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“एक राजकुमारी थी; बेहद नाज़ुक और ख़ूबसूरत। सात समंदर पार एक राक्षस ने उस राजकुमारी को पुराने वीरान क़िले में क़ैद कर रखा था। राजकुमारी क़िले में बंद अपनी क़िस्मत पर रोती। फिर एक दिन एक राजकुमार आया।”

आधुनिक संदर्भ में यह पुरानी लोककथा यहीं ग़लत हो जाती है, क्योंकि ख़ुद ‘राजकुमार’ ने ही सात समंदर पारकर किसी ऊंची बिल्डिंग के तीसवें माले पर ‘राजकुमारी’ को क़ैद कर रखा है। बेटी के पैदा होने और उसे लाड़ से बड़ा करने के बाद मां-बाप का एकमात्र सपना होता है कि उसे सुंदर-सुशील, गुणी ‘राजकुमार’ मिले। वह जमाना तो अब रहा नहीं जब बेटे के लिए लड़की खोजने में घर के मर्दों के जूतें घिस ज़ाया करते थे या जब बेटे के बाप को लड़कीवालों की दहलीज़ पर नाक रगड़नी पड़ती थी कि हम आपकी बेटी को अपने घर की इज़्ज़त का रुतबा देंगें। जैसे-जैसे भारत में बेटियों की तादाद बढ़ती गई, बेटेवालों की नाक उसी अनुपात में ऊंची होती गई और दिमाग़ आसमान को छूने लगा। संयुक्त परिवारों के बिखरने और रोटी-रोज़ी के चक्कर में दूर-दराज अपने क़स्बों से बाहर जाकर बसने वालों के लिए रिश्तेदारों और परिचितों के दायरे भी सिमटते गए।

इन्हीं परेशानियों ने मेट्रोमोनियल कॉलम और मैरिज ब्यूरो को जन्म दिया। मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए वैवाहिक विज्ञापनों में सबसे आकर्षक उम्मीदवार होते हैं, ‘विदेशों में बसे, ग्रीन कार्ड होल्डर एनआरआई यानी अप्रवासी भारतीय। भारत में बसे उनके माता-पिता अपने सुपुत्र के आने से पहले ही ‘फ़ेअर, गोरी, अच्छी पढ़ी-लिखी’ कन्या के लिए इश्ताहर दे देते हैं और फिर महीनेभर की छुट्टी में शादी की मंडी में थोक में कन्याएं देखी और रिजेक्ट की जाती हैं। ये एनआरआई कुंवारी लड़कियों का मेडिकल चेकअप करवाने से भी पीछे नहीं हटते।

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ऐसी ही एक बेहद ‘गोरी, सुंदर और शालीन’ लड़की को जब एक पैंतीस साल के अप्रवासी ‘लड़के’ ने पसंद कर लिया तो उसकी मध्यमवर्गीय मां अपनी बेटी की क़िस्मत पर ख़ूब इतराई थी। फ़िरंगी ज़बान में हिंदी बोलने वाला दामाद उसे परी देश का राजकुमार लगा था, जो लंबी-सी गाड़ी में उनकी बेटी को बिठाकर घुमाएगा। बटन दबाते ही खुलने वाली गाड़ी की छत, रिमोट दबाकर खुलने वाले गैरेज, क़ालीन बिछा घर, कांच की दीवारों वाली ऊपर जाती लिफ़्ट जैसे अनगिनत सपने उनकी आंखों में कौंध रहे थे। पर जन्नत की हक़ीक़त कुछ और ही थी। बेटी दो साल के बाद लौटी तो हड्डियों का ढांचा रह गई थी। लड़के के किसी विदेशी शादीशुदा औरत से संबंध थे और इस लड़की का दर्जा एक बंधुआ मज़दूर और घर में क़ैद नौकरानी से अधिक नहीं था। मां इस सदमे को बदार्शत नहीं कर पाई और दिल के दौरे से उसकी मौत हो गई। उस लड़की ने बताया कि इसी अंदेशे से उसने दो साल अपनी मां को अपनी तकलीफ़ के बारे में कुछ नहीं बताया। पासपोर्ट भी पति ने लॉकर में बंद कर दिया था, हाथ में पैसे वह देना नहीं था कि आने की कोई जुगत लगा पाती। यह कहानी किसी एकाध मध्यमवर्गीय परिवार की नहीं है, इस तरह के पच्चीसों मामले हर महिला संगठन के काउसलिंग विभाग में दर्ज़ हैं।

