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भारतीय समाज एक पुरुष प्रधान समाज रहा है, यहां पर पुरूषों को महिलाओं की तुलना में ज्यादा अधिकार दिए गए है। पितृसत्तात्मक समाज के अंतर्गत भारतीय समाज में पुरुषों को महिलाओं की तुलना में सामाजिक, आर्थिक, राजनीति, सांस्कृतिक और धार्मिक रूप से श्रेष्ठता दी गई है। इस समाज में हमेशा से पुरूषों का वर्चस्व रहा है। मौजूदा परिदृश्य में पुरुष और महिला के मध्य जो असमानताएं देखने को मिलती हैं क्या प्रकृति ने उसे खुद बनाया है या इस पितृसत्तात्मक समाज ने इसे बनाया है। असल में इसे इस पुरुष प्रधान समाज ने बनाया है। इस रुढ़िवादी परंपरा ने स्त्रियों को विवशता की बेड़ियों में जकड़कर रखा है। ऐसी व्यवस्था जहां घर का सबसे बड़ा पुरुष घर का मुखिया माना जाता है और उसका निर्णय प्रभावी होता है। जबकि स्त्री उसके निर्देशों का पालन करती है। इसमें लड़की या स्त्री से ज्यादा लड़के या पुरुष को महत्व दिया जाता है और वही शक्ति का केंद्र होते हैं। चाहे घर पर सबसे बड़ी महिला हो पर व्यवहार में यह व्यवस्था अभी भी नहीं है कि उसकी बात मानी जाए। आज भी बेटे के पैदा होने पर सोहर गाना, केवल लड़का होने पर छठ पूजा करना आदि पितृसत्तात्मक समाज में मौजूद लड़के-लड़की के बीच मौजूद अंतर को दिखाता है।

गर्डा लर्नर पितृसत्ता को परिभाषित करते हुए कहती हैं, “पितृसत्ता, परिवार में महिलाओं और बच्चों पर पुरुषों के वर्चस्व की अभिव्यक्ति का ज़रिया है। यह संस्थागत और सामान्य रूप से महिलाओं पर पुरुषों के सामाजिक वर्चस्व का विस्तार है। इसका मतलब है कि पुरुषों का समाज के सभी महत्त्वपूर्ण सत्ता प्रतिष्ठानों पर नियंत्रण है। महिलाएं ऐसी सत्ता तक अपनी पहुंच से वंचित रहती हैं।” वह यह भी कहती हैं, “इसका यह मतलब नहीं है कि महिलाएं या तो पूरी तरह शक्तिहीन हैं या पूरी तरह अधिकारों, प्रभाव और संसाधनों से वंचित हैं। इसका अर्थ यह भी नहीं है कि हर पुरुष हमेशा वर्चस्व की और हर महिला हमेशा अधीनता की स्थिति में ही रहती है बल्कि जरूरी बात यह है कि इस व्यवस्था, जिसे हमने पितृसत्ता का नाम दिया है, उसके तहत यह विचारधारा प्रभावी रहती है कि पुरुष स्त्रियों से अधिक श्रेष्ठ हैं और महिलाओं पर उनका नियंत्रण है और होना चाहिए। यहां महिलाओं को पुरुषों की संपत्ति के रूप में देखा जाता है।”

यही पितृसत्तात्मक समाज औरत को स्वतंत्रता और फैसला लेने का अधिकार नहीं देता। यह समाज हमेशा ही महिलाओं को सामाजिक रोक-टोक से जकड़कर रखना चाहता है। हमारे समाज को महिला की प्रगति से डर लगता है। सामाजिक व्यवस्था महिला शोषण से चलती है और महिलाओं का उत्थान शोषण को खत्म करता है। महिलाओं को अपने अधिकारों को लागू करता देख यह समाज उन्हें रोकने के लिए बहुत से षड्यंत्र रचता है। इसका मूल आधार है हमारा रूढ़िवादी समाज, उसकी दमनकारी सोच, असमानता और लिंग के आधार पर भेदभाव ही है। इसी सोच को यह डर है वह जिन महिलाओं को चार दीवारी में बांध कर रखना चाहते हैं, जिसे वह खुद से कमतर आंकते हैं, क्या पता वो पुरुषों से बहुत आगे निकल जाए? इसी दमनकारी सोच के लोगों को महिलाओं का चहकना, खुलकर बातें करना, आर्थिक रूप से स्वतंत्र रहना रास नहीं आता। यह पुरुष प्रधान समाज चाहता है कि उनकी बेटी, पत्नी, बहनों को समान अधिकार मिलने की जगह घर के अंदर सीमित रखा जाए।

