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सेक्स यानि की यौन संबंध को हमारे पितृसत्तात्मक समाज में हमेशा व्यक्ति के चरित्र और आचरण से जोड़कर देखा जाता है जबकि सेक्स पूरी तरह एक व्यक्ति का निजी मामला है। इस रूढ़िवादी सोच के कारण ही हमारे समाज में सेक्स से जुड़े कई मिथ्य प्रचलित हैं। ऐसे ही कुछ मिथ्यों को आज हम अपने इस लेख में दूर कर रहे हैं।

मिथ्य : सहमति लेना केवल एकबार ज़रूरी होता है।

तथ्य : यौन गतिविधियों के लिए बस एकबार सहमति लेना हर बार के लिए मान्य नहीं होता। जब-जब आप ऐसी गतिविधियों में हिस्सा लेते हैं तब-तब आपके लिए सहमति लेना ज़रूरी है। आप और आपका साथी अपनी सहमति वापस लेने के लिए हमेशा स्वतंत्र हैं।

मिथ्य : हमें सेक्स एजुकेशन की कोई ज़रूरत नहीं है।

तथ्य : भारत में अप्रत्याशित गर्भधारण और एचआईवी/एड्स संक्रमण बहुत बड़ी समस्याएं हैं। बलात्कार और यौन शोषण भी रोज़ की बात है। ऐसे में हमारी युवा पीढ़ी को ‘व्यापक यौनिकता प्रशिक्षण’ (सीएसई) की ज़रूरत है ताकि वे सहमति और शारीरिक सीमाओं के बारे में जान सकें, और अपने शरीर और स्वास्थ्य का ध्यान रख सकें।

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मिथ्य : शारीरिक रूप से विकलांग लोगों में यौन इच्छा नहीं होती।

तथ्य : विकलांगता से यौनिकता खत्म नहीं हो जाती। विकलांग व्यक्तियों की भी इच्छाएं होती हैं और सही पार्टनर के साथ वे यौन संबंध भी बना सकते हैं। यह बात सही है कि उन्हें अक्सर पार्टनर ढूंढने और अपनी इच्छाएं व्यक्त करने में  समस्याएं होती हैं क्योंकि समाज मानने को तैयार नहीं है कि उनकी भी यौनिक जरूरतें होती हैं।

 

मिथ्य : पीरियड्स के दौरान सेक्स करने से इंसान प्रेगनेंट नहीं होता।

तथ्य: प्रेगनेंसी किसी भी वक़्त हो सकती है अगर गर्भनिरोधक का इस्तेमाल न किया जा रहा हो। वीर्य शरीर के अंदर पांच दिनों तक रहता है तो ऐसा भी हो सकता है कि पीरियड्स के बाद ही प्रेगनेंसी हो गई हो। प्रेगनेंसी को रोकने के लिए कॉन्डम, गर्भनिरोधक गोलियों आदि का प्रयोग करना ज़रूरी है।

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मिथ्य : गर्भनिरोधक का इस्तेमाल केवल ‘चरित्रहीन’ लोग ही करते हैं।

तथ्य : गर्भनिरोधक को अनैतिक हमारे समाज में मौजूद सामाजिक और सांस्कृतिक रूढ़ियों की वजह से माना जाता है। गर्भनिरोधक न सिर्फ अनचाहा गर्भ रोकने में कारगर होते हैं बल्कि यौन रोगों से भी हमारा बचाव करते हैं। साथ ही ये हमारे यौन और प्रजनन स्वास्थ्य के लिए भी आवश्यक हैं।

मिथ्य : सेक्स एजुकेशन एक बेकार विषय है और यह बच्चों को सेक्स करने के लिए प्रोत्साहित करता है।

तथ्य : कई स्टडीज़ यह बताती हैं कि सेक्स एजुकेशन प्रोग्राम बच्चों और युवाओं को गर्भनिरोध के बारे में जागरूक करता है और उन्हें सेक्सुअल एक्टिविटीज़ के प्रति अधिक ज़िम्मेदार बनाता है। सेक्स एजुकेशन न सिर्फ सेक्स के शारीरिक संदर्भ से जुड़ा होता है बल्कि यह जेंडर, प्यूबर्टी, शारीरिक बदलाव, सहमति, यौन हिंसा के प्रति भी जागरूक करता है।

मिथ्य : सेक्स एजुकेशन का मतलब सिर्फ़ संभोग शिक्षा है।

तथ्य : आमतौर पर हम सेक्स एजुकेशन को सिर्फ़ सेक्स यानी कि संभोग से संबंधित शिक्षा ही समझते हैं, जो पूरी तरह से ग़लत है। वास्तव में सेक्स एजुकेशन का ताल्लुक़ इंसान के मानसिक और शारीरिक बदलावों व प्रजनन जैसे अहम विषयों की तार्किक जानकारी से है। लैंगिक भेदभाव और हिंसा की बढ़ती घटनाओं को रोकने की दिशा में सेक्स एजुकेशन सबसे सटीक माध्यम है।

मिथ्य : शादी से पहले सेक्स करना पाप है, ऐसा करने वाले चरित्रहीन होते हैं।

तथ्य : सेक्स करना किसी भी व्यक्ति का एक निजी फैसला है, चाहे वह शादी के बाद हो या पहले। इसका पाप-पुण्य या चरित्र से कोई लेना-देना नहीं है। भारतीय पितृसत्तात्मक समाज में शादी से पहले शारीरिक संबंध बनाना टैबू माना जाता है। इसे उस व्यक्ति के चरित्र से जोड़कर देखा जाता है, जो कि गलत है। सेक्स शारीरिक ज़रूरतों को पूरा करने का एक ज़रिया है और पूरी तरह एक निज़ी फैसला है।

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