FII is now on Telegram
3 mins read

वैश्विक इतिहास की ओर रुख करें तो राजनीतिक अधिकार की शुरुआत 1789 की फ्रांस की क्रांति में देखी जा सकती है जब पुरुषों को संपत्ति के आधार पर मताधिकार दिया गया लेकिन महिलाएं इस अधिकार से वंचित रही। इसके पीछे का सबसे बड़ा कारण रहा महिलाओं का आर्थिक रूप से सक्षम न हो पाना। फ्रांस में महिलाओं का राजनीतिक अधिकारों से जुड़ा संघर्ष 1789 से चला और साल 1944 में जाकर इस पर विराम लगा जब उन्हें मताधिकार प्रदान किया गया। मताधिकार के मामले में सबसे खुशकिस्मत देश रहा न्यूजीलैंड जिसने सबसे पहले साल 1893 में वोटिंग अधिकार दिया। भारत के नजरिए से देखें तो मताधिकार के मामले में महिलाओं कि स्थिति काफी बेहतर रही। 1947 में जब आज़ादी मिली उस वक़्त भारत पहले ही कई समस्याओं से जूझ चुका था शायद इसलिए इस विषय पर ज्यादा बहस करना सही नहीं समझा गया कि मताधिकार किसे दिया जाना चाहिए। हालांकि स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले कई दिग्गज महिलाओं एनी बेसेंट, सरोजनी नायडू, कमलादेवी के नेतृत्व में राजनीतिक अधिकारों की मांग उठाई गई। खैर! ये तो रही केवल मताधिकार की बात, अब बात करते है राजनीति में महिला आरक्षण बिल के मुद्दे पर

भारतीय संविधान के भाग 3 में दिए गए मौलिक अधिकार में तो धर्म, जाति, वर्ग के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव निषेध है यानी स्त्री और पुरुष को समान राजनीतिक अधिकार दिए गए हैं। इसके बावजूद स्त्री वर्ग का राजनीति में प्रवेश का अनुपात बेहद कम है। राजनीति में महिला प्रतिनिधित्व का मुद्दा सबसे पहले साल 1974 में उभरकर सामने आया, जिसमें स्थानीय स्वशासन में महिला भागीदारी की बात कही गई थी, इस मांग को पूरा भी किया गया। लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण के परिणामस्वरूप 73वें और 74वें संविधान संशोधन के तहत स्थानीय शासन में महिलाओं को एक तिहाई सीटों का आरक्षण दिया गया। यह छोटे स्तर से ही सही आरक्षण की लड़ाई में एक यादगार सफलता रही। पर इस सफलता ने जल्दी ही विफलता का रूप धारण कर लिया जब इसके परिणाम सामने आने लगे। कितने ही किस्से सुनने में आए की पति ने सत्ता की कुर्सी पाने के लिए अपनी पत्नी को आगे किया और सत्ता हाथ आते ही पत्नी की कुर्सी को सहारा बनाकर राजनीति की चढ़ाई करने लगे। ऐसे उदाहरणों से यह निष्कर्ष निकाल कर सामने आता है कि निर्णय प्रक्रिया में अभी भी पुरुष वर्ग का वर्चस्व कायम है। दरअसल यही वह सच्चाई है जो आरक्षण के मुद्दे को और भी अधिक विवादास्पद बना देता है। 

और पढ़ें : प्रधान पति : संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद बैकफुट पर महिलाएं

साल 1996 में महिला आरक्षण बिल को पहली बार एच.डी. देवगौड़ा में नेतृत्व वाली सरकार ने 81वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में संसद में पेश किया था। लेकिन देवगौड़ा की सरकार बहुमत से अल्पमत की ओर आ गई जिस कारण यह विधेयक पास नहीं कराया जा सका। फिर साल 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने लोकसभा में फिर से यह विधेयक पेश किया। लेकिन गठबंधन की सरकार में अलग अलग विचारधाराओं की बहुलता के चलते इस विधेयक को भारी विरोध का सामना करना पड़ा। साल 1999, 2002 और 2003 में इस विधेयक को दोबारा लाया गया लेकिन रूढ़िवादी नतीजा टस से मस नहीं हुआ।

साल 2008 में मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार ने लोकसभा और विधानसभाओं में 33 फ़ीसद महिला आरक्षण से जुड़ा 108वां संविधान संशोधन विधेयक संसद के उच्च सदन राज्यसभा में पेश किया जिसके दो साल बाद साल 2010 में तमाम तरह के विरोधों के बावजूद यह विधेयक राज्यसभा में पारित करा दिया गया। लेकिन लोकसभा में सरकार के पास बहुमत होने के बावजूद यह पारित न हो सका। तब से लेकर अब तक यह विधेयक सरकारी पन्नों में कहीं खो गया है जिसकी जरूरत पुरुषप्रधान राजनीति में महसूस नहीं की गई। महिला आरक्षण बिल को राज्यसभा में पेश किए जाने के कारण यह विधेयक अभी भी जीवंत है जिसमें अभी की केंद्र सरकार चाहे तो बहुत ही आसानी से इसे पास करा सकती है।

कल्पना कीजिए सिर्फ 33 फ़ीसद आरक्षण के लिए इसे संसद में सहयोग नहीं मिल पा रहा है फिर बाकी के मामलों में हम सरकार से क्या उम्मीद रखेंगे?

और पढ़ें : भारतीय राजनीति के पितृसत्तात्मक ढांचे के बीच महिलाओं का संघर्ष

चुनावों से पहले भारी भरकम वायदों की सूची को घोषणा पत्र में शामिल करने वाली केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा की सरकार ने महिला आरक्षण बिल को भी पारित करने का वादा किया था लेकिन साल 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने यह मुद्दा अपने संकल्प पत्र में शामिल करना ज़रूरी तक नहीं समझा। साल 2019 में 17वीं लोकसभा के चुनावों में जीतने वाली महिलाओं की संख्या अब तक की सबसे अधिक संख्या 78 रही पर क्या 543 सीटों वाली लोकसभा में यह संख्या बराबरी का प्रतिनिधित्व करती है? मेरा मानना है कि जब तक राजनीति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व समान नहीं होगा देश में हिंसा और शोषण में मामलों में बढ़ोतरी होती ही रहेगी। कल्पना कीजिए सिर्फ 33 फ़ीसद आरक्षण के लिए इसे संसद में सहयोग नहीं मिल पा रहा है फिर बाकी के मामलों में हम सरकार से क्या उम्मीद रखेंगे?

और पढ़ें : बिहार विधानसभा चुनाव 2020 : जब टिकट ही नहीं मिलता तो सदन तक कैसे पहुंचेंगी महिलाएं


तस्वीर साभार : reputation today

Support us

Leave a Reply