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दुनिया में इस वक़्त सबसे अधिक चर्चित मुद्दों के बारे में कहें तो वे या तो महिलाओं के मुद्दे हैं या फिर प्राकृतिक दोहन के मुद्दे जिनपर कई अंतरराष्ट्रीय संगठन रिपोर्ट भी जारी करते हैं ताकि दुनिया का ध्यान इस ओर आकर्षित किया जा सके। इन दोनों में एक शब्द की समानता पाई जाती है वह शब्द है ‘शोषण’ क्योंकि प्रकृति और महिलाएं दोनों ही शोषण का सामना कर रहे हैं। इस बात को ज़ाहिर करने के लिए 1970 के दशक में ही दार्शनिकों ने नारीवादी विचारधारा में नई परिकल्पना को जोड़ा जिसे ईको फेमिनिज़म यानी पारिस्थितिक नारीवाद के नाम से जाना जाता है। ब्रिटिश अकादमिक मैरी मेलर ईको फेमिनिज़म को एक आंदोलन के रूप में परिभाषित करती है जो प्राकृतिक दुनिया के शोषण और गिरावट और महिलाओं के अधीनता और उत्पीड़न के बीच संबंध देखता है।

ईको फेमिनिज़म नारीवाद की ही एक शाखा है जिसमें प्रकृति और महिलाओं के संबंध में समानता स्थापित करते हुए उनकी परेशानियों को उजागर किया जाता है। ईको फेमिनिज़म संस्कृति, धर्म, साहित्य में महिलाओं और प्रकृति के बीच संबंधों की खोज करता है और प्रकृति के उत्पीड़न और महिलाओं के उत्पीड़न के बीच समानता को दर्शाता है। यह महिलाओं और प्रकृति को संपत्ति के रूप में देखने तक सीमित नहीं है। ईको फेमिनिज़म में इस बात पर जोर दिया गया है कि महिलाओं और प्रकृति दोनों का सम्मान किया जाना चाहिए।

ईको-फेमिनिस्ट एक्टिविज़म 1980 के दशक के दौरान महिलाओं के बीच न्यूक्लियर, पर्यावरणीय और लेस्बियन-नारीवादी आंदोलनों से बढ़ा। एमहर्स्ट (1980) में आयोजित “महिला और पृथ्वी पर जीवन: पारिस्थितिकतावाद” सम्मेलन (1980) ईको-फेमिनिस्ट सम्मेलनों के संदर्भ में पहली बार आयोजित किया गया था। पारिस्थितिक नारीवाद के अनुसार यह समाज स्त्री और प्रकृति को हमेशा उपभोग की दृष्टि से ही देखता है जिस कारण ये दोनों ही आज विनाश के कगार पर हैं। ईको फेमिनिज़म को गढ़ने का श्रेय फ्रेंच नारीवादी चिंतक फ्रांस्वा द यूबोन को जाता है जिन्होंने साल 1974 में प्रकाशित ”ले फेमनिज़म ओ ला मॉर्ट ” में इसका उल्लेख किया था। उनके अनुसार वर्तमान के पारिस्थितिक संकट की समस्या पुरुष केंद्रित है।

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आज सबसे अधिक चिंता का विषय पर्यावरण और स्त्री शोषण है इसलिए आज के समय में इसकी प्रासंगिकता और भी अधिक बढ़ जाती है। प्राचीन समय में खेती करने का अधिकार स्त्री वर्ग के पास था लेकिन बाद में इस अधिकार का हस्तांतरण पुरुषों को कर दिया गया और महिलाओं को परिवार संभालने का काम या यूं कहें की जिम्मेदारी दे दी गई। इस पर नारीवादी यह तर्क देते हैं कि पुरुषों को खेती करने का अधिकार देना ही वह समय था जब पर्यावरण का नाश होना शुरू हुआ। फिर चिपको आंदोलनों जैसे उदाहरण भी तो इस बात का साफ़ संकेत देते हैं कि महिलाएं हमेशा पर्यावरण के सरंक्षण के पक्ष में रही हैं। चिपको आंदोलन पूरी तरह महिलाओं से जुड़ा हुआ रहा और इस आंदोलन ने यह साबित किया कि जो काम पुरुष नहीं कर सकते, उसे महिलाएं कर सकती हैं। ‘नर्मदा बचाओ’ आंदोलन को लेकर मेधा पाटकर भी काफी चर्चित रही हैं। इन्हें इस आंदोलन के कारण कई बार जेल तक जाना पड़ा। पर्यावरण संरक्षण में इनकी सक्रिय भूमिका को देखते हुए ही इन्हें अंतरराष्ट्रीय ‘ग्रीन रिबन’ पर्यावरण पुरस्कार से नवाज़ा गया है, जो नोबेल पुरस्कार के बराबर है।

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स्वीडन की ग्रेटा थनबर्ग का भी उदाहरण भी लिया जा सकता है जिसने पर्यावरण को बचाने के लिए सभी देशों से इसके सरंक्षण की अपील की थी ताकि जलवायु परिवर्तन के संकट से निपटा जा सके। वहीं, दूसरी तरफ भारत में आज भी महिलाएं व्रत-त्यौहार के मौके पर या रोज़मर्रा के अपने जीवन में अनेक वृक्षों -पीपल, तुलसी, आंवला, अशोक, बेल, शमी, नीम, आम जैसे पेड़ पौधों को शामिल करती नज़र आती है।

यही नहीं जल-स्रोतों के प्रति भी संरक्षण की भावना महिलाओं में प्राचीन काल से ही चली आ रही है। संपूर्ण पारिस्थितिकी को संतुलित बनाए रखने के लिए महिलाएं हमेशा से ही अग्रणी रही हैं। हमारे देश में भी महिलाओं में प्रकृति-संरक्षण और पर्यावरण-संरक्षण की यह भावना पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आई है और आज भी देखने को मिलती है। इस तरह से ईको फेमिनिज़म की प्रासंगिकता को पहचाना जा सकता है और कहा जा सकता है कि आज के समय में इसका कितना अधिक महत्व है क्योंकि यह विषय ही ज्वलंत है जिनको नकारना शायद बड़ी प्राकृतिक आपदा और सामाजिक समस्या को जन्म देना है।

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तस्वीर : सुश्रीता भट्टाचार्जी

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