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अपने उदय से लेकर अब तक के विकास में नारीवाद एक ऐसा आंदोलन रहा है जिसमें समय-समय पर अलग-अलग विचारधाराएं जुड़ती रही हैं। दरअसल स्थानीय परिस्थियों के अलग-अलग होने के कारण महिलाओं का संघर्ष भी अलग-अलग रूप में परिभाषित किया गया और यहीं से नारीवाद को लेकर अलग-अलग नज़रिए विकसित हुए। नारीवाद की अलग-अलग मान्यताओं ने औरतों के शोषण की वजहों को अलग-अलग ढंग से देखा और इस प्रकार शुरुआत में जो आंदोलन महिलाओं के वोट देने के अधिकार की मांग तक सीमित था वह धीरे-धीरे ब्लैक नारीवाद, मार्क्सवादी नारीवाद, रेडिकल नारीवाद आदि के रूप में विकसित हुआ। इसी विकास क्रम में सन् 1969 के आस-पास अमेरिका में रेडिकल फेमिनिस्टों से मतभेद रखते हुए नारीवादियों का एक अलग समूह विकसित हुआ जिन्होंने सांस्कृतिक नारीवाद यानि कल्चरल फेमिनिज़म की नींव रखी।

मूल रूप से सांस्कृतिक नारीवाद रेडिकल फेमिनिस्टों से अलग विचार रखता है। रेडिकल फेमिनिज़म के बरक्स यह कोई विचारधारा न होकर मात्र कुछ वैचारिक मतभेद से उपजा नज़रिया है जो महिलाओं को शोषण से मुक्त करने का एक अलग रास्ता सुझाता है। सबसे पहले साल 1975 में ब्रोक विलियम्स ने सांस्कृतिक नारीवाद को परिभाषित करते हुए इसे ‘रेडिकल फेमिनिज़म का अराजनीतिकरण’ कहा था। वह सांस्कृतिक नारीवाद को समझाते हुए कहते हैं कि सांस्कृतिक नारीवादियों का यह मानना है कि महिलाओं को तभी शोषण से आज़ादी मिल सकती है जब पितृसत्तात्मक संस्कृति के बरक्स महिलाओं की अपनी संस्कृति विकसित की जाए। विलियम्स के अनुसार सांस्कृतिक नारीवाद की समर्थक मूल रूप से रेडिकल फेमिनिस्ट ही हैं जो शोषण के राजनितिक पक्ष के बजाय सांस्कृतिक पक्ष को उजागर करती हैं।   

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दरअसल सांस्कृतिक नारीवाद इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि यह आंदोलन का वह हिस्सा है जहां सामाजिक संस्थानों के सांस्कृतिक चरित्र पर ध्यान दिया जाता है। मसलन एड्रीएन रिच ‘मदरहुड’ को दोबारा परिभाषित करती हैं और इसे एक ऐसे सामाजिक संस्थान के रूप में चिन्हित करती हैं जिसे महिलाओं को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया है। सांस्कृतिक नारीवाद किसी भी महिला के ‘स्त्रीत्व’ को अन्य पहचानों से ज्यादा महत्त्व देती हैं। मैरी डैली कहती हैं, “वे महिलाएं जो अपने पिता या बेटे द्वारा दिए गए झूठे समावेशण को स्वीकार कर लेती हैं उन्हें की बनाई गई पहचान मसलन नस्ल, राष्ट्रीयता, वर्ग, धर्म आदि के आधार पर किसी अन्य महिला के विरुद्ध आसानी से खड़ा किया जा सकता है।”   

