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मानवीय इतिहास में सत्ता और शोषण और दमन के पहली खेप की शिकार औरतें रहीं। राज्य का अस्तित्व या समुदाय के भीतर किसी व्यक्ति के प्रभुत्व का विचार लैंगिक आधार पर ग़ैर-बराबरी स्थापित करके प्रभावी हुआ। किसी भी तरह के शोषण की पहली भोक्ता औरतें थी। अमरीकी इतिहासकार जर्डा लर्नर अपनी किताब ‘द क्रिएशन ऑफ पेट्रिआर्की’ में लिखती हैं कि गुलामी या शोषण-दमन के लिए पितृसत्तात्मक समाज एक तय शर्त थी। उन्होंने कहा कि पितृसत्तात्मक समाज का उद्भव और गुलामी या किसी अन्य मनुष्य के दबाए जाने की प्रवृत्ति से नज़दीकी संबंध है। ऐतिहासिक रूप से पितृसत्तात्मक समाज गुलामी से पहले वजूद में आया। मानव ने पहले लैंगिक संबंधों में असमानता स्थापित कर समाज में स्थायी असमानता की शुरुआत की।

बाद में, आधुनिक सभ्य समाज की स्थापना होने पर भी पितृसत्ता बनी रही। भेदभाव का मॉडल अब भी लिंग, धर्म, नस्ल, क्षेत्र आधारित रहा। अभी भी औरतों को उनके अधिकारों से वंचित रखा गया। राज्य की संरचना व कार्य करने की प्रवृत्ति के केंद्र में पितृसत्ता बनी रही, लेकिन धीरे-धीरे औरतें जागरूक हुईं और शोषण के इन प्रतिमानों में नीहित मूल कारण को पहचान कर उसे ध्वस्त करने के लिए उठ खड़ी हुईं। साल 2020 कोरोना वायरस महामारी से प्रभावित रहा। इसका सबसे ज़्यादा प्रभाव औरतों, आदिवासियों और अन्य पिछड़े समुदायों पर पड़ा। इस दौरान भी दुनियाभर की राज्य सरकारों ने अनेक ऐसी नीतियां-कानून पारित किए जिनके ख़िलाफ़ जनप्रतिरोध उमड़ पड़ा और उसमें औरतों की व्यापक भागीदारी रही। आइए, जानते हैं, 2020 के बड़े आंदोलनों के बारे में जहां औरतों ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।

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शाहीन बाग, भारत – नागरिकता कानून

नागरिकता संशोधन कानून के ख़िलाफ़ शाहीन बाग की औरतों का सत्याग्रह
नागरिकता संशोधन कानून के ख़िलाफ़ शाहीन बाग की औरतों का सत्याग्रह, तस्वीर साभार: Newsclick

भारतीय संसद द्वारा 11 दिसंबर, 2019 को नागरिकता (संशोधन) कानून पारित किया गया। इस कानून के तहत 1955 के नागरिकता कानून को संशोधित करते हुए उन लोगों को नागरिकता प्रदान करने की बात कही गई जो अफ़गानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से 31 दिसंबर 2014 के पहले भारत आ चुके हैं और हिंदू, सिख, बौध, जैन, पारसी अथवा ईसाई हैं। सरकार के इस कदम का देशभर में विरोध हुआ। यह पहली बार था, जब भारतीय कानून में नागरिकता के लिए धर्म प्रमुख आधार बनाया गया था। देशभर में विश्वविद्यालयों से लेकर सड़कों पर इस कानून के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन हुए, लेकिन जो आंदोलन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विमर्श का विषय बना, वह था- शाहीन बाग का महिला आंदोलन।

