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किसी भी अख़बार को खोलते हुए पहला पन्ना पाठक की नज़र में आता है और उसपर यह जिम्मेदारी होती है कि वह पाठकों का ध्यान अखबार की ओर आकर्षित करे और ज़रूरी खबरों से उसे अवगत कराए। इस प्रकार अखबार की सम्पूर्ण संचरना में पहला पृष्ठ महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। कोई भी पाठक पहले पन्ने पर दी गयी जानकारी पर अधिक ध्यान देते हुए उसे गहनता से निहारता है और प्रभावित होता है, यही कारण है कि पहले पृष्ठ पर प्रकाशित होने वाले विज्ञापनों की दर बाद के पृष्ठों में प्रकाशित होने वाले विज्ञापनों से अधिक होती है। कई बार तो शुरुआत के दो-तीन पन्ने विज्ञापनों से ही भरे होते हैं और चौथे या पांचवे पन्ने से असली खबरें शुरू होती हैं। आमतौर पर पहला पन्ना किसी सरकारी योजना व कार्यक्रम अथवा कारपोरेट के विज्ञापन से भरा होता है लेकिन गत रविवार (14 फरवरी,2021) को इंडियन एक्सप्रेस के पहले पृष्ठ पर एक विज्ञापन था, जो विज्ञापन नहीं बल्कि एक अपील और राष्ट्र के समक्ष विनयशील संबोधन था। 

यह विज्ञापन ‘गोवा माइनिंग पीपल्स फ्रंट’ की ओर से दिया गया था, जिसमें उन्होंने अपनी आजीविका बचाने की अपील करते हुए उल्लेखित किया था कि तक़रीबन तीन साल से गोवा की प्रमुख आर्थिक गतिविधि पूरी तरह से ठप पड़ी है, जिसके कारण क़रीब तीन लाख गोवा निवासी बेरोजगार हो गए हैं। गोवा माइनिंग पीपल्स फ्रंट असल में एक स्वतंत्र संगठन है, जिसके बैनर तले पिछले तीन साल से बंद लोहे की खदानों में काम को फिर से शुरू करने की मांग की जा रही है।

तस्वीर साभार : twitter.com

गोवा की लौह खदानों में काम मार्च, 2018 से ही रुक हुआ है, जब सुप्रीम कोर्ट ने यहाँ की 88 माइनिंग लीज़ ख़ारिज कर दी थी। इससे लोगों के लिए आजीविका की समस्याएं तो खड़ी हुई ही हैं, राज्य का रेवेन्यू भी गिर गया है। इसके ख़िलाफ़ लोग लगातार आंदोलन कर रहे हैं, हालांकि राजनीतिक पार्टियां व मीडिया उनपर बिल्कुल ध्यान नहीं दे रहे हैं, क्योंकि पूरा ध्यान चुनावों पर दिया जा रहा है। गोवा माइनिंग पीपल्स फ्रंट ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी अपील की है कि वे इस मामले में हस्तक्षेप कर इस समस्या को सुलझाएं, हालांकि इस दिशा में कोई प्रतिक्रिया अभी तक नहीं आयी है। ऐसे में, इंडियन एक्सप्रेस जैसे अख़बार के माध्यम से मुख्यधारा का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए यह प्रयास अच्छा है, लेकिन इसका कोई व्यापक प्रभाव होता दिख नहीं रहा है।

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यह घटना इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि वर्तमान में प्रचार के प्लेटफार्म के रूप में जैकेट पृष्ठों की बढ़ती लोकप्रियता के साथ ही अखबारों के पहले पन्ने के लगभग पूरी तरह से ख़त्म हो जाने का ख़तरा उत्पन्न हो गया है। ध्यान दें तो मालूम चलेगा कि अब सभी बड़े अखबारों द्वारा जैकेट विज्ञापन स्वीकार किए जाने लगे हैं। इसमें कई बार पाठक भ्रमित हो जाता है कि यह संपादकीय है अथवा विज्ञापन और इस तरह विज्ञापनकर्ता अपने उद्देश्य में सीधे तौर पर सफल हो जाता है। याद करिए, जब व्हाट्सएप्प की प्राइवेसी पॉलिसी को लेकर बात चली थी और लोग आपत्ति दर्ज कर रहे थे, उसके अगले ही दिन इंडियन एक्सप्रेस, हिंदू सहित तमाम बड़े अख़बारों का पहला पृष्ठ व्हाट्सएप्प के विज्ञापन से भरा हुआ था। दरअसल वर्तमान में समाचार अथवा सूचना प्रदान करने के पुराने तरीक़े में तीव्रता से बदलाव आया है। ऐसे में समाचार पत्रों व प्रिंट पत्रकारों की भूमिका, उनकी विश्वसनीयता और खबरों की शुद्धता को लेकर संशय उत्पन्न होता है। बीते कुछ समय से सूचना क्षेत्र में निजी समूहों का हस्तक्षेप बढ़ गया है। ऐसे में रेवेन्यू की उगाही के लिए संघर्ष करते समाचार पत्रों के पास उनके फरमान स्वीकारने के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प नहीं होता। हिंदुस्तान टाइम्स से लेकर टाइम्स ऑफ इंडिया तक में विज्ञापनदाताओं की भूमिका लगातार मज़बूत हुई है। हालांकि कई बार कुछ एक ऐसी घटनाएं होती हैं, जो एक वृहद उद्देश्य लेकर चलने के कारण अपनी ओर ध्यान खींचती हैं।

प्रचार के प्लेटफार्म के रूप में जैकेट पृष्ठों की बढ़ती लोकप्रियता से अखबारों के पहले पन्ने के ख़त्म हो जाने का ख़तरा उत्पन्न हो गया है।

गोवा माइनिंग पीपल्स फ्रंट द्वारा राष्ट्र से की गई अपील को विज्ञापन के रूप में पेश करना उसी का एक भाग है। हालांकि ज़रूरत तो यह थी कि लोगों के इस संघर्ष व आंदोलन की आवाज़ को पहले पन्ने पर ख़बर के रूप में जगह दी जाए, जन-विमर्श का मुद्दा बनाने के लिए संपादकीय में भी इस मुद्दे पर गहन विवेचना हो, हालांकि पूंजीवाद के बढ़ते कदमों के कारण और समूची व्यवस्था में निजी खिलाड़ियों सहित सरकारों के चुनाव-केंद्रित नज़रिए के बीच ऐसी उम्मीद करना बेमानी ही होगी।


तस्वीर साभार : financialexpress

गायत्री हिंदू कॉलेज से इतिहास विषय में ऑनर्स की पढ़ाई कर रही हैं। मूलत: उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र के एक छोटे से गांव से दिल्ली जाने वाली पहली महिला के रूप में उनके पास सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य से जुड़े बहुत सारे अनुभव हैं, जो इंटरसेक्शनल नारीवाद की ओर उनके झुकाव के प्रमुख कारक हैं। उनकी दिलचस्पी के विषयों में नारीवाद को गांवों तक पहुंचाना और ग्रामीण मुद्दों को मुख्यधारा में ले आना शामिल हैं।

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