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‘सेक्स एजुकेशन की बच्चों को क्या ज़रूरत ?’

‘सेक्स एजुकेशन बच्चों को बिगाड़ देगा।‘

‘बच्चों को पढ़ाई से ज्ञान मिलना चाहिए, सेक्स एजुकेशन से वे बर्बाद होने लगेंगें।‘

‘सेक्स एजुकेशन’ से जुड़ी ऐसी बातें आपने भी कभी न कभी ज़रूर सुनी होगी। हमारे भारतीय पितृसत्तात्मक समाज में ऐसी बातें होना स्वाभाविक है, क्योंकि ‘सेक्स’ शब्द सुनते ही नज़रें झुकाना और मुँह चुराना हमारी संस्कृति का हिस्सा है। इसके बावजूद हमारी गलियों-गाँव की दीवारें सेक्स से जुड़ी समस्याओं से निजात पाने वाले प्रचारों से भरी पड़ी होती है और देश में जनसंख्या विस्फोट की समस्या तो किसी से भी छिपी नहीं है।

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वहीं दूसरी तरफ़, समाज में बढ़ते बाल अपराध और बाल यौन शोषण की घटनाएँ भी दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। पोर्नोग्राफ़ी की साइटों में चाइल्ड पोर्नोग्राफ़ी की अलग केटेगरी ख़ूब देखी जा रही है तो वहीं किशोरावस्था में यौन उत्पीड़न की घटनायें भी बढ़ रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि इन अपराधों और घटनाओं को रोका कैसे जाए? ज़ाहिर है ये सामाजिक समस्या है जो हमारी चुप्पी की संस्कृति का वीभत्स परिणाम है। ‘चुप्पी’ सुरक्षित सेक्स, सहमति, किशोरावस्था में होने वाले शारीरिक और मानसिक बदलावों की जानकारी, यौनिक अधिकार, परिवार नियोजन और यौनिकता जैसे कई बुनियादी मुद्दों पर। ऐसे में सेक्स एजुकेशन इस चुप्पी के अंधकार को दूर कर जागरूकता की रोशनी जलाता है।

भेदभाव और हिंसा की बढ़ती घटनाओं को रोकने की दिशा में सेक्स एजुकेशन सबसे सटीक माध्यम है, जो न केवल लैंगिक संवेदनशीलता व समानता को बढ़ावा देता है बल्कि स्वस्थ परिवार और स्वस्थ समाज निर्माण में भी अहम भूमिका अदा करते है। आमतौर पर हम सेक्स एजुकेशन को सिर्फ़ सेक्स यानी कि संभोग से संबंधित शिक्षा ही समझते है, जो पूरी तरह से ग़लत है। वास्तव में सेक्स एजुकेशन का ताल्लुक़ इंसान के मानसिक और शारीरिक बदलावों व प्रजनन जैसे अहम विषयों की तार्किक जानकारी से है।

और पढ़ें : पॉर्न साइट्स की मौजूदगी के बीच क्यों ज़रूरी है सहमति की समझ और सेक्स एजुकेशन की ज़रूरत

इसे एक उदाहरण से समझने की कोशिश करते है, बच्चे अक्सर अपनी माँ से सवाल करते हैं कि बच्चे कहाँ से पैदा होते है? या फिर सेनेटरी पैड के पैकेट को देखकर वे इसके बारे में जानने की कोशिश करते है। और हम बच्चों को इन दोनों सवालों का सही जवाब देने की बजाए कभी उन्हें डाँट देते है तो कभी झूठी कहानी बना देते है। लेकिन स्मार्टफ़ोन के दौर में पैदा होने वाले बच्चों को लेकर हम ये भूल जाते है कि जब हम बच्चे को कोई भी नहीं बताते, कतराते या फिर छिपाने की कोशिश करते हैं तो उसे लेकर बच्चों में जिज्ञासा बढ़ती जाती है और फिर अपनी जिज्ञासा को दूर करने के लिए अलग-अलग माध्यमों का चुनाव करते है और कई बार वे पोर्नोंग्राफ़ी तक पहुँच जाते है, जो बच्चों के मन में बेहद नकारात्मक भाव को बढ़ावा देने लगती है।