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यह आंदोलन नागरिकता कानून पारित होने के बाद दिल्ली स्थित जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्रों के विरोध प्रदर्शन के बाद पुलिस द्वारा विश्वविद्यालय परिसर के अंदर घुसकर की गई पुलिसिया हिंसा के बाद शुरू हुआ था। यह एक शांतिपूर्ण प्रतिरोध था, जिसका नेतृत्व महिलाएं कर रही थीं। इस आंदोलन द्वारा महिलाएं नागरिकता कानून के साथ-साथ एनआरसी और एनपीआर का विरोध कर रही थी। इस आंदोलन में सभी उम्र की महिलाएं शामिल थीं। मशहूर पत्रिका ‘टाइम’ ने 82 साल की प्रदर्शनकर्ता बिलकिस बानो को 2020 के सर्वाधिक प्रभावित करने वालों की सूची में शामिल किया है। महिलाओं के इस प्रतिरोध ने दुनिया भर की नज़र अपनी ओर खींची। यह आंदोलन 14 दिसंबर,2019 से शुरू होकर 24 मार्च 2020 तक चला। कोरोना महामारी के कारण वहां से प्रदर्शन कारियों को हटाया गया। मौजूदा समय में भारत में राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं द्वारा नियंत्रित यह अपनी तरह का पहला आंदोलन था। आने वाले समय में यह आंदोलन महिलाओं की सामूहिक भागीदारी के संबंध में देश के सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक फलक पर उनकी अलहदा व सशक्त पहचान का पूर्व-परिचय कहा जाएगा।

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हाथरस गैंगरेप प्रोटेस्ट

हाथरस: क्या मृतकों के परिवार के पास अब अंतिम संस्कार का भी अधिकार नहीं है
हाथरस घटना के खिलाफ प्रदर्शन, तस्वीर साभार: AlJazeera

14 सितंबर 2020 को उत्तर प्रदेश के हाथरस में एक दलित महिला का बलात्कार उसी गांव के चार उच्च-जातीय पुरुषों द्वारा किया गया। इस मामले में पुलिस, सरकार और सामाजिक अभिजात्य तबके का नकारात्मक रवैया समाज में मौजूद जाति-लिंग संरचना को लेकर बहुत कुछ बयान कर रहा था। सर्वाइवर की मौत के बाद पुलिस द्वारा उसका अंतिम संस्कार भी कर दिया गया, जिसमें न परिवार को शामिल किया गया था, न ही उनकी राय ली गयी थी। घटना के बाद पुलिस ने यह भी कहा था कि सर्वाइवर के साथ रेप हुआ ही नहीं। हालांकि अब जाकर सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में चारों आरोपियों पर रेप और हत्या का आरोप लगाया है।

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दिल्ली विश्वविद्यालय के लेडी श्री राम कॉलेज की छात्रा के ‘सांस्थानिक हत्या’ के ख़िलाफ़ प्रोटेस्ट

