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“कहां जा रही हो, कितनी देर में आओगी, किसके साथ जा रही हो, टाइम से आ जाना, रात में बाहर नहीं जाना, पापा से पूछ के जाओ, ये कैसे कपड़े पहने हैं, लड़की हो कम बोला करो!” ऐसी ही न जाने कितनी बातें कही जाती हैं एक लड़की को, उसकी आज़ादी पर सर्विलांस लगाने के लिए। हमारा समाज दोहरे मानकों पर आधारित है, जहां कही गयी बातों और करनी में बहुत फर्क है। लड़कियां अपने जीवन में कितना भी पढ़-लिख जाएं और कितनी ही सफल क्यों ना हो जाएं लेकिन समाज में और अपने ही परिवार में कमतर दर्जे की स्थिति में रहती हैं। ज्यादातर घरों में लड़कों को ‘राजा बेटा’ माना जाता है क्योंकि वह उनके कुल का रखवाला होता है और मां-बाप के स्वर्ग पहुंचने का एकमात्र रास्ता होता है। जबकि बेटी इसके विपरीत परायी होती है क्योंकि वह तो शादी के बाद दूसरे घर चली जाती है।

घर-परिवार और समाज की इस तरह की मानसिकता के बाद सरकार भी कुछ ऐसे ही उदाहरण महिलाओं के सामने पेश करने जा रही हैं जिससे उनकी निजी ज़िन्दगी में खलल पैदा होगी। अभी तक मात्र घरवाले, मोहल्ले वाले, समाज के ठेकेदार नज़रें तरेरे बैठे रहते थे लड़कियों के ऊपर। इसकी बाकी बची कसर उत्तर प्रदेश पुलिस कर देगी। बीती 20 जनवरी को लखनऊ विश्वविद्याल में हुए एक वर्कशॉप ‘आशीष, अभय, अभ्युदय’ के दौरान लखनऊ पुलिस कमिश्नर डीके ठाकुर ने बताया कि लखनऊ पुलिस ने यह फैसला किया है कि शहर के कुछ हॉट-स्पॉट जगहों पर ऐसे कैमरे लगाए जायेंगे जो आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस से लैस होंगे। यह कैमरे स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत लगाए जाएंगे जिसका नेतृत्व खुद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ करेंगे।

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लड़कियों, महिलाओं पर सर्विलांस रखने की अब बची-खुची कसर हमारी यूपी पुलिस के आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस कैमरे पूरी कर देंगे। ये कैमरे लड़कियों/महिलाओं के चेहरे के हाव-भाव देखकर यह ट्रैक करेंगे यह पता लगाने के लिए कि कहीं उनके साथ कुछ गलत तो नहीं हो रहा। सुनने में बड़ा अच्छा और यूनिक आईडिया लग रहा होगा पर इसके पीछे बहुत सारी चीज़े हैं जिन्हें हमे नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। मान लीजिए कि अगर एक लड़की पीरियड के दर्द के कारण अचानक रोने लगे तो ये कैमरे उसके चेहरे को ज़ूम करके उसकी सूचना पिंक बूथ और 112 पर भेज देंगे और उसके बाद पुलिस वहां आकर अपनी कार्यवाही करेगी| पीरियड के दर्द की नहीं बल्कि उसके साथ हुए अपराध की क्योंकि कैमरे ने ये तो बताया ही नहीं था न कि वह लड़की आखिर परेशान क्यों थी, तकलीफ में क्यों थी। यानी कुल मिलाकर महिलाओं को अपनी मर्ज़ी से अपनी भावनाएं व्यक्त करने का हक भी सरकार छीन लेगी।

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क्या उन कैमरों से हमारी निजता पर कोई असर नहीं पड़ेगा? यह कोई कोरोना का वायरस तो है नहीं जो स्थान विशेष पर फैला हो जिससे हॉटस्पॉट बनाया जाए। यह तो मानसिक सोच का वायरस है जो हर जगह फैला है।

