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बेरोज़गारी हमारी देश में एक बड़ी समस्या है। जनसंख्या के मुक़ाबले हमारे देश में रोज़गार के अवसर बेहद सीमित है और जो रोज़गार के अवसर मौजूद है वे इतने लैंगिक संवेदनशील नहीं कि रोज़गार के अवसरों में महिला भागीदारी को सुनिश्चित कर सकें। ऐसे में कोरोना का वो समय जब हर तरफ़ भूखमरी और ग़रीबी की भयानक तस्वीरें सामने आ रही थी तो वही दूसरी तरफ़ उस दौर में बहुत लोगों की नौकरियाँ भी छीनी जा रही थी। नतीजतन हज़ारों-लाखों की संख्या में मज़दूरों और नौकरीपेशा लोगों को पलायन करना पड़ा।  

जैसा कि आप जानते हैं गाँव में आज भी लड़कियों और महिलाओं के लिए नौकरी के अवसर बहुत कम है। मैं भी उन्हीं लड़कियों में से एक हूँ, जो गाँव के एक गरीब मज़दूर परिवार से ताल्लुक़ रखती है। कई तकलीफ़ों का सामना करते हुए मैंने बीए तक अपनी पढ़ाई पूरी की। आगे पढ़ने का बहुत मन था, लेकिन घर के हालातों ने बिल्कुल साथ नहीं दिया। मैं हमेशा से नौकरी करना चाहती थी। अपनी ज़रूरतों के लिए किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना चाहती थी। इसके लिए गाँव में रहते हुए कई प्रयास किया लेकिन कहीं काम नहीं मिला। पर कोरोना काल में एक स्वयंसेवी संस्था में मुझे काम का अवसर मिला। इस संस्था को बीएचयू से पढ़े कुछ युवाओं ने शुरू किया है। इसकी संस्थापिका और अध्यक्ष एक महिला है। कोरोनाकाल में इस संस्था ने गाँव की महिला कार्यकर्ताओं को नौकरी पर रखा। संस्था ने ज़रूरतमंद और काम के लिए इच्छुक महिलाओं को काम पर रखना शुरू किया। वो समय जब सबकी नौकरी जा रही थी, उस समय मुझे नौकरी मिलना और मुझ जैसे ज़रूरतमंद महिलाओं को नौकरी मिलना बहुत अच्छा अनुभव रहा। इतना ही नहीं, संस्था की कार्यप्रणाली और कार्यकर्ताओं के लिए योजना बेहद संवेदनशील है। हमारी संस्था में पीरियड लीव जैसी ख़ास सुविधाएँ भी महिलाओं को दी गयी है। जो आमतौर पर अन्य संस्थाओं में देखने को नहीं मिलती है। ऐसी किसी सुविधा का लाभ मिलना, ये मेरा अनुभव है। समय की पाबंदी की बजाय काम की गुणवत्ता को वरीयता देने वाली हमारी संस्था की कार्य-प्रणाली मुझे बेहद पसंद है।

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आपको लग रहा होगा कि मैं आपको ये सब क्यों बता रही हूँ, तो आपको बताऊँ मेरी इन बातों का आशय आपको ये समझाना है कि जब किसी भी संस्था में निर्णय लेने वाले पदों पर महिलाएँ होती है तो काम की प्रणाली पूरी तरीक़े से बदल जाती है। तब संस्था के कार्य महिलाओं व अन्य सभी जेंडर की सुविधाओं और ज़रूरतों को ध्यान में रखते है।

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मैंने गाँव में काम करने वाली और भी कई संस्थाओं को देखा है, जिसके निर्णय लेने वाले पदों पर पुरुष है। कहने को तो ये संस्थाएँ महिला उत्थान के लिए काम करती है, इसको दिखाने के लिए ये अपने यहाँ नौकरी पर भी अधिकतर महिलाएँ ही रखते हैं, लेकिन इसके बावजूद इन संस्थाओं की कार्य-प्रणाली कहीं से भी संवेदनशील नहीं है। अख़बारों में महिला-सुरक्षा ने नामपर कार्यक्रमों की ढ़ेरों ख़बरें इन संस्थाओं की प्रकाशित की जाती है, लेकिन वहीं दूसरी तरफ़ इनकी संस्था में ख़ुद यौन उत्पीड़न रोकने के लिए कोई भी समिति का गठन नहीं किया गया और न ही महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कोई नीति बनायी गयी। ऐसे में पीरियड लीव जैसी सुविधाएँ तो बहुत दूर की बात है। कहने का मतलब ये है कि जब कार्यस्थल पर निर्णय लेने वाले पदों पर महिलाएँ होती है तो वहाँ की कार्य-प्रणाली ही बदल जाती है। आइए जानते है कुछ ऐसे ही प्रभाव जो मैंने अनुभव किए है और मौजूदा समय में कर भी रही हूँ –