सेक्स एजुकेशन इंसान की भावनात्मक और शारीरिक ज़रूरतों, उसकी प्रकृति और व्यवहारिक पहलुओं की तार्किक शिक्षा है।

ठीक इसी तरह, आज हम धीरे-धीरे ही सही पीरियड के मुद्दे पर बात कर रहे हैं पर अभी भी किशोरावस्था में होने वाले मानसिक बदलावों के बारे में बात करना हमें नहीं सीख़ा है, जो हर बच्चे की सोच-समझ को दिशा में सबसे अहम भूमिका अदा करता है। अब अगर आप अपने बच्चे के साथ पीरियड, यौनिकता, प्रजनन स्वास्थ्य, यौनिक अधिकार, सुरक्षित सेक्स, परिवार नियोजन, भावुक रिश्तों और उनकी ज़िम्मेदारियों और सहमति जैसे मुद्दों पर बात करते है, तो ये सेक्स एजुकेशन ही हुआ।

बाल-यौन शोषण की बढ़ती घटनाओं को रोकने के लिए स्कूलों में अब गुड टच और बैड टच के बारे में बताया जा रहा है, जो सेक्स एजुकेशन का ही एक हिस्सा है। हमें समझना होगा कि सेक्स एजुकेशन का मतलब सिर्फ़ सेक्स नहीं है, बल्कि ये पीरियड,सहमति, यौनिकता, प्रजनन स्वास्थ्य, यौनिक अधिकार, सुरक्षित सेक्स, परिवार नियोजन, भावुक रिश्तों और उनकी ज़िम्मेदारियों और सहमति जैसे मुद्दों की बात है, जिसके बारे में अपने बच्चों को बताने से पहले हमें खुद भी इन पहलुओं को समझना और इन्हें अपनी जीवन-अपने परिवार में लागू करना होगा। क्योंकि स्कूल में टीचर या किताबों में चाहे कितनी भी बातें लिखा-पढ़ा दी जाएँ वास्तविकता यही है कि जब बच्चे उन बातों का प्रयोग अपने आसपास होता नहीं देखते, वे उससे ख़ुद को जोड़ नहीं पाते। सरल शब्दों में कहूँ तो सेक्स एजुकेशन इंसान की भावनात्मक और शारीरिक ज़रूरतों, उसकी प्रकृति और व्यवहारिक पहलुओं की तार्किक शिक्षा है, जो बच्चों के समक्ष उनके विकास की साफ़ तस्वीर प्रस्तुत करती है और समाज के विकास में अहम भूमिका अदा करती है। ये इंसान को संवेदनशील बनाने में मदद करता है।  

यों तो मेरी पढ़ाई हिंदी मीडियम स्कूल में हुई। वही हिंदी मीडियम जहां विज्ञान में प्रजनन स्वास्थ्य का पाठ टीचर ये बोलकर ख़ुद पढ़ने को बोलते कि ‘इसमें पढ़ाने लायक़ कुछ नहीं है।‘ वास्तव में अगर टीचर में इन पाठ ज़िम्मेदारी के साथ पढ़ाने लायक़ समझा होता तो आज हमारे बच्चे बाल यौन शोषण का सामना नहीं कर रहे होते और न ही बच्चे पैदा होने या फिर पीरियड जैसी स्वाभाविक प्रक्रियाओं को लेकर हम अपने बच्चों से मुँह चुरा होते है। इसलिए अब भी वक्त है, शर्म को छोड़कर जागरूक और शिक्षित बनिये। सेक्स एजुकेशन पर मुँह चुराने की बजाय इसके पहलुओं को समझकर उन्हें लागू करने की दिशा में आगे बढ़िए। और हां एकबात ज़रूर याद रखें, सेक्स एजुकेशन का मतलब सिर्फ़ संभोग शिक्षा नहीं है।  

और पढ़ें : एलजीबीटीक्यू+ के बारे में स्कूल के बच्चों को पढ़ाना अश्लीलता नहीं, बेहद ज़रूरी है      


  तस्वीर साभार : scroll.in

Swati lives in Varanasi and has completed her B.A. in Sociology and M.A in Mass Communication and Journalism from Banaras Hindu University. She has completed her Post-Graduate Diploma course in Human Rights from the Indian Institute of Human Rights, New Delhi. She has also written her first Hindi book named 'Control Z'. She likes reading books, writing and blogging.

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