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खेल, यह शब्द सुनते ही हमारे दिमाग के घोड़े एक ख़ास रास्ते पर दौड़ने लग जाते हैं। इस रास्ते में दो तरह के लोग आते हैं- पहला शारीरिक श्रम करने वाले, दूसरा मानसिक श्रम करने वाले। यूं तो हर तरह के खेल में मानसिक श्रम की ज़रूरत है मगर चेस यानी शतरंज एक विशिष्ठ खेल है जहां आपको दिमागी रूप से अपेक्षाकृत अधिक मज़बूत होना पड़ता है। मगर खेल के दोनों ही प्रकार में हम आम तौर पुरुषों से भरी छवि की ही कल्पना करते आए हैं। क्रिकेट के मैदान से लेकर रेस के ट्रैक तक हर ओर पुरुषों का जमावड़ा है। इसी जमावड़े में एक लड़की घुस आई है, जिसकी कहानी है- द क्वींस गैम्बिट। 1983 में वॉल्टर टेविस द्वारा लिखित उपन्यास ‘द क्वींस गैम्बिट’ पर आधारित इस मिनी सीरीज़ को स्कॉट फ्रैंक और एलन स्कॉट द्वारा बनाया गया है। 23 अक्टूबर 2020 को ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म नेटफ्लिक्स पर रिलीज़ हुई इस सीरीज़ में आन्या टेलर जॉय ने एलिज़ाबेध हारमन का किरदार निभाया है।

क्वींस गैम्बिट मुख्य रूप से एक लड़की एलिज़ाबेथ हारमन के बारे में है। एलिज़ाबेथ की मां का एक सड़क दुर्घटना में निधन हो जाने के बाद उसे अनाथालय भेज दिया जाता है। यहां उसकी मुलाकात अनाथालय में काम करने वाले मिस्टर शाइबल से होती है। वह उन्हें चेस खेलते हुए देखती है और बाद में उनसे सीखती है। पूरी सीरीज़ में एलिज़ाबेथ शतरंज के दांवपेंच के दम पर अपने आस-पास के हर पुरुष को हार मानने पर मजबूर करती है। यह बात सीरीज़ और समाज दोनो के ही संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाती है।

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दरअसल चेस की एक विशेषता यह भी है कि उसे खेलते हुए सामने वाला व्यक्ति आपके बराबर हो जाता है, यानि आपके और आपके प्रतिद्वंद्वी के बीच कोई अंतर नहीं रह जाता। लेकिन, पुरुष यह कैसे स्वीकार लेते कि महिलाएं उनके बराबर हो जाएं, साथ ही जो समुदाय खुद को सर्वश्रेष्ठ मान चुका हो वह यह कैसे सोचता कि महिलाएं भी बुद्धिमान होती हैं। ऐतिहासिक रूप से औरतों को मंदबुद्धि ठहराकर ही तो परंपरागत रूप से उन्हें कमतर दिखाया जाता रहा है। यही कारण है कि इस दुर्दशा को दिखाने के लिए क्वींस गैम्बिट की पटकथा लेखक मिस्टर शाइबेल के मुंह से यह कहलवाता है कि ‘लड़कियां शतरंज नहीं खेलती।’ जबकि सच्चाई तो यह है कि लड़कियां चेस नहीं खेलती क्योंकि ‘पुरुष प्रधान समाज ने उन्हें खेलने नहीं देता।’ 

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क्वींस गैम्बिट के पहले एपिसोड की शुरुआत में एक सीन है जहां न सिर्फ एलिज़ाबेथ का प्रतिद्वंदी बल्कि खेल देखने वाले सारे दर्शक़ भी केवल पुरुष हैं। पूरे फ़्रेम में एलिज़ाबेथ के अलावा केवल एक महिला है जो ‘साइड लाइन’ में बैठी हुई है। इसी तरह का एक और दृश्य तब सामने आता है जब एलिज़ाबेथ का सामना हाईस्कूल के शतरंज के खिलाड़ियों से होता है। यह ख़िलाड़ी भी सिर्फ लड़के ही हैं। समय गुज़रता है सीरीज़ आगे बढ़ती है मगर फ्रेम में पुरुषों का वर्चस्व बना रहता है। अपनी कल्पनाशीलता को अगर बढ़ाएंगे तो समझ आएगा यह केवल एक शॉट नहीं बल्कि हमारे पितृसत्तात्मक समाज का प्रतिबिंब भी है। असल ज़िन्दगी में भी स्थितियां ऐसी ही हैं। समय गुज़रा है,हम आदिम साम्यवादी समाज से निकलकर आधुनिक पूंजीवादी समाज तक पहुंच चुके हैं लेकिन पुरुषों का वर्चस्व आज भी कायम है। यह वर्चस्व न सिर्फ आधिकारिक पदों पर दिखता है बल्कि लगभग सभी क्षेत्रों सहित खेलों में भी मौजूद है। इसी धारणा को तोड़कर पुरुष प्रतिद्वंदियों को परास्त करती हुई क्वींस गैम्बिट की एलिज़ाबेथ विशेष हो जाती है।

