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बच्चों के लिए खिलौनों का बहुत महत्व है। न सिर्फ इनसे उनकी बचपन की आदतें और यादें जुड़ जाती हैं बल्कि बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास में भी ये सहयोग करते हैं। लेकिन खिलौनों की दुनिया को भी हमने लिंग के आधार पर बांट दिया है। बच्चे किस तरह के खिलौनों से खेलेंगे या कौन से रंग के कपड़े पहनेंगे ये हम अपनी सोच, समझ और धारणाओं के अनुसार तय करते हैं। उस अबोध बच्चे को भले ही कार और गुड़िया या नीले और गुलाबी रंग में अंतर न समझ आए, हमारी कोशिशों से वह बखूबी इन अंतरों को अपने भीतर गांठ बांध लेता है। लड़कों के लिए कार या लड़कियों के लिए गुड़िया की कहानी सिर्फ भारतीय परिपेक्ष्य में ही नहीं, पूरी दुनिया में एक सी है। इन खिलौनों में भी मां-बाप ऐसे प्रतिमान ढूंढते हैं जिससे हमारे ‘संस्कार’, ‘सुंदरता’ या ‘सामाजिकता’ के मानदंड मेल खाते हो। जैसे गुलाबी या लाल फ्रॉक पहनी नीली आंखों वाली गोरी और सुंदर गुड़िया हो या भड़कीले, चमकदार रंग की कार या हेलिकॉप्टर को हम अधिक पसंद करते हैं। गुलाबी रंग की कार या सांवली गुड़िया शायद ही आपको भारत के बाज़ार में मिले। बच्चों के लिए गुड़िया के दुनिया में ऐतिहासिक बन चुकी बार्बी कुछ ऐसे ही प्रतिमानों को स्थापित करना चाहती थी। साल 1959 में न्यूयॉर्क के टॉय फेयर में अमरीकी खिलौना कंपनी मैटल, इंक द्वारा निर्मित पहली बार्बी गुड़िया का प्रदर्शन हुआ था। फैशन डॉल बार्बी खिलौनों की दुनिया की पहली ऐसी गुड़िया थी जो फैशनेबल कपड़े पहनती थी, मेकअप करती थी और शरीर छरहरा था।

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बार्बी का नाम सुनते ही हम एक नीली आंखों वाली गोरी, सुंदर और पतली गुड़िया की कल्पना करने लगते हैं। दुनिया में लड़कियों की सुंदरता के लिए अवास्तविक शारीरिक बनावट और गोरे रंग की पृष्ठभूमि तैयार करने में बार्बी का बहुत योगदान रहा। बार्बी के माध्यम से लड़कियों के समक्ष ऐसे उदाहरण पेश किए जा रहे थे जिनमें उन्हें सुंदर दिखने के लिए गोरी या पतली होना आवश्यक था। बार्बी कई विवादों और मुकदमों से भी घिरी रही जिसमें अधिकतर गुड़िया की शारीरिक बनावट और उसकी जीवन शैली शामिल थे। विवादों से बचने के लिए पिछले साठ सालों में बार्बी लगातार अपने बदलते रूपों में नजर आई है। इनमें गुड़िया के लिए तय की गई रंग-रूप के प्रतिमान और व्यवसायों में भिन्नता शामिल हैं। यह लगभग 130 देशों में व्यवसाय करने में सफल रही। फैशन गुड़िया के बाजार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रही बार्बी आज प्रतीकात्मक बन गई है जिसे ऐसे कई सम्मान मिले हैं जो खिलौनों की दुनिया में दुर्लभ हैं। कंपनी ने अब तक एक अरब से अधिक बार्बी डॉल बेची है जिससे यह कंपनी की सबसे बड़ी और लाभदायक व्यवसाय बनी।

जहां विदेशों में बार्बी शुरुआत से ही अवास्तविक शारीरिक गठन के कारण विवादित रही, वहीं भारत एक ऐसा देश था जहां कंपनी के कई कोशिशों के बावजूद बार्बी को सफलता नहीं मिली। विवादों के परिणामस्वरूप कंपनी ने बार्बी को ब्लैक, लंबी और तुलनात्मक रूप से मोटी अवतारों में बनाना शुरू किया। हालांकि यह प्रयास गुड़िया की दुनिया में रंग-रूप और शारीरिक गठन के अवधारणा को तोड़ने की पहली ऐसी कोशिश थी लेकिन कंपनी यहां भी शारीरिक सुंदरता पर जोर देती रही। ब्लो प्लास्ट इंक कंपनी के साथ संयुक्त रूप से मैटल बार्बी को भारत में साल 1992 में लाई। कंपनी ने गुड़िया की रंग को यहां के अनुसार गहरा किया और उसकी आंखों को नीले रंग के बजाय भूरे रंग का बनाया। हालांकि बार्बी के गुलाबी होंठ, मुस्कान, चमकती आंखें और शारीरिक बनावट में कोई परिवर्तन नहीं किया गया था पर भारतीय नियम के अनुसार होंठ के गुलाबी होने से ज्यादा गोरे रंग की अहमियत थी। इसके अलावा बार्बी की जीवन शैली जो लड़की होते हुए भी रसोई से नहीं बल्कि कई अलग-अलग व्यवसायों से जुड़ी थी, ठाट-बाट और उसके बॉयफ्रेंड केन का उसके साथ होना भारतीय संस्कारों के बिल्कुल विपरीत था।

