लड़कियों की शादी की उम्र बढ़ाकर 21 साल करना उतना प्रगतिशील फ़ैसला नहीं है जितना इसे समझा जा रहा
लड़कियों की शादी की उम्र बढ़ाकर 21 साल करना उतना प्रगतिशील फ़ैसला नहीं है जितना इसे समझा जा रहा
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एडिटर्स नोट : यह लेख मूल रूप से अस्मिता घोष ने लिखा है जिसका अनुवाद कीर्ति द्वारा किया गया है। यह लेख ऑक्सफैम इंडिया के कैंपेन #EmpowermentNotAge का हिस्सा है। इस कैंपेन के बारे में अधिक जानने के लिए क्लिक करें।

74वें स्वतंत्रता दिवस के दिन प्रधानमंत्री मोदी ने यह ऐलान किया था कि सरकार लड़कियों की शादी की उम्र 18 साल  से 21 साल करने का विचार कर रही है। आपको यह बता दें, कि भारत में लड़कों की शादी की उम्र 21 वर्ष है और लड़कियों की 18 वर्ष है। सरकार का ये विचार आपको भारत में लिंग समानता की दिशा की ओर अग्रसर लग रहा होगा, जबकि ऐसा नहीं है। वर्ष 2015-16 में, 63 फीसदी लड़कियों की शादी 21 वर्ष से पहले ही हो गई थी। यदि सरकार लड़कियों की शादी की उम्र 18 से 21 करती है, तो इन 63 फीसदी लड़कियों और इनके परिवार, इस कानून के अंतर्गत अपराधी घोषित हो जाएंगे जो कि आधे देश की आबादी है।

पूरे विश्व में बालिग होने की उम्र 18 है!

पूरे विश्व में बालिग होने की उम्र 18 है। इस उम्र के युवा को अपने फैसले खुद लेने का अधिकार है,  जैसे- वोट, ड्राइविंग लाइसेंस, शादी का फैसला करना आदि। 2019 में,  पीएलडी इंडिया ने एक अध्ययन किया कि ‘18 वर्ष से कम उम्र की लड़कियां शादी करने के लिए घर से क्यों भागती हैं?’  जिसमें अधिकतर युवा, शादी को एकमात्र सम्मानजनक तरीके के रूप में देखते है, जिसके माध्यम से वे अपनी सेक्सुअलिटी को अच्छे से जान सकते हैं और एक सहमतिपूर्ण रिश्ते में हो सकते हैं। विशेष रूप से अंतर्जातीय संबंधों के लोगों के लिए, अक्सर एकमात्र विकल्प भागना ही होता है और जिनके माता-पिता को उनके रिश्ते के बारे में पता चल जाता है, या फिर लड़की गर्भवती हो जाती है और अपने रिश्ते को छिपा नहीं पाती है। उनके लिए भागना एक समाधान बन जाता है।

कई लोगों को, शादी एक रुढ़िवादी परिवार से दूर जाने का आसान तरीका नजर आता है। की उसकी मर्ज़ी के बिना ही किसी दूसरे लड़के से शादी कर देते हैं। इसके अलावा, 18 साल की होने तक लड़की को किसी शेल्टर होम में भेज देते हैं, जब तक कि उसका पति जेल से वापस नहीं आ जाता है। लड़कियों की शादी की उम्र 18 से 21 करने से, लड़कियों पर राज्य और उसके परिवार की पकड़ बनी रहती है। वैसे भी भारत में युवा औरतों और लड़कियों का पहले से ही अपनी जिंदगी के फैसले लेने के अधिकार कम ही है।  15 राज्यों के 2500 युवाओं का सर्वेक्षण करने वाली एक रिपोर्ट के मुताबिक, ज्यादातर हाशिए के समुदायों से, शादी की उम्र में इस प्रस्तावित वृद्धि के संबंध में, यह पाया गया कि युवा लोग अपने फैसले खुद लेने की आजादी चाहते हैं और अपने ऊपर से परिवार की पकड़ को कम करना चाहते है। 

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बाल-विवाह सांस्कृतिक बुराई है, जिसे जड़ से खत्म करने की जरूरत है।

समाज इस पर विश्वास करता है कि जल्दी शादी होने से लड़की के साथ यौन हिंसा होने से रोका जा सकता है, जिससे उसकी शुद्धता और परिवार की इज़्ज़त बची रहती है और कम दहेज़ की जरूरत होती है और इससे लड़की को घर से भागने से भी रोका जा सकता है।  परिवार के मान- सम्मान को लड़की की शादी और उसकी कथित शुद्धता से जुड़ा हुआ माना जाता है। लड़कियों को अक्सर पराया धन के रूप में ही देखा जाता है, जिसकी कम उम्र में ही शादी कर देना बेहतर है। आज भी लड़की की पढाई में पैसे लगाने को अनावश्यक खर्च के रूप में देखा जाता है। कम उम्र में शादी भारत में इतनी सामान्य है कि अक्सर सरकारी विभाग भी इसे अनदेखा कर देता है। विशेषज्ञों का ये मानना है कि  ऐसी दंडात्मक नीति के कारण इन सांस्कृतिक कुरीतियों का खत्म होना मुश्किल है। बल्कि इन नीतियों के कारण गैर-कानूनी शादियों में बढ़ोत्तरी हो सकती है।