महिलाओं की स्थिति को सुधारने के लिए यह ज़रूरी है कि पुरुष वर्चस्व को ही नकार दिया जाए, उसे चुनौती दी जाए।

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इस पुरुष प्रधान समाज में औरत हर हाल में शोषित की जाती रही है। इतिहास इस बात का गवाह है जिसने असमानता के मैदान में सिर्फ और सिर्फ औरतों को शोषित होते हुए देखा और पुरुष को सार्थक बनाने के लिए जी भर के महिलाओं के एहसासों को अपने अहम के तले रौंदा है। आज भी कार्यस्थलों में महिलाओं की भूमिका का प्रतिशत पुरुषों के बराबर नहीं है। कम वेतन, प्रमोशन देर से देना, शारीरिक शोषण, प्राथमिक कार्यों का समान वितरण ना होना, वेशभूषा आदि को लेकर असमानता समाज के एक बड़े वर्ग में पाई जाती है। जब एक औरत पढ़ती है तो इस पुरुष प्रधान समाज को इस बात का डर होता है कि कहीं वह उनके विचारों को गलत न साबित कर दे और कहीं पर उनसे आगे न निकल जाए। इसीलिए पहले के ज़माने में हमारे देश में महिलाओं की कम उम्र में शादी करा दी जाती थी ताकि वह घर के कामकाज में उलझी रहे और पढ़ाई से उनका ध्यान हमेशा हटा रहे। यह पितृसत्तात्मक समाज महिलाओं को आर्थिक रूप से मदद कर उन्हें अपनी दासी के रूप में देखता है,इस तरह की मानसिक सोच वाले लोग कैसे हज़म कर पाएंगे किसी महिला का उनसे ऊपर ओहदे पर बैठना। उनके अहम् को चोट पहुएंगी महिला जिसे वो दासी रूप में देखता है, उसे उसके कहे अनुसार काम करना पड़ रहा है।

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महिलाओं की स्थिति को सुधारने के लिए यह जरूरी है कि पुरुष वर्चस्व को ही नकार दिया जाए, उसे चुनौती दी जाए। इस पुरुष प्रधान समाज में जो महिलाओं का दमन-शोषण करना अपना शौक समझते थे, वह इस बात को हन नहीं कर पा रहे कि दबी-कुचली महिलाएं अपने अधिकारों के लिए बोलने लगी हैं, आर्थिक रूप से किसी पर निर्भर नहीं हैं, अपने कार्य-कौशल और काबिलियत से उनसे ऊपर ओहदे पर कम कर रही हैं। आज के दौर की महिलाएं पुरुष के समकक्ष ही नहीं, बल्कि कई क्षेत्रों में तो पुरुष के वर्चस्व को भी चुनौती दे रही हैं। अपनी मेहनत और काबिलियत के बल पर उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई है, लेकिन इस पितृसत्तात्मक समाज ने आज भी अपने कमतर आंकना नहीं छोड़ा है।

इस पितृसत्तात्मक समाज की सोच को बदलने के लिए राजनीतिक दलों, सरकारों एवं सामाजिक संगठनों को मिलकर काम करना होगा। इस मानसिकता के नहीं बदलने तक महिलाओं की स्थिति में सुधार संभव नहीं है। आज भी स्वतंत्र स्त्री की पराधीनता में सबसे बड़ी बाधक बात यही है कि वह हमेशा किसी न किसी के साथ तुलना की शिकार हो जाती है, वह एक स्वतंत्र इकाई के रूप में स्वीकार्य ही नहीं की जाती है। समाज के हर सदस्य को समान व्यवहार मिलना चाहिए फिर चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, उसकी तुलना मानवीय मूल्यों के साथ की जानी चाहिए।

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तस्वीर : Electric literature

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