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कंपनी भारत में फैले रंगभेद, सुंदरता और चारित्रिक गुणवत्ता की धारणाओं को समझने में विफल रही और बार्बी को दोबारा साड़ी में लॉन्च करने के बाद भी वह वह मुकाम हासिल नहीं कर पाई जो विदेशी बाजार में उसने हासिल किया था। भारत में बार्बी को साड़ी में लाना भी संभवतः कंपनी की भूल थी क्योंकि साड़ी पहनने वाली महिलाओं के लिए भी हमारा समाज सुंदरता और चारित्रिक मानदंड नहीं बदलता। जहां दुनिया में बार्बी अलग-अलग रूपों में सांस्कृतिक बदलाव ला रही थी, वहीं हम अपने बच्चों को ही नहीं उसकी गुड़िया को भी घिसे-पिटे दायरे में सीमित रखना चाहते थे। बार्बी की व्यावसायिक जीवन मैकडॉनल्ड्स के कैशियर, फुटबॉल कोच, कंप्यूटर इंजीनियर, पॉप गायक, सर्जन, फायर फाइटर और जीवाश्म विज्ञानी तक फैली हुई है। बार्बी मिस एस्ट्रोनॉट बार्बी के रूप महिला सशक्तिकरण में प्रतीकात्मक छलांग लगाते हुए किसी पुरुष के चांद पर कदम रखने के चार साल पहले ही चांद पर जा चुकी थी।  

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अलग-अलग सांस्कृतिक, सामाजिक या आर्थिक पृष्ठभूमि होने पर भी गोरे रंग या सुंदर होने की चाहत आज भी हम सब को एक सूत्र में बांधे हुए है। इस बात की गहराई हाल ही में ब्रिटेन के पूर्व राजकुमार ‘ड्यूक ऑफ ससेक्स’ हैरी और उनकी पत्नी पूर्व ‘डचेस ऑफ ससेक्स’ मेगन मार्कल के मशहूर अमरिकी टॉक शो होस्ट, टेलीविजन निर्माता और अभिनेत्री ओप्रा विन्फ्रे को दिए साक्षात्कार से लगाया जा सकता है। इसमें मेगन ने कहा कि ब्रिटिश शाही परिवार उनके बच्चे के जन्म से पहले उसके रंग को लेकर चिंतित था। बात दें कि मेगन के माता-पिता की अलग-अलग मूल के हैं। सुंदर चेहरे और गोरे रंग-रूप का जुनून भारतीय समाज में भी किस हद तक है, यह बच्चे के पैदा होने से पहले ही गर्भावस्था में महिलाओं को केसर दूध पिलाने की परंपरा से भांपा जा सकता है। परिवार को एक स्वस्थ बच्चे से ज्यादा गोरे बच्चे की चिंता घेरे रखती है। ऐसे में बच्चों के लिए खिलौने भी सामाजिक रूढ़िवाद और पितृसत्ता के अधीन तय किया जाना कोई हैरानी की बात नहीं है।

आज ऑनलाइन मार्केट के जरिए हर प्रकार की बार्बी ग्राहकों के पहुंच में है। लेकिन भारत को शुरू से ही उसके गोरे रंग को बदलना और जीवन शैली पसंद नहीं आई। शायद यही कारण था कि कंपनी ब्लैक या मोटी बार्बी को भी भारत में नहीं ला सकी। भारतीय समाज में बार्बी को न अपनाने के पीछे कई कारणों में मूलतः हमारी सांस्कृतिक अवधारणा थी। मैटल की वेबसाईट में भी लंबे बालों वाली, साज-शृंगार से लदी, गोरी और सुंदर बार्बी का प्रचार किया जा रहा है। यह हमारे ही फूहड़पन और संकीर्णता का ही नतीजा है कि एक बहु-सांस्कृतिक देश होने और 74 सालों से अपनी पहचान होने के बाद भी हम लड़कियों की गुणों की परख उसके गोरे रंग और सुंदरता से करते हैं।  

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तस्वीर साभार : flickr

कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से हिंदी में बी ए और पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद बतौर पत्रकार और शिक्षिका मैंने लम्बे समय तक काम किया है। बिहार और बंगाल के विभिन्न क्षेत्र में पले-बढ़े होने के कारण सामाजिक रूढ़िवाद, धार्मिक कट्टरपन्त, अंधविश्वास, लैंगिक और शैक्षिक असमानता जैसे कई मुद्दों को बारीकी से जान पायी हूँ। समावेशी नारीवादी विचारधारा की समर्थक, लैंगिक एवं शैक्षिक समानता ऐसे मुद्दें हैं जिनके लिए मैं निरंतर प्रयासरत हूँ।

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