वर्ष 2015-16 में, 63 फीसद लड़कियों की शादी 21 वर्ष से पहले ही हो गई थी। यदि सरकार लड़कियों की शादी की उम्र 18 से 21 करती है, तो इन 63 फीसदी (देश की 75% गरीब जनसंख्या इसके अंतर्गत आती है) लड़कियों और इनके परिवार, इस कानून के अंतर्गत अपराधी घोषित हो जाएंगे जो कि आधे देश के बराबर है। ऐसी सांस्कृतिक कुरीतियों को हराने के लिए उनकी जड़ों को उखाड़ना जरूरी है। लड़की की पढाई में पैसा लगाना, उसके लिए रोज़गार के अवसर पैदा करना, उसकी शादी में देरी करना और ऐसी नकारात्मक सामाजिक बुराइयों के लिए सख्त कदम उठाना आवश्यक है।

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मौजूदा कानून बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, प्रभावी ढ़ंग से काम नहीं कर रहा है 

2006 में विश्व में सबसे अधिक बाल विवाह भारत में हुआ था। हालांकि बाल विवाह में 47% से 27% दर तक की गिरावट तो हुई है, जिसका मतलब यह है कि अभी भी हर चार लड़कियों में से एक लड़की की शादी 18 साल से पहले ही हो जाती है। औसतन, भारत में प्रतिवर्ष 1.5 मिलियन बाल विवाह होते है। इसकी तुलना, बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006, के अंतर्गत दर्ज हुए मामलों की संख्या से की जानी चाहिए। 2016 में, सिर्फ 645 मामले दर्ज हुए थे, 1954 लोग गिरफ्तार हुए और सिर्फ 70 लोगों को ही दोषी करार दिया गया था।

स्पष्ट रूप से, कानून इस विशेष सामाजिक कुरीति का प्रभावी समाधान नहीं है। जमीनी स्तर पर बाल विवाह लगातार  हो रहे है, जबकि पदाधिकारी और राज्य दूसरी ओर ही देख रहे है। भारत में होने वाले बाल विवाहों की संख्या को कम करने के लिए,एक दंडात्मक उपाय के बजाय हमें सकारात्मक रूप से लोगों को इस अभ्यास से दूर करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।

पहले से ही हाशिए पर रहने वाले लोग होंगे और भी ज्यादा प्रभावित

गरीब परिवारों में देखा गया है कि शादियां जल्दी हो जाती हैं। उदाहरण के लिए सबसे गरीब तबके में 75 प्रतिशत लड़कियों की शादियां 21 साल से भी कम उम्र में कर दी जाती है। हमारी आबादी के सबसे गरीब 20% तबके में बड़े पैमाने पर दलित और आदिवासी समुदाय हैं जिसमें 45.9% एसटी परिवारों से और 26.6% एससी परिवारों से शामिल है वहीं ‘सामान्य’ श्रेणी के केवल 9.7% लोग ही इस श्रेणी में आते हैं। ये पिछड़े तबके पहले से ही सामाजिक हिंसा और भेदभाव का खामियाजा भुगत रहे हैं और अगर शादी की उम्र को 21 साल तक बढ़ा दिया जाएगा तो इन्हें और अधिक अपराधी बना दिया जाएगा। कई सर्वे में पता भी चला है कि पढ़ाई का भी इसमें काफी फर्क पड़ता है।  NFHS के आंकड़ें बताते हैं कि जिन लड़कियों ने 12 साल स्कूली शिक्षा पूरी की है उनकी शादी उन लड़कियों के मुकाबले 5 साल बाद हुई जिन्होंने स्कूल में सिर्फ 5 साल ही पूरे किए।  

यहाँ फिर वही समस्या सामने आती है। हम देख सकते हैं कि काफी हद तक अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की लड़कियाँ ही शिक्षा से बाहर हो जाती हैं और इसलिए कम उम्र में शादी कर लेती हैं। NFHS के आंकड़ों से पता चलता है कि एसटी महिलाओं में से 42% और एससी महिलाओं में से 33% महिलाओं ने कोई शिक्षा प्राप्त नहीं की है। शिक्षा प्रणाली दलित और आदिवासी लड़कियों के लिए ठोस कदम उठाने में असमर्थ रही है। अगर लड़कियों की शादी की उम्र बढ़ा दी जाएगी तो नतीजन दलित और आदिवासी लड़कियों के परिवार का अपराधीकरण बढ़ जाएगा।

