FII is now on Telegram
4 mins read

पीरियड्स, यह शब्द सुनने में जितना आम है उतनी ही जटिल हैं इससे जुड़ी प्रचलित अवधारणाएं। मेंस्ट्रुएशन या पीरियड की बात आज भी हमारे समाज में आसानी से नहीं की जा सकती। इक्कीसवीं सदी में होने के बावजूद, आज भी भारतीय आबादी का एक बड़ा हिस्सा इस प्राकृतिक चक्र को ‘अभिशाप’, ‘अशुद्ध’ या ‘गंदा’ मानता है। इसके पीछे पीरियड से जुड़े प्राचीन मिथकों के साथ-साथ, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक कारण भी शामिल हैं।

पीरियड से जुड़ी सामाजिक रूढ़िवादी सोच को बदलने के लिए, नोबल हाइजीन की रिओ कंपनी द्वारा भारतीय टेलीविज़न पर पहली बार पैड के विज्ञापन में ‘पीरियड ब्लड’ को नीले रंग के बजाय लाल रंग में दर्शाया गया। अभिनेत्री राधिका आप्टे द्वारा किया गया यह विज्ञापन टीवी पर पहली बार फरवरी में दिखाया गया था पर संस्कारों में जकड़े विज्ञापन मानक परिषद ने इसके ख़िलाफ शिकायतों के दर्ज होने के कारण इस पर रोक लगा दी और कुछ बदलाव करने की हिदायत दी। साल 2017 में ‘ब्लड नार्मल कैंपेन’ के तहत बॉडीफॉर्म, यूनाइटेड किंगडम की, ‘पीरियड ब्लड’ को नीले के बजाए लाल रंग में दिखाने वाली पहली कंपनी थी। ‘पीरियड्स आर नार्मल, शोइंग देम शुड बी टू’ के टैगलाइन के साथ इस विज्ञापन ने दुनिया में सनसनी मचा दी थी। इस विज्ञापन के जरिए बॉडीफॉर्म ने जनता के समक्ष सही रंग दिखाकर भ्रामक विज्ञापन दिखाने की परंपरा को ख़त्म करने का प्रयास किया। उनके इस प्रभावशाली अभियान का उद्देश्य जीवन की सच्ची घटनाओं को दिखाना और पीरियड को सामान्य और सहज करना था। इन्होंने विज्ञापन में एक पुरुष को सेनेटरी नैपकिन खरीदते हुए, स्विमिंग पूल पर एक महिला को तैरते हुए और सीधे तरीके से महिलाओं के रक्तस्राव को भी दिखाया।

बॉडीफॉर्म ने इस विज्ञापन से पहले साल 2016 में ‘रेड.फिट’ नामक पुरस्कृत विज्ञापन अभियान चलाया था जिसमें महिलाओं को रक्तस्राव के दौरान बॉक्सिंग, रनिंग और बैले जैसे कामों में शामिल होते दिखाया गया था जो अपने-आप में एक मिसाल था। कंपनी ने साल 2017 में बने विज्ञापन को यूरोप, अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका में प्रसारित किया और कई कलाकारों का समर्थन प्राप्त करने में सफल रहे।

और पढ़ें : प्लास्टिक सेनेटरी पैड का खतरनाक खेल | #ThePadEffect

Become an FII Member

हालांकि इस विज्ञापन के विरुद्ध ऑस्ट्रेलिया और फ्रांस जैसे देशों में दर्शकों ने नाराज़गी जताई लेकिन बॉडीफॉर्म ने इस विज्ञापन के ज़रिए क्रांतिकारी बदलाव लाए और स्त्री स्वास्थ्य-रक्षा कंपनियों में सबसे लोकप्रिय और मुनाफे वाली कंपनी बन गई। साल 2019 में, इस विज्ञापन को लेकर ऑस्ट्रेलिया के विज्ञापन मानक परिषद के पास 600 से अधिक शिकायतें दर्ज हुई, जो किसी भी विज्ञापन के लिए आयी शिकायतों की सबसे अधिक संख्या थी। लेकिन उन्होंने न केवल शिकायतों को खारिज कर दिया बल्कि विज्ञापन के माध्यम से दिए गए संदेश की प्रशंसा की। लगभग छह साल पहले ऑलवेज नामक कंपनी ने मैक्सी पैड पर लाल बूंद के साथ विज्ञापन दिखाकर पीरियड से जुड़े झिझक और असहजता को मिटाने की कोशिश की थी। पीरियड की समस्याओं की मूल तक पहुँचने की मुहिम करता पी सेफ की रहो सेफ कंपनी, भारत में पुरुषों को पीरियड के बातचीत में शामिल करने वाला पहला ब्रांड है। साल 2020 में प्रदर्शित इस विज्ञापन का उद्देश्य पुरुषों को उनके जीवन में महिलाओं के लिए पैड खरीदने के लिए प्रोत्साहित करना और उन्हें यह याद दिलाना था कि पीरियड एक प्राकृतिक प्रक्रिया है।