क्वींस गैम्बिट की पटकथा लेखक मिस्टर शाइबेल के मुंह से यह कहलवाता है कि ‘लड़कियां शतरंज नहीं खेलती।’ जबकि सच्चाई तो यह है कि लड़कियां चेस नहीं खेलती क्योंकि ‘पुरुष प्रधान समाज ने उन्हें खेलने नहीं देता।’ 

हालांकि एलिज़ाबेथ का जीवन सामान्य नहीं है। उसका बचपन अपनी मां को एक आदमी से लड़ते देखते बीता है। वह यह भी नहीं जानती कि वह आदमी असल में उसका पिता है। अपनी मां का रोता हुआ चेहरा उसके ज़हन में अचानक ही उमड़ पड़ता है। लेकिन यह चित्र सिर्फ इस लिहाज़ से ही महत्वपूर्ण नहीं है कि एलिज़ाबेथ भावुक है और बचपन की गतिविधियों ने उसपर ख़ासा प्रभाव छोड़ा है। इन सब का महत्त्व इसलिए भी है क्योंकि यह दिखाते हैं कि महिलाओं के लिए जीवन सरल नहीं है। दरअसल एलिज़ाबेथ के लिए चेस केवल एक खेल नहीं है बल्कि यह उसके अतीत की बुरी स्मृतियों का ‘रिप्लेसमेंट’ भी है। शुरुआत में जहां नशीली दवा लेने के बाद उसके मन में अपने माता-पिता के झगड़ों के चित्र उमड़ते हैं, वहीं बाद में इसकी जगह ‘शतरंज की चाल’ के चित्र ले लेते हैं।

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इसे आज के दौर की त्रासदी कहिए कि एलिज़ाबेथ के शतरंज में माहिर होने और देश-विदेश के बड़े-बड़े टूर्नामेंट जीतने से ज़्यादा यह मायने रखता है कि एक लड़की ने यह कमाल किया है। इस बात पर चौंकना हमारे लिए दुर्भाग्यपूर्ण होना चाहिए क्योंकि यह दिखाता है कि समाज ने महिलाओं को नाक़ाबिल समझ लिया है। सीरीज़ के इस पहलु से गुज़रते हुए आप समझ पाएंगे कि कैसे सारे संसाधनों पर पुरुषों का कब्ज़ा है और इसलिए संसाधन विहीन करके कम दिमाग वाला जीव होने का लेबल महिलाओं के सिर पर चिपका दिया गया है। पूरी सीरीज़ में लगातार जीतती एलिज़ाबेथ को देखते हुए हम भूल जाते हैं कि वह शतरंज की मास्टर होने के साथ ही एक आम लड़की भी है। वह लड़की जो किसी की ओर आकर्षित हो सकती है और जो रो सकती है। यही कारण है कि तमाम हादसों से गुज़रकर शांत रह जाने वाली एलिज़ाबेथ का अपने गुरु मिस्टर शाइबेल की मौत के दौरान फूट-फूटकर रोना हमें और भी अधिक भावुक कर जाता है।

क्वींस गैम्बिट का एक दृश्य, तस्वीर साभार: Lifestyle Asia Hong Kong

इसी तरह हर व्यक्ति के जीवन में प्रेम एक महत्वपूर्ण घटना है। इसलिए यह एलिज़ाबेथ के लिए भी है। हर व्यक्ति को अपने प्रेमी से यह आशा होती है कि वह उसका ख्याल रखेगा, अच्छी चीजों में उसका साथ देगा और ग़लत जगह पर चेतावनी देगा। हैरी बेल्टिक के रूप में हैरी मैल्लिंग का किरदार ऐसा ही है। वह एलिज़ाबेथ से प्यार करता है और उसकी चिंता करता है। वह रूस के चेस मास्टर को हराने में एलिज़ाबेथ की मदद करता है और साथ ही नशीली दवाई के सेवन करने पर उसे चेताता भी है। सीरीज़ का यह हिस्सा दर्शक को एलिज़ाबेथ की निज़ी ज़िन्दगी की ओर ले जाता है और सीरीज़ को उबाऊ होने से बचा लेता है। यह सीरीज़ एलिज़ाबेथ की कहानी कहते हुए अप्रत्यक्ष रूप से अलग-अलग सामाजिक आयामों को छूती हुई जाती है। सीरीज़ की पृष्ठभूमि 1960 के दौर की है मगर बहुत सी बातें आज के सच को भी प्रतिबिंबित करती चलती हैं। यह दिखाता है कि इतने समय बाद भी हम जिस समाज में रह रहे हैं, वह अपनी सामंतवादी प्रवृत्तियों से उबर नहीं पाया है।

