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‘संगठन’ किसी भी सामाजिक बदलाव के लिए अहम भूमिका निभाता है। जब किसी एक उद्देश्य के साथ कई लोग एक विचाधारा के साथ किसी सामाजिक बदलाव के लिए प्रयास करते हैं तो इससे बदलाव में ठहराव आता है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी जब हम महिलाओं और किशोरियों के संदर्भ में रोज़गार, शिक्षा, जागरूकता, स्वावलंबन और हिंसा जैसे मुद्दे पर काम करते हैं तो उस काम को स्थायित्व देने में संगठन अहम भूमिका अदा करते हैं। ये संगठन ही हैं जो आपस के भेदभाव और द्वेष को मिटाकर लोगों को एक मंच में लाने का काम करते हैं। उनके बीच एक समझ को विकसित करने और एकसाथ आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। लेकिन मौजूदा समय में बाज़ारवाद हर जगह हावी है इसलिए इस दौर में ग्रामीण क्षेत्रों में महिला संगठन का निर्माण भी एक बड़ी चुनौती है। पितृसत्ता ने अपने स्वरूप में बाज़ार का रंग चढ़ाया है कि इसका सीधा प्रभाव हम लोग आए दिन गांव में महिला और किशोरी संगठन के निर्माण में देखते हैं। जब महिलाएँ किसी संगठन से जुड़ने की पहली शर्त ही लाभ रखती हैं। चूंकि बाज़ार से ग्रामीण महिला संगठन अछूते नहीं हैं, जिसके चलते महिलाओं में संगठन को लेकर मौजूद समझ सिर्फ़ और सिर्फ़ लाभ पर केंद्रित कर दी गई है।

संगठन के प्रति ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं और किशोरियों की उदासीनता को जब हम समझने की कोशिश करते हैं तो हम अक्सर ये पाते हैं कि उनके घर में उनपर लागू पाबंदियां अक्सर उनके बढ़ते कदमों को प्रभावित करती हैं। गांव में जब भी कोई महिला या किशोरी अपने घर के बाहर काम से जाती है तो घर वाले हमेशा उनसे लाभ का सवाल करते हैं। वे सवाल करते हैं कि किसी संगठन या बैठक में जाने से उन्हें क्या लाभ मिलेगा? वास्तव में ये लाभ का सवाल महिलाओं की गतिशीलता, उनके आने-जाने के अधिकार, लोगों से मिलने और ख़ुद के अस्तित्व को ज़िंदा रखने के लिए रास्तों को बंद करता है। स्वाभाविक है जब महिला कहीं बाहर ख़ुद अपनी मर्ज़ी से नहीं जाती और उसका घर से निकलना उसके परिवार के काम से होता है तो उसकी पहचान भी बहु, बेटी, पत्नी जैसे रिश्तों मात्र में सिमटकर रह जाती है।

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गांव में अक्सर अधेड़ महिलाएं कहती हैं कि महिला बैठकों में आने के बाद से उनके गांव की औरतें उन्हें उनके नाम से जानने लगी, वरना उससे पहले उनकी पहचान सिर्फ़ और सिर्फ़ उनके घर के पुरुषों से थी। समय के साथ बदले पितृसत्ता के रूप ने अपने लाभ के सवाल का बोझ महिलाओं के सिर ऐसे डाला है कि कई बार उन्हें इसका ज़वाब देना और कहीं आने-जाने के लाभ को उन्हें समझा पाना बड़ी चुनौती मालूम होता है, जिससे महिलाओं और किशोरियों की उदासीनता बढ़ने लगती है। महिलाएं जब संगठन बनाकर विचार करती हैं, दुनिया-समाज को देखने-समझने की कोशिश करती हैं तो वे अपनी भविष्य को सामूहिक रूप से सही और सशक्त दिशा दे पाती है। आमतौर पर देखा जाता है कि जिस भी गांव में महिलाओं और किशोरियों का मज़बूत संगठन होता है, जो आर्थिक बचत के साथ-साथ सामाजिक मुद्दों पर भी अपनी सक्रियता रखता है, उन गांवों में महिला-हिंसा का स्तर अन्य जगहों के कम होता है।

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महिलाएं जब संगठन बनाकर विचार करती हैं, दुनिया-समाज को देखने-समझने की कोशिश करती हैं तो वे अपनी भविष्य को सामूहिक रूप से सही और सशक्त दिशा दे पाती है।

इतना ही नहीं, महिला संगठन के अभाव के कारण ही महिला नेतृत्व को समाज में प्रभावी स्थान नहीं मिल पाता है। आजकल उत्तर प्रदेश के कई ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायत चुनाव होने वाले हैं, इन चुनावों में कई जगहों पर महिला आरक्षित सीट भी आती है, जिसपर महिला प्रत्याशी चुनाव भी जीतती है। लेकिन काम, अधिकार और नाम हर जगह प्रधान पति के खाते में होता है। महिला प्रधान का यह स्वरूप भी मज़बूत महिला संगठन के अभाव की वजह से है, क्योंकि अगर गांव में महिला संगठन सक्रिय तरीक़े से काम करता है तो इसमें महिलाओं की नेतृत्व क्षमता का विकास होता है और नेतृत्व के अवसर पर अपनी सक्रिय दावेदारी कर पाती है। साथ ही, वे प्रधान पति जैसे चलन के ख़िलाफ़ भी एकजुट होकर आवाज़ उठाती हैं।  

महिला संगठन किसी भी महिला आंदोलन का आधार भी होता है और जब तक छोटे स्तर पर महिला संगठन का निर्माण नहीं होगा हम किसी भी तरह के महिला आंदोलन की कल्पना नहीं कर सकते हैं। कहते हैं भारत गांव में बसता है, ऐसे में जब तक महिला संगठन का विकास ग्रामीण स्तर पर नहीं किया जाएगा तब तक महिला नेतृत्व और सशक्तिकरण की कल्पना कोरी है। ध्यान रखने वाली बात ये भी है कि संगठन सिर्फ़ पैसों के बचत के संदर्भ में नहीं बल्कि महिलाओं को जागरूक और सामाजिक बदलाव के लिए एकजुट करने वाले हो।  

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तस्वीर साभार : Women on Wings

बनारस से दूर करधना गाँव की रहने वाली वंदना ने सामाजिक और आर्थिक संघर्ष के बीच अपनी पढ़ाई पूरी की और एक स्वयंसेवी संस्था में क्षेत्र समन्विका के पद पर कार्यरत है। वंदना अपनी लेखनी के ज़रिए गाँव में नारीवाद, जेंडर और महिला मुद्दों को उजागर करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

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