रेडिकल फेमिनिज़म के दौर तक नारीवादी विमर्श स्त्रियों के शोषण के आर्थिक, सामाजिक और राजनितिक पहलुओं पर बात कर चुका था। मगर सांस्कृतिक विमर्श अब तक अछूता था। यही कारण था कि रेडिकल फेमिनिज़मसे इतर सांस्कृतिक नारीवाद इस आंदोलन का सांस्कृतिक विमर्श बनकर उभरा। सांस्कृतिक नारीवाद के महत्वपूर्ण आलोचक एलिस इकोल्स कहते हैं, “एक ओर रेडिकल फेमिनिज़म एक राजनितिक आंदोलन था जिसका मुख्य उद्देश्य समाज से ‘सेक्स-क्लास सिस्टम’ को ख़त्म करना था। वहीं, सांस्कृतिक नारीवाद एक सांकृतिक आंदोलन था जिसका उद्देश्य पारंपरिक संस्कृति के बरक्स एक ऐसी संस्कृति विकसित करना था जहां पुरुषों की सांस्कृतिक श्रेष्ठता और स्त्रियों की सांस्कृतिक हीनता को बदला जा सके।” ये नारीवादी इस बात पर यकीन करते हैं कि शोषण की जड़ें संस्कृति में हैं और वर्तमान संस्कृति पितृसत्तात्मक है जो महिलाओं को दोयम दर्जे का नागरिक मानती है इसलिए शोषण से मुक्ति के लिए चाहिए कि महिलाएं खुद उस संस्कृति का सृजन करें तभी उन्हें प्राथमिकता मिल पाएगी। वह एक ऐसे कार्यक्षेत्र की भी कल्पना करती हैं जहां केवल महिलाएं काम करें पुरुष नहीं।     

रेडिकल फेमिनिज़म के दौर तक नारीवादी विमर्श स्त्रियों के शोषण के आर्थिक, सामाजिक और राजनितिक पहलुओं पर बात कर चुका था। मगर सांस्कृतिक विमर्श अब तक अछूता था। यही कारण था कि रेडिकल फेमिनिज़मसे इतर सांस्कृतिक नारीवाद इस आंदोलन का सांस्कृतिक विमर्श बनकर उभरा।

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रेडिकल फेमिनिज़म अपने आप में एक बेहद प्रखर विचारधारा को संचालित करने वाला आंदोलन है। नारीवाद की इस धारा का समर्थन करने वाले लोग अमूमन संस्थानों को कठघरे में खड़ा करते हैं और उसे महिलाओं के हित में किए जाने की वकालत करते हैं। मसलन ‘मदरहुड’ के बारे में इनका मानना है कि प्रजनन प्रक्रिया में महिलाएं जितनी ज्यादा भागीदार रहेंगी उनका शोषण उतना ही ज्यादा होगा इसलिए हमें कुछ ऐसी तकनीकों का विकास करना चाहिए जिससे प्रजनन प्रक्रिया में महिलाओं की भूमिका को न्यूनतम किया जा सके। शुलमिथ फ़ायरस्टोन अपनी किताब द डाईलेक्टिव ऑफ़ सेक्स  में कहती हैं, “महिलाओं के लिए तब तक कुछ भी नहीं बदल सकता जब तक कृत्रिम प्रजननया सहायक प्रजनन अपवाद बना रहेगा और प्राकृतिक प्रजनन की प्रक्रिया बरकरार रहेगी। यह प्रक्रिया इसमें शामिल महिला और उत्पन्न होने वाले बच्चे दोनों के लिए लाभदायक नहीं है।” 

इसके बरक्स सांस्कृतिक नारीवादियों का मानना है कि स्त्रीत्व महिलाओं के सशक्तिकरण का एक जरिया है। उनका मानना है कि पुरुष प्रधान संस्कृति महिलाओं के अहित के लिए ज़िम्मेदार है न कि यह परंपराएं। इस तरह वह रेडिकल फेमिनिज़म के उपरोक्त विचार से भी असहमत होती हैं। उपरोक्त विचार पर मिशेल स्टैनवर्थ का कहना है कि वैज्ञानिक तरीकों से प्रजनन प्रक्रिया को अंजाम देने का चलन बढ़ाना महिलाओं के हित में नहीं जाएगा क्योंकि ऐसा करके हम मानव प्रजाति के उद्भव का श्रेय भी उन पुरुषों को दे देंगे जिनका विज्ञान और तकनीक पर वर्चस्व है और जो इन वैज्ञानिक तरीकों से बच्चे पैदा करेंगे। वह कहते हैं कि इससे महिलायें ‘रिप्रोडक्टिव प्रौस्टीट्यूट’ में बदल दी जाएंगी जिन्हें प्रजनन के लिए ज़रूरी एग्स प्राप्त करने की मशीन बना दिया जाएगा।    

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तस्वीर साभार: the candor

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