हर इंसान अपनी एथनेसिटी से जुड़ा हुआ है। सामाजिक संरचना इस तरह है कि कुछ लोग जो ख़ास तरह के संस्थानों से संबद्ध हैं, वे नहीं चाहते कि कोई भी व्यक्ति इन पहचानों से मुक्त हो। धर्म इन्हीं संस्थानों में से एक है। सोवियत संघ जाने की तैयारी के दौरान ही एलिज़ाबेथ का सामना उन धार्मिक ठेकेदारों से होता है जो चेस क्लब का संचालन का कर रहे हैं। उनका मानना है कि धर्म को साम्यवाद से खतरा है इसलिए वे चाहते हैं कि एलिज़ाबेथ साम्यवाद के खिलाफ बयान जारी करे। यहां एलिज़ाबेथ ठीक उसी तरह हैरान रह जाती है जैसे हर वह व्यक्ति हो जाता है जो अपने घर की चार दिवारी के भीतर बैठकर सालों से अपने धर्म का पालन अपनी शर्तों के हिसाब से कर रहा होता है लेकिन अचानक कोई बाहर का व्यक्ति बताता है कि उसका धर्म खतरे में है। एलिज़ाबेथ ने ऐसा कोई भी बयान देने से इनकार कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि चेस क्लब द्वारा उसको दी जाने वाली मदद छीन ली जाती है। यह ठीक उस तरह है, जैसे हमारे समाज में पारंपरिक बंधनों और धर्म को छोड़कर अलग रास्ते पर चलने वाले किसी भी व्यक्ति से सामाजिक सुविधाएं छीन ली जाती हैं।

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एलिज़ाबेथ द्वारा स्टेट से आर्थिक सहायता मांगने पर उसे निराशा हाथ लगती है, मगर स्टेट द्वारा उसके साथ जाने के लिए एक व्यक्ति भेजा जाता है जो असल में एक एजेंट है। वह जासूस चाहता है कि एलिज़ाबेथ उससे हर बात साझा करे। वह रूस के खिलाड़ियों को शक की निगाह से देखने के लिए कहता है। यह वैश्विक राजनीति की उस परिस्थिति और वैश्वीकरण की उस विडंबना को दर्शाता है जहां एक व्यक्ति नागरिक तो है मगर उसे विश्व के दूसरे हिस्से में मौजूद इंसान पर यकीन नहीं है। सोवियत यूनियन के सबसे अच्छे ख़िलाड़ी को हरा देने के बाद एलिज़ाबेथ जब बाहर निकलती है तो पूरी दुनिया का के बड़े-बड़े अखबार और मैगज़ीन के पत्रकार उसकी प्रतिक्रिया जानने का इंतज़ार कर रहे होते हैं। इस दौरान एलिज़ाबेथ अपने साथ आए हुए एजेंट से उन्हें नज़रंदाज़ करके आराम करने के लिए जाने को कहती है लेकिन वह उससे कहता है कि यह अच्छा मौका है दुनिया को यह बताने के लिए कि ‘तुम बेहद खुशनसीब हो कि तुम्हारा जन्म अमेरिका में हुआ है।’  यह दृश्य इस बात का बेहद सटीक उदहारण है कि किस तरह स्टेट अपने देश की हस्तियों और प्रेस का इस्तेमाल अपने एजेंडे को वैध ठहराने के लिए करता है।

क्वींस गैम्बिट में मुख्य किरदार निभा रही आन्या टेलर-जॉय की अदाकारी बेहद प्रभावित करती है। साथ ही अन्य सह-कलाकारों ने भी अपना काम बेहद प्रभावी तरीके से किया है।सीरिज़ के संवाद रोचक हैं और समय-समय पर अलग-अलग आयामों में सीरीज़ को देखने और उस पर सोचने को मजबूर करते हैं। एक और चीज़ जो इस सीरीज़ में दर्शकों का ध्यान खींचती है, वह है इसकी सिनमैटोग्राफ़ी। फ़िल्म में दृश्य इस तरह से उकेरे गए हैं जो इसके विषय की ओर बार-बार आपका ध्यान दिलाते हैं। साथ ही अमेरिका और रूस के शहरों के दृश्य तत्कालीन परिस्थितियों को जीवंत कर देते हैं। कुल मिलाकर खेल के माध्यम से औरतों के प्रतिनिधित्व का सवाल उठाती यह सीरीज़ अपने उद्देश्य में सफल नज़र आती है क्योंकि आज भी खेलों में औरतों की भागीदारी समाज में उनकी भागीदारी के अनुपात में बहुत कम है, उन्हें दर्शकों का साथ पुरुष खिलाड़ियों के अनुपात में बेहद कम मिलता है, यह सोचने की बात है।   

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गायत्री हिंदू कॉलेज से इतिहास विषय में ऑनर्स की पढ़ाई कर रही हैं। मूलत: उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र के एक छोटे से गांव से दिल्ली जाने वाली पहली महिला के रूप में उनके पास सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य से जुड़े बहुत सारे अनुभव हैं, जो इंटरसेक्शनल नारीवाद की ओर उनके झुकाव के प्रमुख कारक हैं। उनकी दिलचस्पी के विषयों में नारीवाद को गांवों तक पहुंचाना और ग्रामीण मुद्दों को मुख्यधारा में ले आना शामिल हैं।

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