संवेदनशील कार्यस्थल

जब किसी कार्यस्थल पर महिला नेतृत्व यानी कि महिला बॉस होती है तो वो जगह आम कार्यस्थलों से ज़्यादा संवेदनशील होती है। वहाँ महिलाओं व अन्य जेंडर की सुविधाओं का ख़ास ध्यान रखा जाता है। महिला नेतृत्व वाले कार्यस्थलों में यौन उत्पीड़न, स्वास्थ्य, स्वच्छता और सुरक्षा संबंधित बुनियादी मुद्दों पर अन्य जगहों की बजाय ज़्यादा संवेदनशीलता से काम किया जाता है। इसलिए महिला नेतृत्व वाली संस्थाओं की ये ख़ासियत है कि ये कार्यस्थल अन्य कार्यस्थलों की अपेक्षा ज़्यादा संवेदनशील होते है।

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महिला नेतृत्व और अवसरों को बढ़ावा

महिला नेतृत्व वाले कार्यस्थलों पर महिलाओं के नेतृत्व और उनके लिए विकास के अवसरों को ज़्यादा बढ़ावा दिया जाता है, उनके विकास संबंधित अवसरों का भी स्वागत किया जाता है। आमतौर पर अन्य पुरुष नेतृत्व वाले कार्यस्थलों में महिला नेतृत्व या उनके लिए अवसरों पर कोई ख़ास ध्यान नहीं दिया जाता है।  

कहने का मतलब ये है कि जब कार्यस्थल पर निर्णय लेने वाले पदों पर महिलाएँ होती है तो वहाँ की कार्य-प्रणाली ही बदल जाती है।

महिला विचारों की स्वीकृति और सहमति को वरीयता कार्यस्थल

महिलाओं के विचारों की स्वीकृति या उनकी सहमति को आमतौर पर हमारे समाज में कोई वरीयता नहीं दी जाती है। कई बार क्योंकि हम महिला है इस आधार पर हमें अपने कार्यस्थल पर भी जेंडर की वही संकीर्ण परिभाषा और उसके खाँचे का सामना हमें करना पड़ता है। लेकिन मैंने ये महसूस किया है कि महिला नेतृत्व वाले कार्यस्थलों में महिला विचारों को जगह दी जाता है। कई बार उन्हें उनके विचार रखने के लिए प्रोत्साहित भी किया जाता है। इसके साथ ही, महिलाओं की सहमति को भी कार्यस्थल में वरीयता दी जाती है।

परोपकार नहीं स्वाभाविक महिला विकास

पुरुष नेतृत्व वाले कार्यस्थलों में महिला विकास व संवेदनशीलता के लिए किए जाने वाले हर प्रयास या योजना को हमेशा महिलाओं पर किसी परोपकार की तरह दिखाया और देखा जाता है। पुरुष बॉस को महिलाओं के लिए किसी योजना के लिए अक्सर महान माना जाता है। वहीं महिला नेतृत्व वाले कार्यस्थलों में ये सब बेहद स्वाभाविक होता है। क्योंकि कार्यस्थल पर महिला नेतृत्व है इसलिए कार्य-प्रणाली महिलाओं को ध्यान में रखकर होंगीं, ये स्वाभाविक होता है, बिना किसी को महान बताए।

ये कुछ ऐसे बिंदु हैं जिन्हें मैंने अपने कार्यस्थल पर महसूस किया है। साथ ही, मेरा मानना है कि जब कोई भी कार्यस्थल आपके अनुकूल होता है तभी आप अपने काम और जीवन में विकास कर पाते हैं। हमारे समाज में महिला नेतृत्व वाले कार्यस्थल बहुत कम है। हर क्षेत्र में महिला कार्यकर्ता मिल सकती है, कई क्षेत्रों में ज़्यादा तो कुछ में कम भी। लेकिन निर्णय लेने वाले पदों में महिला बेहद कम है। मेरा विश्वास है कि जब कार्यस्थल पर महिला नेतृत्व होता है, वहाँ के सभी निर्णय महिलाएँ लेती है तो वो कार्यस्थल ज़्यादा संवेदनशील है। उन कार्यस्थलों की कार्य-प्रणाली गुणवत्तापूर्ण और कार्यकर्ताओं के विकास व उनकी सुविधाओं को वरीयता देने वाली होती है।

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तस्वीर साभार : newsin

बनारस से दूर करधना गाँव की रहने वाली वंदना ने सामाजिक और आर्थिक संघर्ष के बीच अपनी पढ़ाई पूरी की और एक स्वयंसेवी संस्था में क्षेत्र समन्विका के पद पर कार्यरत है। वंदना अपनी लेखनी के ज़रिए गाँव में नारीवाद, जेंडर और महिला मुद्दों को उजागर करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

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