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कोविड -19 महामारी ने न सिर्फ हमारी सामाजिक गतिविधियों और अर्थव्यवस्था पर आघात किया बल्कि सदियों से चली आ रही लैंगिक विषमताओं को अधिक प्रत्यक्ष कर दिया है। इस महामारी के दौरान संसाधनों की कमी के बीच, महिलाओं पर घर और बाहर की दोहरी जिम्मेदारी और तालमेल बैठाने की जद्दोजहद ने उनके मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर किया है। इस महामारी ने हर तरह से महिलाओं और लड़कियों को प्रभावित किया है। कोरोना के कारण महिलाओं के अधिकारों के लिए कठिन परिश्रम और सालों की लड़ाई से तय किए हुए रास्तों पर हम दोबारा पीछे जा चुके हैं। इस महामारी ने न केवल महिलाओं के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा दिया बल्कि उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य, साथ ही आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता पर पंजा कसा है।

कोविड-19 महामारी के दौरान यूनाइटेड नेशंस वीमेन सहित कई गैर सरकारी संस्थानों ने अलग-अलग सर्वेक्षण किए। इन सर्वेक्षणों में पाया गया कि कोरोना के दौरान पुरुषों के मुकाबले महिलाओं को कहीं अधिक नौकरी से हटाया गया, उनकी स्वच्छता उत्पादों या यौन स्वास्थ्य संबंधी प्रक्रियाओं या प्रणालियों की पहुंच में कमी और बाल विवाह में बढ़ोतरी हुई, बच्चियों की पढ़ाई पर रोक लगी और स्कूल ड्रॉपआउट संख्या बढ़ी। बच्चियों की तस्करी और महिलाओं के खिलाफ हिंसा की घटनाओं में भी वृद्धि हुई। 24 मार्च 2020 को देश व्यापी लॉकडाउन घोषित होने के बाद जहां घरेलू हिंसा की वारदातों में वृद्धि चिंता का विषय रही। वहीं स्वास्थ्य व्यवस्था के बंद होने से आवश्यक चिकित्सा की जरूरतों की पूर्ति में कमी हुई। आंकड़ों की बात करें तो, राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) को लॉकडाउन के दौरान 23 मार्च से 16 अप्रैल तक मिली 587 शिकायतों में 239 घरेलू हिंसा से संबंधित मामले मिले। एनसीडब्ल्यू द्वारा साझा किए गए तथ्यों के अनुसार, 27 फरवरी से 22 मार्च के बीच 123 घरेलू हिंसा के मामले सामने आए थे और 27 फरवरी से 22 मार्च तक महिलाओं से संबंधित कुल 396 अपराध के मामले सूचित किए गए थे। सैकड़ों महिलाएं लॉकडाउन में अपने अब्यूज़र के साथ घर में फंसी थीं। इस दौरान न्याय सेवाओं का बंद होना, शिकायत दर्ज करने के संस्थानों की पहुँच पर रोक लगना या करवाई में देरी जैसे कारणों ने हिंसा के अन्य रूपों के खतरे को भी बढ़ावा दिया है। हाल ही में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने सदन में यह जानकारी भी दी कि लॉकडाउन के दौरान अप्रैल से जून के महीने में महिला हेल्पलाइन नंबर 181 पर मदद के लिए 2.47 लाख कॉल्स आई।

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गर्भसमापन सेवाएं हुईं प्रभावित

लॉकडाउन के प्रमुख परिणामों में से एक गर्भसमापन और गर्भ निरोधक तक सीमित पहुंच भी थी, जिसने अनचाहे गर्भधारण के मामले बढ़े। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष का अनुमान है कि लॉकडाउन के कारण अनपेक्षित गर्भधारण की संख्या में 7 मिलियन तक की वृद्धि हो सकती है। यह अनुमान लगाया जा रहा है कि भारत में, लॉकडाउन के कारण यह वृद्धि 7 फीसद यानी 2 मिलियन तक बढ़ सकती है। गैर सरकारी संस्था, फाउंडेशन फॉर रिप्रोडक्टिव हेल्थ सर्विसेज इंडिया (एफ़आरएचईएस) के सीईओ चंद्रशेखर वी.एस. के अनुसार, लॉकडाउन के कारण पैदा हुई सबसे बड़ी चुनौती महिलाओं का गर्भसमापन सेवाओं से संपर्क टूटना था। चंद्रशेखर कहते हैं कि आपातकालीन सेवाएं जारी थी, लेकिन अस्पतालों में अनेक सेवाएं या तो बंद थी या पहुंच से बाहर। गर्भसमापन से संबंधित दवाइयों पर भी प्रतिबंध थे, जो गर्भसमापन के बाद देखभाल के लिए महत्वपूर्ण है। वह कहते हैं कि गर्भसमापन बहुत समय संवेदनशील होता है। 2020 के शुरुआती दौर में एफ़आरएचईएस के एक अध्ययन ने सुझाया था कि सितंबर तक 2.56 करोड़ भारतीय जोड़े गर्भनिरोधक का उपयोग नहीं कर पाएंगे। कई सर्वेक्षणों में यह भी पाया गया कि गर्भवती महिलाएं लॉकडाउन के समय मानसिक रूप से डिप्रेशन, तनाव और चिंता से अधिक ग्रसित हुई। स्वास्थ्य सेवाओं का बंद होना, परिवार के सदस्यों से दूरी, घर से बाहर जाने पर रोक, महामारी के वजह से आर्थिक तंगी या अनिश्चितता ने गर्भवती महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर असर किया। 

