारवालों ने कुछ सिखाया नहीं।’ ऐसा लगता है जैसे दोनों (मायके और ससुराल) पक्ष एक-दूसरे पर दोष लगाते है, लेकिन कोई भी पक्ष ये नहीं स्वीकारता कि हमारा कौन-सा परिवार है और हमलोग कुछ भी नहीं समझ पाते है कि हमारा परिवार कौन-सा है।

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बीए में मेरा एक विषय समाजशास्त्र भी था। उसमें परिवार की जैसी परिभाषा बतायी गई थी वैसा तो असल में होता ही नहीं, ख़ासकर लड़कियों के लिए। सब बेगाना-सा ही होता है। हम लड़कियां ज़िंदगीभर बस अपने अस्तित्व, पहचान, परिवार और ठिकाने का ही पता लगाती रह जाती है। लेकिन इन सबके बीच में एक चीज़ जो कहीं भी नहीं बदलती, वो है हमलोगों की भूमिकाएं। एक इंसान नहीं बल्कि एक लड़की होने के नाते हमारे पितृसत्तात्मक समाज ने हमारे लिए बतौर बेटी, बहु, पत्नी, बहन और सभी महिला रिश्ते के नामपर जो भी काम, व्यवहार और भूमिकाएं तय की है, फिर वो घर के काम हो या फिर बच्चे पैदा करने हो, वो सब हमें करना पड़ता है। इतना ही नहीं, हम जिस भी छत के नीचे रहते है उस हिसाब से बताए गये हमारे तथाकथित परिवार के रिश्ते भी हमें बनाए रखने होते है और ये सब बेहद सामान्य होता है, जिसे अक्सर गांव में औरतें अपनी नियती कहती हैं।

लेकिन इन सबके बीच जब महिला हिंसा की घटनाएं देखती हूँ तो ‘परिवार’ की सोच पर ग़ुस्सा आता है। वो परिवार जो जन्म से ही लड़का-लड़की में भेद करता है। ये भेदभाव ही तो है जिससे हिंसा का जन्म होता है। पूरा परिवार अपनी पूरी ताक़त लड़की को समाज की बतायी गयी ‘अच्छी लड़की’ बनाने में झोंक देता है। वह उसे चुप रहना सीखाता है। सोचने-समझने की शक्ति भूलकर आज्ञा पालन करने का ज़ोर देता है। हाथ कलम-किताब नहीं चूल्हा-चौका का काम सौंपता है। सब कुछ सहने को उनकी पहचान बताता है। वहीं दूसरी तरफ़ लड़कों को पूरी तरह आज़ाद छोड़ देता है, वो लड़कियों को उनके अधिकार नियम-शर्तों के साथ बताता है लेकिन लड़कों को सभी अधिकार उसके जन्म से ही दे देता है। कई बार ऐसा देखा जाता है कि लड़का चाहे कितना भी नालायक हो ये जानते हुए भी पिता के बाद उसे ही घर का मुखिया बनाया जाता है, फिर भले ही साल-दो साल में उस परिवार का नाश हो जाएँ।

पूरा परिवार अपनी पूरी ताक़त लड़की को समाज की बतायी गयी ‘अच्छी लड़की’ बनाने में झोंक देता है। वो उसे चुप रहना सीखाता है। सोचने-समझने की शक्ति भूलकर आज्ञा पालन करने का ज़ोर देता है।

सपना हमेशा से ग़लत के ख़िलाफ़ अपने परिवार में आवाज़ उठाती रही। इसलिए उसे बाग़ी और ‘बुरी लड़की’ समझा जाता है। जैसे-जैसे बड़ी होती गई, अपने अधिकारों की बात करने लगी और हमेशा की तरह एक जानवर की तरह उसकी नकेल कसने के लिए उसकी शादी की गयी। शादी के बाद उसने जब अपने ख़िलाफ़ हो रही हिंसा के बारे में बताया तो सभी ने उसे झूठा करार कर उसी को ज़िम्मेदार बता दिया और आख़िरकार उसने ख़ुद को ख़त्म कर लिया। आख़िर कब तक लड़ती वो? ज़िंदगीभर अपने इंसान होने का हक मांगती रहती।

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सपना का इस तरह जाना मुझे बेहद दुखी कर गया और मेरी जैसी हर लड़की के लिए ‘परिवार का सवाल’ छोड़ गया। आज भले ही क़ानून ने सम्पत्ति में लड़कियों के अधिकार की घोषणा कर दी है, लेकिन आज भी हमारे गांव में लड़कियां अपने परिवार की ही तलाश करती है। क्योंकि जिस परिवार में हम जन्म लेती है वहां हमें दूसरे परिवार में जाने के लिए ही तैयार किया जाता है और वहां भेजने के लिए दहेज के नामपर जो भी समान दिया जाता है उसे ही हमारे सम्पत्ति के अधिकार का हिस्सा बता दिया जाता है। ऐसे में जब लड़कियां शादी के बाद हिंसा का सामना करती हैं तो बिना किसी पारिवारिक सहयोग के वे तमाम सरकारी योजनाओं और क़ानून होने के बाद भी मौत की राह चुनना आसान समझती है, क्योंकि उस वक्त उन्हें अपना कोई परिवार नज़र नहीं आता, जहां वे किसी सहयोग की उम्मीद करें।

इसलिए ज़रूरी है कि स्वस्थ समाज के लिए हमारे परिवार की नींव लैंगिक समानता के विचारों के साथ रखी जाए। जहां लड़का या लड़की में भेद नहीं समानता हो और जिस परिवार में लड़की ने जन्म लिया है वो उसे अपना परिवार लगे, न कि वो पूरी ज़िंदगी अपने परिवार को तलाशती रहे। उसे अपने विचार साझा करने में हिचक न हो, वो ख़ुद को सहज महसूस करे और उसे  कभी ये सोचने की ज़रूरत न पड़े कि हमारे समाज में लड़की का अपना परिवार कहाँ है?

आख़िर में, हो सकता है ये सब आपको बहुत साधारण लगे तो आपसे बस यही कहूंगी कभी गांव में हाशिए पर बसने वाले समुदायों के परिवारों में लड़कियों को देखिएगा, उनकी स्थिति और सवालों को समझने की कोशिश करिएगा आपको ये सब कितना जटिल है, पता लग जाएगा और ये भी मालूम होगा कि अपने परिवार की तलाश में हम लड़कियां किस तरह अपना अस्तित्व खोती चली जाती हैं और हिंसा-भेदभाव की आहूति बनती जाती हैं।  

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तस्वीर साभार : nytimes

बनारस से दूर करधना गाँव की रहने वाली वंदना ने सामाजिक और आर्थिक संघर्ष के बीच अपनी पढ़ाई पूरी की और एक स्वयंसेवी संस्था में क्षेत्र समन्विका के पद पर कार्यरत है। वंदना अपनी लेखनी के ज़रिए गाँव में नारीवाद, जेंडर और महिला मुद्दों को उजागर करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

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