पीरियड को सहजता से स्वीकारने के बजाए, विज्ञापनों में, ये महिलाएं पैड की आड़ में छिपती नजर आती हैं।

अमरीकी कंपनी कोरा ने साल 2018 में अपने पैड के विज्ञापनों में लाल तरल पदार्थ का उपयोग करना शुरू कर दिया था। इन विज्ञापनों को अत्यधिक सजीवता के रूप में चिह्नित किया गया और फेसबुक और इंस्टाग्राम से हटा दिया गया था। कोरा ने विज्ञापन मानक परिषद और विभिन्न कंपनियों से बात की और जल्द ही ये दोबारा दिखाए गए। वहीं कोटेक्स के यू पैड के विज्ञापन में भी रक्तस्राव को प्राकृतिक रंग में दिखाया गया। साल 2017 में, पीरियड सब्सक्रिप्शन सर्विस पिंक पार्सल ने ट्रांस मॉडल केनी जोन्स को अपने जागरूकता अभियान में शामिल किया था।

और पढ़ें : ‘पीरियड का खून नहीं समाज की सोच गंदी है|’ – एक वैज्ञानिक विश्लेषण

सदियों से बहुराष्ट्रीय कंपनियां लाल रंग के जगह नीला दिखाकर भ्रामक विज्ञापन प्रस्तुत करते आए हैं। लोकलाज और पितृसत्तात्मक आवरण पहने महिलाओं को केवल एक पैड के इस्तेमाल करने से स्वावलंबी और आत्मविश्वासी दिखाने की परंपरा न सिर्फ हानिकारक है बल्कि असल समस्या को नजरअंदाज़ करना भी है। पीरियड को सहजता से स्वीकारने के बजाए, विज्ञापनों में, ये महिलाएं पैड की आड़ में छिपती नजर आती हैं। ‘पीरियड- एन्ड ऑफ़ सेंटेंस’ जैसी फिल्में और इन कंपनियों के विज्ञापन आने वाली पीढ़ियों के लिए उम्मीद की किरण है। लेकिन गुजरात के भुज की लड़कियों पर प्रधानाध्यापक द्वारा उनके पीरियड की जांच करने के लिए अधोवस्त्र उतारने का दबाव समाज में व्याप्त फूहड़ता और रूढ़िवादी सोच को उजागर करती है। इस प्राकृतिक प्रक्रिया की समस्याओं को रोजमर्रा की चर्चाओं में शामिल नहीं की जाती। न ही इसमें समाज के हर लिंग और सम्प्रदाय को शामिल किया जाता है। जहां मातृत्व को गौरवान्वित किया जाता है, वहीं पीरियड की चर्चा वर्जित है। सैनिटरी उत्पादों की उच्च कीमतें, व्यक्तिगत पसंद, सांस्कृतिक और सामाजिक कट्टरता, नजदीकी दुकानों में उत्पादों की उपलब्धता और आर्थिक हालात अस्वच्छ और असुरक्षित उपायों को चुनने पर मजबूर करती हैं। अक्सर इस मुद्दे पर चुप्पी का सामान्यीकरण किया जाता है और पुरुष भी इस बारे में बात करने से परहेज करते हैं। महिलाओं का इन विषयों पर आवाज़ उठाने की भी निंदा की जाती है।

गौरतलब हो कि विश्वस्तर पर, मानक परिषदों ने अब तक केवल दो देशों को विज्ञापन में पीरियड ब्लड को लाल रंग में दिखाने की अनुमति दी है। साथ ही ऐसे अभियान और विज्ञापन साधारण जनता के पहुंच से परे है। आगे बढ़ने की होड़ में अकसर कंपनियां या तो ऐसे प्रचार बंद कर देती हैं या विज्ञापन को बदलकर प्रस्तुत करती हैं। नोबल हाइजीन के रिओ को भी विज्ञापन में दिखाए गए रक्त के रंग को हल्का करने के लिए कहा गया। साथ ही पैड पर गिरती हुई रक्त के बूंद वाली दृश्य को चौंकाने वाली बताई गयी। इसलिए रिओ ने विज्ञापन को मोनोक्रोम फ़िल्टर में प्रस्तुत करने का निर्णय लिया है। समय है कि हम इन अभियानों, विज्ञापनों या इनसे जुड़े लोगों को अश्लीलता से न जोड़ें। संस्कारों के तर्ज पर स्वाभाविकता को न गवाएं। जरूरी है कि हम लाल को लाल ही रहने दे और दकियानूसी सोच को बदलने में अपनी भूमिका निभाए।

और पढ़ें : भारतीय पितृसत्तात्मक व्यवस्था में महिला की माहवारी| नारीवादी चश्मा


तस्वीर साभार : Mashable

Support us

Leave a Reply