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‘शादी को साल लगने को अब तो गुड न्यूज़ दे दो।‘

‘बस जल्दी से परिवार पूरा कर लो।‘

‘खुश ख़बरी कब दे रही?’

‘अरे! बच्चा भी कोई प्लान करने की चीज़ है?’

‘पुत्रवती रहो।‘ और न जाने क्या-क्या। ऐसी ढ़ेरों बातें हर उस लड़की को सुननी पड़ती है, जिसने हाल ही में शादी की हो। यों तो आज़ादी के बाद से फ़ैमली प्लानिंग या परिवार नियोजन की योजनाओं को सरोकार से जोड़ने का काम शुरू कर दिया गया, न केवल जनसंख्या विस्फोट को रोकने बल्कि बाल एवं मातृ मृत्युदर को भी रोकने के लिए। पर वास्तव में इसे असल ज़िंदगी में लागू करना आज भी एक बड़ी चुनौती है।

परिवार नियोजन के उपायों को हमारा पितृसत्तात्मक समाज ‘बेटे’ के जन्म के बाद ही मानता और स्वीकारता है, क्योंकि आमतौर पर भारतीय मध्यमवर्गीय के लिए परिवार नियोजन का मतलब ‘बच्चे पैदा करने की प्लानिंग नहीं,’ बल्कि ‘बच्चे पैदा होने से रोकने का उपाय’ होता है। परिवार नियोजन की यही संकीर्ण समझ हमेशा महिलाओं के ऊपर भारी पड़ती है, जब वे शादी की संस्था से जुड़ती है। ये सोच महिलाओं के विकास, स्वास्थ्य और अवसरों को सीधेतौर पर प्रभावित करती है।  

हमारा पितृसत्तात्मक समाज ‘परिवार’ की अवधारणा को भी पितृसत्ता के रंग से रंगे हुए है, इस रंग में माता-पिता और उनके बच्चे (लड़का-लड़की की खाँचे में सेट) मूल होते है। इसलिए शादी के तुरंत बाद ये उम्मीद की जाती है कि महिला-पुरुष जल्द बच्चे पैदा करके एक ‘आदर्श परिवार’ की शुरुआत करें। अब हो सकता है आप कहें कि ‘इसमें ग़लत क्या है।‘ जी, इसमें ग़लत नहीं बल्कि बहुत ग़लत है, क्योंकि आदर्श परिवार बसाने का ये दबाव कई बार न केवल वर्तमान को बल्कि पूरे भविष्य को बर्बाद कर देता है, तब जब –

कम उम्र में छूट जाता है साथी का साथ

अक्सर गाँव में महिलाओं और किशोरियों के साथ काम करते हुए ऐसे कई केस देखती हूँ, जब शादी के एक-दो साल ही में महिलायें माँ बन जाती है और किसी कारणवश साथी की मौत के बाद वे आर्थिक रूप से असहाय हो जाती हैं और छोटे-छोटे बच्चे के चलते वे खुद की ज़िंदगी और आजीविका के लिए कोई फ़ैसला नहीं ले पाती है।

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आर्थिक तंगी से जूझता है परिवार

बच्चे एक बड़ी ज़िम्मेदारी होते है। बेटे ही चाह में कई बेटियाँ पैदा करना हमारे पितृसत्तात्मक समाज में आज भी आम है। आज भी गाँव और पिछड़े क्षेत्रों में बेटों की चाह में कई बच्चे पैदा करने का चलन देखा जा सकता है। ऐसे में जीवनभर परिवार आर्थिक तंगी से जूझता रहता है, जिससे वो परिवार की बुनियादी ज़रूरतों को भी पूरा नहीं कर पाता है। वहीं एक समय के बाद बेटियाँ बोझ बनने लगती है और बेटों पर पैसे कमाने का दबाव दिया जाने लगता है।

परिवार का मतलब सिर्फ़ बच्चे पैदा करना नहीं है, बल्कि परिवार की मतलब वो है जो आप समझते है, स्वीकारते है और जिसमें आप सहज होते है।

अनचाहा परिवार और मानसिक समस्याएँ

कई बार दबाव के चलते शादी के शुरुआती सालों में ही लड़कियाँ माँ बन जाती है। ये फ़ैसला सामाजिक दबाव के चलते इतने जल्दी में किया जाता है कि इस दौरान महिला पुरुष एकदूसरे को ठीक से समझ भी पाते है और इसके बाद जब आगे चलकर उनके रिश्ते बिगड़ते हैं तो बच्चों के चलते वे चाहकर भी अलग नहीं हो पाते। नतीजतन पितृसत्ता वो शुरुआती आदर्श परिवार जल्द अनचाहे परिवार में बदल जाता है और महिला व पुरुष को नहीं बल्कि पूरे परिवार को जीवनभर मानसिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

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ये कुछ ऐसी परिस्थितियाँ और समस्याएँ हैं जो न केवल एक इंसान बल्कि उस इंसान से जुड़े हार इंसान को प्रभावित करती है। इसलिए ज़रूरी है कि परिवार नियोजन को लेकर अपनी समझ को और वृहत किया जाए। इसे सिर्फ़ नसबंदी, कंडोम या गर्भनिरोधक गोलियों तक ही नहीं बल्कि माता-पिता बनने के लिए मानसिक और आर्थिक तैयारी पर भी ज़ोर दिया जाए।बच्चे पैदा करना प्रकृति की नहीं बल्कि महिला-पुरुष के शारीरिक संबंधों की देन है और जिस तरह अपने अपने हर दिन, काम, शिक्षा, रोज़गार और शादी को प्लान करते है, ठीक उसी तरह ज़रूरी है कि बिना किसी सामाजिक दबाव के परिवार बढ़ाने का भी प्लान करें। हम प्लान करें कि क्या हम बच्चे को बेहतर भविष्य देने के लिए आर्थिक रूप से तैयार है? क्या हम बच्चे को बतौर माता-पिता वक्त दे पाएँगें? और सबसे अहम क्या हम एक-दूसरे को अच्छी तरह समझते है? ये वो बुनियादी सवाल है को भविष्य के रिस्क रेट को कम करते है।

ध्यान रखें कि बच्चे पैदा करना या नहीं करना, ये आपका बेहद निजी फ़ैसला है। और परिवार का मतलब सिर्फ़ बच्चे पैदा करना नहीं है, बल्कि परिवार की मतलब वो है जो आप समझते है, स्वीकारते है और जिसमें आप सहज होते है। साथ ही, बच्चे पैदा करना शादी की सफलता या विफलता का कोई मानक नहीं है। इसलिए शादी, परिवार और रिश्ते इन सबके मायनों को ख़ुद तराशिए और परिवार नियोजन को उपायों तक नहीं बल्कि माता-पिता बनने की प्लानिंग में शामिल करिए।

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तस्वीर साभार : indianfolk

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