इस फ़ैसल के के पीछे की वजह समझ नहीं आती

सरकार ने इस मुद्दे पर सिफारिशें देने के लिए जून 2020 में एक टास्क फोर्स का गठन किया। इसमें यह पता लगाया गया कि शादी की उम्र बढ़ाने से मातृत्व स्वास्थ्य व पोषण में सुधार और प्रजनन दर पर क्या प्रभाव पड़ता है? कई शिक्षाविदों, कार्यकर्ताओं और नागरिक समाज संगठनों द्वारा टास्क फोर्स को संबोधित किए गए एक संयुक्त नोट में इन दावों को सबूतों और रिसर्च के साथ गलत साबित किया गया।  

सबसे पहली बात यही कि खराब मातृ स्वास्थ्य और कुपोषण (और इसके परिणामस्वरूप उच्च मातृ मृत्यु अनुपात) मुख्य रूप से गरीबी के कारण होता है, जल्दी शादी की वजह से नहीं। गरीबी के कारण स्वास्थ्य खराब होता है। एक युवा मां जो 18 वर्ष की आयु में एनीमिया से पीड़ित है उसकी यह बीमारी 21 वर्ष की आयु में भी जारी ही रहेगी। जैविक रूप से एक स्वस्थ शरीर 18 वर्ष की आयु में एक स्वस्थ बच्चे को जन्म देने में सक्षम है अगर उसको अच्छी देखभाल मिले। माता का स्वास्थ्य और पोषण में सुधार करने के लिए विवाह की न्यूनतम आयु में मनमानी वृद्धि के बजाय गरीबी उन्मूलन और लैंगिक समानता पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है।

दूसरी बात यह कि भारत में प्रजनन दर पहले से ही गिर रही है। 13 राज्यों में, प्रजनन दर नीचे के स्तर पर गिर गई है जिसमें बिहार और तेलंगाना जैसे राज्य शामिल हैं। इन राज्यों में सबसे कम उम्र में भी शादियां दर्ज की गई हैं। स्पष्ट रूप से सामाजिक आर्थिक स्पेक्ट्रम के लोग छोटे परिवार रखते हैं चाहे वे कम उम्र में शादी कर लेते हैं। फिर शादी की न्यूनतम उम्र को विनियमित करने से प्रजनन दर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है, जो वैसे भी गिर रहे हैं।    

 

जिस काम की असल में जरूरत है उस पर ध्यान दें – शिक्षा, रोज़गार और सशक्तिकरण

जल्दी शादी करने का एक सबसे बड़ा कारण स्कूल ड्रॉपआउट है। भारतीय स्कूल प्रणाली लड़कियों के लिए वैसे भी बहुत सी समस्याओं भरा है। इसमें महिलाओं को स्वच्छ शौचालयों की कमी, पीरियड्स की स्वच्छता से लेकर यौन उत्पीड़न जैसी समस्याओं से गुजरना होता है। मौजूदा शोध से पता चलता है कि जिन गांवों में उच्च विद्यालय हैं वहां पर कम उम्र की शादियां कम दर्ज होती हैं।  लड़कियों की शिक्षा में सुधार लाने पर ध्यान केंद्रित करने से और इसमें भी विशेष रूप से हाशिए पर बैठे समुदायों पर ध्यान देने से शादी की उम्र अपने आप बढ़ने लगेगी। इसके अलावा, स्किलिंग और रोजगार के अवसर लड़कियों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने का काम करते हैं और इस धारणा को बदलने का काम करते हैं कि महिलाएं परिवार पर वित्तीय बोझ हैं और जिन्हें शादी करने की जरूरत है। यह लड़कियों और युवा महिलाओं को अपने जीवन और उनके विवाह पर बातचीत करने के अधिक से अधिक अवसर प्रदान करता है।

जल्दी विवाह की घटनाओं को कम करने के लिए एक सक्षम वातावरण बनाना दंडात्मक नीति बनाने की तुलना में बहुत अधिक फायदेमंद है जो लाखों लोगों को अपराधी बना सकता है। इसमें कोई शक नहीं है कि भारत में जल्द शादी को रोकने के लिए एक-साथ मिलकर काम करना होगा। लड़कियों की शादी में देरी उन्हें शिक्षा पूरी करने और आर्थिक आजादी में सहायक होती है, जो उन्हें खुद शादी का फैसला लेने का अधिकार देता है।

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अगर आप #EmpowermentNotAge अभियान में भाग लेना चाहते हैं, तो आप अपने स्थानीय सांसद से संपर्क कर उन्हें शादी की न्यूनतम उम्र बढ़ाने के फ़ैसले के खतरे के बारे में बता सकते हैं। पता करें कि उनसे कैसे संपर्क करें और यहां क्या कहना है। आप यहां इस याचिका पर हस्ताक्षर भी कर सकते हैं!

तस्वीर साभार : YourStory

Kirti is the Digital Editor at Feminism in India (Hindi).  She has done a Hindi Diploma in Journalism from the Indian Institute of Mass Communication, Delhi. She is passionate about movies and music.

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