भारत में बसे उनके माता-पिता अपने सुपुत्र के आने से पहले ही ‘फ़ेअर, गोरी, अच्छी पढ़ी-लिखी’ कन्या के लिए इश्ताहर दे देते हैं और फिर महीनेभर की छुट्टी में शादी की मंडी में थोक में कन्याएं देखी और रिजेक्ट की जाती हैं। ये एनआरआई कुंवारी लड़कियों का मेडिकल चेकअप करवाने से भी पीछे नहीं हटते।

आम मध्यमवर्गीय परिवारों में ऐसी खबरें बाहर नहीं आ पाती। इनके बारे में पता तभी चलता है जब ख़ास परिवारों में ऐसा होता है। सालों पहले जब अमेरिका के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन सत्रह साल बालकृष्ण अंबाती को दुनिया का सबसे कम उम्र का डॉक्टर होने का सम्मान दे रहे थे। उसकी मां अपने बड़े बेटे डॉक्टर जयकृष्ण अंबाती की पत्नी अर्चना की रखवाली कर रही थी कि कहीं वह अपनी यातना की कहानी दुनिया को न बता दे। वैसे भी अर्चना ‘अपने मां-बाप को परेशान करना नहीं चाहती थी, जिन्होंने अपनी हैसियत से बढ़कर बड़े चाव से शादी की थी। इसलिए जब तक वह बर्दाश्त कर सकती थी, उसने किया। अर्चना की शादी अखबारी विज्ञापन के ज़रिए ही हुई थी और पहले ही दिन से उसने भांप लिया था कि अंबाती परिवार ने दहेज के लालच में उसके पिता का व्यवसाय देखकर रिश्ता तय किया था। कितना ही संभ्रांत, पढ़ा-लिखा, उच्च मध्यमवर्गीय परिवार हो, अपने इंजीनियर या डॉक्टर बेटे को एक ब्लैक चेक समझने की मानसिकता इतने गहरे तक जड़ें फैला चुकी है कि बेटे की योग्यता को इनकैश करवाने का लालच उन्हें कभी संतुष्ट नहीं होने देता और इसकी क़ीमत चुकानी पड़ती है एक उतनी ही ज़हीन, तमीज़दार लड़की को, जिसका जुर्म सिरफ् यह है कि वह ऐसे परिवारोॆ के ऊपरी मुखौटे को पहचानने की भूल कर बैठती है।

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अमेरिका और लंदन जैसे देशों में भी दहेज का घिनौना दांव समय और देश की सीमाओं को पार कर विदेशों तक फैल गया है। कुछ साल पहले न्यूजर्सी, अमेरिका के इंजीनियर दीपक कटारिया का मामला अख़बारों में रहा, जिसने दहेज को लेकर अपनी डॉक्टर पत्नी अनु टंडन को अपनी कलाई की नस काटकर आत्महत्या की कोशिश करने की कगार तक पहुंचा दिया। अर्चना अंबाती और अनु टंडन, दोनों पढ़ी-लिखी, आधुनिक सोच वाली, समझदार लड़कियां थी, फिर उन्हें इतनी शारीरिक और मानसिक यातनाएँ झेलने की, भूखे रहने, बासी खाना खाने और यौन शोषण सहने की क्या ज़रूरत थी? सीधा ज़वाब यह है की आज भी एक भारतीय लड़की का अपने मां-बाप के प्रति गहरा लगाव है। वह अपने माता-पिता के रंगीन सपने कि ‘उनकी बेटी सुखी है’ को तोड़ना नहीं चाहती है। इसके साथ ही यह डर कि उसके शादी तोड़कर लौटने से उसकी छोटी बहन की शादी में दिक़्क़त आ सकती है। इसलिए ज़रूरी है कि लड़कियों को सशक्तिकरण के अन्य चरण पर लाने की दिशा का काम हो, जहां लड़कियां अपने ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा सकें और बिना किसी दबाव के अपने अधिकारों के हनन को रोकें।

मानसिक रूप से लड़कियों को सशक्त करना अब समय की मांग बन गया है क्योंकि जैसे ही वे एक हिंसा के सामने सिर झुकाती है, उनका अस्तित्व भी धुंधला होने लगता है और वे मानसिक रूप से भी टूटने लगती है। कई बार इससे उनका जीवन भी ख़तरे में आ जाता है। इसके लिए लड़कियों के परिवार को आगे आना होगा और उन्हें ये विश्वास दिलाना होगा कि शादी के बाद किसी भी हिंसा के ख़िलाफ़ जब बेटी आवाज़ उठाएगी तो उसका साथ उसका मायका कभी नहीं छोड़ेगा।

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तस्वीर साभार : Deccan Chronicle

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