इस योजना के तहत शहर की 200 जगहें हॉटस्पॉट बनाई गई हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक इन 200 जगहों को इस आधार पर चिन्हित किया गया है जहां महिलाओं का आना-जाना अधिक है और जहां महिलाओं के ख़िलाफ़ यौन उत्पीड़न की घटनाओं की शिकायतें सबसे अधिक आती हैं। अब इतन चिन्हित जगहों पर लड़कियां और महिलाएं अपनी निजी भावनाओं को व्यक्त भी नहीं कर पाएंग क्योंकि वह कैमरों की नज़र में होंगी। अब सवाल यह है कि जो 200 जगहें चिन्हित की गई हैं कैमरे लगाने के लिए क्या उन जगहों को छोड़कर किसी अन्य जगह पर महिलाओं के ख़िलाफ हिंसा नहीं हो सकती? क्या उन कैमरों से हमारी निजता पर कोई असर नहीं पड़ेगा? यह कोई कोरोना का वायरस तो है नहीं जो स्थान विशेष पर फैला हो जिससे हॉटस्पॉट बनाया जाए। यह तो मानसिक सोच का वायरस है जो हर जगह फैला है। ऐसे हमें हम किन-किन क्षेत्रों को महिला हिंसा होने वाले क्षेत्र के रूप में चिन्हित करेंगे।

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21वीं सदी होने के बावजूद भारत को पुरुष प्रधान देश कहना कुछ गलत नहीं होगा। जिस तरह से पुरुष खुद को औरत का मालिक समझता है, वह मां, पत्नी, बेटी, बहन किसी न किसी रूप में गुलाम की खोज करता है। वह औरत को तथाकथित आर्थिक सुरक्षा देकर बदले में सिर्फ उसकी आज़ादी ही नहीं छीन लेना चाहता है बल्कि उसे एक वस्तु की तरह इस्तेमाल करने का हक भी हासिल कर लेना चाहता है। गौरतलब है कि पितृसत्तात्मक समाज में एक महिला की पूरी ज़िन्दगी पुरुष के आधिपत्य में ही गुज़रती है। अगर देखा जाए तो बचपन और किशोरावस्था में वह अपने पिता के सानिध्य में रहती है। युवा अवस्था में वह अपने पति या भाई के सानिध्य में रहती है और वृद्धावस्था में अपने बेटों पर निर्भर रहती है। अभी भी एक बड़े वर्ग की सच्चाई यही है। लड़कियों को घर-घर खेलना, रसोई से संबंधित खिलौने देना, मां के साथ रसोई के काम, भाई से डरना, ऊंची आवाज़ में बात ना करना आदि सिखाने पर बल दिया जाता है। उसका शर्मीला, विनम्र, संवेदनशील, कम बोलना ये अच्छे गुण माने जाते हैं। यही सब परिवार में समाजीकरण के माध्यम से सिखाया जाता है, जिसका प्रभाव इनके व्यक्तित्व निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

इस तरह के दोहरे आयामों पर चलने वाले समाज में सरकार का इस तरह की नीतियों बनाना महिलाओं की आज़ादी पूरी तरह छीन लेना है और उनकी निजता को भंग करना भी है। जहां सरकार ‘बेटी पढ़ाओ-बेटी बचाओ’ जैसे कार्यक्रम चला रही है उसी जगह पर इस तरह से लड़कियों और महिलाओं की निजता को भंग करना कितना सही रहेगा? जहां सरकार महिला सशक्तिकरण पर लंबे-चौड़े भाषण देती है, वहां खुद ही उनकी निजता भंग करना कहां तक ठीक होगा? ज़रूरत है महिलाओं पर सर्विलांस लगाने की जगह सरकार सेक्स एजुकेशन, लैंगिक संवेदनशीलता जैसे मुद्दों पर जगह-जगह जागरूकता कार्यक्रम चलाए, इन सब मुद्दों से जुड़े अभियान चलाए जाएं। हमें ज़रूरत है तो समर्थन की, बराबरी के हक की, अपनी आवाज़ उठाने की, स्वतंत्रता की, अपनी इच्छा से जीने देने की स्वतंत्रता की, ये आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लैस कैमरे हमारी आज़ादी छीनने का एक और प्रयोग मात्र है।

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तस्वीर साभार : ifex

Shikha Singh is a social activist and feminist who is associated with the NGO 'Nayi Subah' that works for the welfare of Women and Children. She is also associated with Narmada Bachao Andolan . A computer engineer by profession, she devotes equal time to reading and writing blogs. She has post-graduate in Cyber Law, MCA, MSW and aims to complete her PhD in Social Work. She is an optimistic personality who constantly takes jibe on socio-political conditions of society. A writer by passion, Shikha Singh dreams of combining all her writings into a book one day.

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