2020 के नवंबर 2 को दिल्ली विश्वविद्यालय के लेडी श्री राम कॉलेज में पढ़ने वाली तेलंगाना की 19 वर्षीया छात्रा ऐश्वर्या रेड्डी के सुसाइड नोट ने ‘ऑनलाइन शिक्षा प्रणाली’, समाज मे मौजूद ‘डिजिटल डिवाइड’ और राज्य और विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली को लेकर तमाम सवाल उठाए, जिसने इन मुद्दों को लेकर एक नई बहस को जन्म दिया। बड़ी संख्या में छात्राओं और एक्टिविस्ट ने प्रोटेस्ट करते हुए कॉलेज को इस घटना की ‘सांस्थानिक जिम्मेदारी’ लेने की बात कही और विरोध प्रदर्शन किया। ऐश्वर्या द्वितीय वर्ष की छात्रा थीं जो तेलंगाना के एक ग़रीब परिवार से थीं। लॉकडाउन के दौरान ऑनलाइन पढ़ाई के लिए उनके पास लैपटॉप नहीं था, साथ ही उन्हें कॉलेज की ओर से बकाया स्कॉलरशिप भी नहीं मिली थी। इन सभी कारणों ने उन्हें आत्महत्या करने को बाध्य किया। दरअसल, मौजूदा समय ग़रीब और पिछड़े परिवारों के लिए अत्यधिक मुश्किल रहा है। जहां एक ओर कोविड महामारी के कारण उनकी आर्थिक स्थिति विकट हुई हैं, वहीं मानसिक स्तर पर भी वे प्रभावित हुए है। साथ ही, विश्वविद्यालय एवं विद्यालयों की पढ़ाई ऑनलाइन होने से उन्हें समाज में मौजूद डिजिटल डिवाइड का शिकार होना पड़ा है। 2017-18 की नेशनल सैम्पल सर्वे रिपोर्ट के अनुसार भारत के केवल 24% घरों में इंटरनेट की सुविधा है, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में यह मात्र 15% है। ऐसे में, ऐश्वर्या जैसे होनहार लोगों को लैपटॉप और इंटरनेट की कमी तथा पारिवारिक स्थितियों और जिम्मेदारी के अतिरिक्त बोझ के समय में विकल्पहीनता के कारण यह कदम उठाना पड़ता है। इस प्रोटेस्ट में दिल्ली विश्वविद्यालय सहित अंबेडकर विश्वविद्यालय व जेएनयू के छात्र-छात्राएं व अन्य प्रगतिशील समूह शामिल थे जिन्होंने सांस्थानिक बेखबरी के रवैये पर सवाल उठाया।

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आशा वर्कर्स का प्रोटेस्ट

आशा कार्यकर्ताओं का प्रदर्शन, तस्वीर साभार: ANI

अगस्त 2020 में देशभर की ‘अक्रेडिटेड सोशल हेल्थ एक्टिविस्ट’ यानि आशा कार्यकर्ताओं ने दो दिन की हड़ताल की। इस विरोध प्रदर्शन में उन्होंने बेहतर आय और देशभर में बढ़ते कोरोनावायरस के संकट के दौरान रोग से बचाव के लिए बेहतर सुरक्षा उपादानों और बीमा की मांग की थी। इस प्रोटेस्ट में देशभर की लगभग 6 लाख आशा कार्यकर्ता शामिल हुई थी। इस दौरान उन्होंने काम के दौरान जोख़िम भरी परिस्थितियों का सामना करने से सुरक्षा की मांग की, साथ ही देशभर में हो स्वास्थ्य सेवाओं और संस्थानों के निजीकरण का विरोध किया। यह प्रोटेस्ट बिहार से लेकर, आंध्रा तक हुआ, जिसमें महिलाओं ने अपनी मांगें सरकार के सामने रखीं। 

किसान आंदोलन 2020, भारत

ग्राउंड रिपोर्ट: जानिए क्या कहना है प्रदर्शन में शामिल महिला किसानों का
प्रदर्शन में शामिल महिला किसान

भारतीय संसद द्वारा 27 सितंबर 2020 को कृषि सुधार के तहत तीन बिल पारित किए गए हैं। इन सुधारों के माध्यम से कृषि क्षेत्र को बाज़ार के लिए खोला गया है, सरकार ने इन सुधारों के माध्यम से पूर्व नियोजित अनुबंध के तहत किसानों और कॉरपोरेट के बीच संबंध स्थापित करने की कोशिश की है। साथ ही, मंडियों के बाहर भी ख़रीद और बिक्री का अवसर प्रदान किया है। इन आकस्मिक परिवर्तनों और सरकार की नीतिगत अक्षमता देखते हुए किसान सहज नहीं हैं और अविश्वास के चलते वे सड़कों पर उतर आए हैं। यह किसान आंदोलन दो फ़लक पर बहुत महत्वपूर्ण है। आमतौर पर जब भी किसान की बात कही जाती है, पहले से गढ़ी गई पुरुष की छवि हमारे दिमाग में आ जाती है। समाज की संरचना इस तरह से बनाई गई है कि खेती में औसत से अधिक श्रम देने के बावजूद भी औरतों को किसान के रूप में मान्यता नहीं मिली है, लेकिन इस किसान आंदोलन में औरतें खेतों से निकलकर सड़कों तक आ गई हैं। वे घरों में अपने हक़ के लिए तो लड़ रही ही हैं, साथ ही, बाहर भी पुरुषों से पीछे नहीं हैं और खड़े होकर अपने अधिकार की लड़ाई लड़ रही हैं। यह प्रतीकात्मक अर्थ में बहुत बड़ा कदम है, उन्होंने स्पष्ट संदेश दे दिया है कि ज़मीनें उनकी भी हैं। दूसरी बात, यह आंदोलन केवल महिलाएं ही नहीं लड़कियां भी लड़ रही हैं, यानी इस प्रतिरोध ने वह रेखा भी तोड़ दी जो लड़कियों को पराया कहकर उन्हें मायके की ज़मीनों से बेदखल कर देती थी। 