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कोरोना महामारी ने न केवल महिलाओं के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा दिया बल्कि उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य, साथ ही आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता पर शिकंजा कसा है।

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अनपेड केयर वर्क और मानसिक स्वास्थ्य

हमारी सुधरती अर्थव्यवस्था और सुचारु रूप से चलती दिनचर्या में महिलाओं और लड़कियों के अवैतनिक श्रम का बहुत बड़ा योगदान रहा है। कोरोना का संकट शुरू होने से पहले, युएन वीमेन के अनुसार पूरी दुनिया में हर दिन महिलाएं पुरुषों की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक अवैतनिक काम करती आई हैं। दूसरे शब्दों में, कोरोना वायरस से पहले एक घंटे का अवैतनिक काम पुरुष और तीन घंटे का महिलाएं कर रही थी। अब ये आंकड़े और बढ़ गए हैं। लॉकडाउन के बाद सामाजिक दूरी से होने वाले भावनात्मक अभाव, बंद स्कूल और अत्यधिक घरेलू काम को महिलाओं और लड़कियों ने पूरा किया है ताकि परिवार और बीमार या बुजुर्गों की बुनियादी ज़रूरतों को पूरा किया जा सके। महामारी के कारण मार्च 2020 से दुनिया भर के लगभग 1.5 बिलियन से भी अधिक छात्र घर पर हैं जिसके कारण घरेलू कामों में अस्वाभाविक बढ़ोतरी हुई। मौजूदा लैंगिक मानदंडों के कारण महिलाओं पर अवैतनिक श्रम जैसे बच्चों का देखभाल और घर के कामों का बोझ बढ़ा है। इससे उनके मानसिक स्वास्थ्य पर असर तो हुआ ही है साथ ही साथ कार्यस्थल पर पूरी निष्ठा से काम करने की उनकी क्षमता बाधित हुई है, खासकर उन नौकरियों में जिसे घर पर रह कर करना संभव नहीं था।

वीमेन इन टेक्नोलॉजी (डब्ल्यूआईटी) के 21 से 35 साल की भारतीय महिलाओं पर किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार 65% कामकाजी महिलाएं मानती है कि कोरोना वायरस ने उनके करियर को नकारात्मक रूप से प्रभावित किया है। सर्वेक्षण में पाया गया कि हर 10 में से 4 महिलाओं ने 2020 में अपनी नौकरी खोई। अप्रैल और मई में लगभग 17 मिलियन महिलाओं ने नौकरी जाने की सूचना दी। यूएन वुमन का मानना है कि लैंगिक समानता में हुई बढ़ोतरी के मामले में कोरोना से कारण हम 25 साल पुराने स्तर तक पिछड़ सकते हैं।

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लॉकडाउन में स्कूलों का बंद होना भी बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित किया है। ऑनलाइन शिक्षा की बढ़ती मांग ने जहां आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को पीछे छोड़ दिया वहीं लड़कियों पर इसका प्रभाव सबसे अधिक रहा। आर्थिक तंगी के कारण स्वच्छता उत्पादों के लिए स्कूल पर निर्भर लड़कियों को जहां पीरियड पावर्टी का सामना करना पड़ा। वहीं ऑनलाइन शिक्षा में भी वे पीछे छूट गई। यूनिसेफ के आंकड़ों के अनुसार विश्व स्तर पर महिलाओं की तुलना में 12 फीसद पुरुष अधिक ऑनलाइन हैं। भारत की बात करें तो सभी इंटरनेट उपयोगकर्ताओं में से केवल 29 प्रतिशत महिलाएं हैं। महामारी से पहले ही ऐसे युवाओं की संख्या में बढ़ोतरी हो रही थी जो रोजगार, शिक्षा या किसी भी प्रकार के प्रशिक्षण (NEET) में नामांकित नहीं है। विश्व स्तर पर NEET के रूप में वर्गीकृत लगभग 267 मिलियन युवाओं में से दो-तिहाई, यानी 181 मिलियन युवा महिलाएं हैं। इन असमानताओं ने न सिर्फ बच्चियों के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव डाला बल्कि आत्महत्या के मामले भी सामने आए।

मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 यह आश्वासन देता है कि मानसिक बीमारी वाले व्यक्तियों को किसी भी आम शारीरिक बीमारियों के समान माना जाना चाहिए, लेकिन सामाजिक रूढ़िवाद हमें इसे खुले आम कहने और चिकित्सा करने से दूर करता है। साथ ही ओपीडी सेवाओं की अनुपलब्धता लोगों को महंगे निजी अस्पतालों में जाने के लिए प्रेरित करती है जो आर्थिक बोझ है। आयुष्मान भारत जैसी योजनाएं मानसिक स्वास्थ्य पर बीमा तो देती हैं लेकिन निजी अस्पतालों में बीमा कवर की कमी और बीमा योजनाओं का मानसिक स्वास्थ्य को अनदेखा करना स्थिति को और गंभीर बनाती है। इसके अलावा, स्वास्थ्य सेवाओं में राष्ट्रव्यापी भिन्नता और अलग-अलग रूपरेखा, विभिन्न सामाजिक परिवेश, आर्थिक स्थिति, लोगों की मानसिकता जैसे कारण इसे और जटिल बनाती है। मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे को एक व्यापक सार्वजनिक समस्या के रूप में देखने की आवश्यकता है ताकि इसे किसी अन्य स्वास्थ्य मुद्दे की तरह माना जा सके। सामूहिक तौर पर लोगों का इस विषय से जुड़ाव भी बुनियादी बदलाव ला सकते हैं।

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तस्वीर साभार : Medicine at Michigan

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