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इस आंदोलन में बुज़ुर्गों के साथ नई पीढ़ी भी है। नए ज़माने के युवा जिन्हें कॉरपोरेट के काम करने का तरीका और स्टेट-कॉरपोरेट नेक्सस की भली-भांति जानकारी है, वे इन कानूनों में अदृश्य रूप से मौजूद विभेदों को उधेड़कर बुज़ुर्गों के समक्ष रख रहे हैं। लड़कियां औरतों के सामूहिक रूप से एकजुट होकर धरना करने का महत्व समझ रही हैं। इन धरनों के माध्यम से घरेलू कामकाज के विभाजन का पारंपरिक ढांचा टूट रहा है। अब वह दौर नहीं रहा जब किसी भी ज़रूरी बातचीत से औरतों को बाहर कर दिया जाता था और निर्णायक भूमिका में पुरुष आ जाते थे, अब वे घरों में चूल्हा-चौका बनाने तक सीमित नहीं हैं। किसान आंदोलन 2020 में महिलाओं की मौजूदगी ने ‘डोमेस्टिक लेबर के डिवीज़न’ की बखिया उधेड़ते हुए पितृसत्ता को झकझोर कर भारतीय वैचारिकी में नए विमर्श (नैरेटिव) की नींव गढ़ी है। 

औरतें यह समझ चुकी हैं कि उनके साथ दोयम दर्जे का व्यवहार होता है। तभी तो ‘स्त्री जागृति एकता मंच’ की अमनदीप कौन देओल कहती हैं कि हमारे साथ भेदभाव होता है। चाहे शिक्षा की बात हो या भोजन की, हम कभी भी प्राथमिकता में नहीं होते और किसान बिलों के पारित होने पर यह स्थिति और गंभीर होगी।’  आंदोलन कर रही ‘सुरिंदर’ कहती हैं कि पुरुष यहां आकर विरोध दर्ज कर पा रहे हैं क्योंकि अभी भी हमारी बहुत सी बहनें काम संभाल रही हैं। यानी महिलाएं संख्या कम होने के कारण को भी सीधे तौर पर रख देना चाह रही हैं कि हम दिख भले न रहे हों, लेकिन हम हैं। इस विरोध में हम पुरुषों के कंधे से कंधा लड़कर चल रहे हैं। निश्चित तौर पर, खेतिहर महिलाओं की यह सार्वजनिक मौजूदगी ग्रामीण क्षेत्रों में व्यापक बदलाव लाएगी।

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गायत्री हिंदू कॉलेज से इतिहास विषय में ऑनर्स की पढ़ाई कर रही हैं। मूलत: उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र के एक छोटे से गांव से दिल्ली जाने वाली पहली महिला के रूप में उनके पास सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य से जुड़े बहुत सारे अनुभव हैं, जो इंटरसेक्शनल नारीवाद की ओर उनके झुकाव के प्रमुख कारक हैं। उनकी दिलचस्पी के विषयों में नारीवाद को गांवों तक पहुंचाना और ग्रामीण मुद्दों को मुख्यधारा में ले आना शामिल हैं।

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