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‘बूढ़े होने पर माँ-बाप का साथ बेटा ही देता है।‘

‘बेटे के बिना माँ-बाप की ज़िंदगी दुखों में बीतती है।‘

बेटे की ज़रूरत या यों कहूँ कि उनकी अहमियत बताती हुई ऐसी बातें आपने भी कभी न कभी ज़रूर सुनी होगी। जब भी माँ-बाप का साथ देने या उनकी ज़िम्मेदारी लेने की बात आती है तो हमेशा ज़िक्र ‘बेटों’ का किया जाता है और बेटियों को हमेशा पराई घर की बोलकर पल्ला झाड़ दिया जाता है। माँ-बाप को लेकर बेटों के कर्तव्य का महिमामंडन करते हुई ‘श्रवण कुमार’ की कहानी आपने भी ज़रूर सुनी होगी। लेकिन आपने कभी किसी श्रवण कुमारी की कहानी नहीं सुनी होगी। पर ऐसा नहीं है कि जिस तरह बेटे से अपने माँ-बाप का साथ देने और उनकी सेवा करने की उम्मीद की जाती है, उन उम्मीदों पर खरी उतरती बेटियों की बेटियाँ कहीं भी पीछे नहीं है। आज के समय में कई ऐसी बेटियाँ है जो बेटों से कहीं ज़्यादा अपने माँ-बाप की सेवा कर रही हैं और उनका साथ दे रही है। आइए जानते है ऐसी ही दो बेटियों के बारे में –

दीपाली पटेरिया

तस्वीर साभार : स्वाती

उत्तर प्रदेश के ललितपुर में रहने वाली दीपाली अपने माता-पिता की पहली संतान है। दीपाली के माता-पिता दोनों ही शारीरिक रूप से विकलांग है। पुणे शहर में दीपाली और उनकी छोटी बहन ने अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की। माता-पिता दोनों ही नौकरी करते थे लेकिन उनकी ज़िंदगी आम लोगों की तरह आसान नहीं थी। शारीरिक विकलांगता के चलते दीपाली के पिता को कई बार उनके अपने परिवार में उपेक्षित होना पड़ता, जिससे दीपाली बेहद दुःखी होती। जैसे-जैसे दोनों बहने बड़ी होने लगी माता-पिता की उम्र ढलने के साथ-साथ शारीरिक समस्याएँ भी बढ़ने लगी और फिर शुरू हुआ आर्थिक तंगी का दौर। दीपाली बताती है कि मेरी शादी एक परिवार में तय कर दी गयी थी और लड़के वाले जल्दी शादी का दबाव बनाने लगे।

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उसी दौरान उनके माता-पिता की तबियत काफ़ी ज़्यादा ख़राब हो गयी। जब दीपाली के परिवार वालों ने शादी की तारीख़ आगे बढ़ाने की बात कही तो लड़के वाले बिल्कुल राज़ी नहीं हुए। नतीजतन एक दिन दीपाली ने ख़ुद उस शादी से इनकार कर अपने माता-पिता का साथ देने का फ़ैसला किया। उन्होंने अपनी पढ़ाई के साथ-साथ नौकरी करना शुरू किया। दिन-रात मेहनत करके कई महीनों तक बीमार दीपाली ने घर सँभाला, माता-पिता का इलाज जारी रखा और अपनी छोटी बहन की शादी की। इसके बाद उन्होंने अपनी शादी की। दीपाली के पिता का निधन हो चुका है, लेकिन आज भी दीपाली अपने माँ के साथ रहती है और जब भी माँ अपने घर इंदौर जाती है तो दीपाली उनकी सुविधा और सेवा में किसी भी तरह की कमी नहीं होने देती है। बेहद शांत स्वभाव की दीपाली आज भी उतनी सरल और शांत है, लेकिन वो अपने माता-पिता और परिवार के लिए उतनी ही मुखर, समर्पित और ज़िम्मेदार है जो दुर्भाग्यवश हमेशा से हमारे पितृसत्तात्मक समाज में पुरुषों के हिस्से लिखा जाता रहा है।

हुमा नफ़ीस

तस्वीर साभार : स्वाती

‘मैं खुश हूँ कि मैं अपने माता-पिता और परिवार का साथ दे रही हूँ।‘ – मुस्कुराते हुए हुमा कहती है। उत्तर प्रदेश के बदायूँ में एक स्वयंसेवी संस्था से जुड़ी हुमा बीते कई सालों से समाजसेवा के क्षेत्र से जुड़ी है। पर समाजसेवा के क्षेत्र से उनका जुड़ाव जीवन के उस दौर में हुआ जब उनका परिवार कई तकलीफ़ों और आर्थिक तंगी से जूझ रहा था। तीन बहनों में हुमा मँझली बहन है। हुमा के पिता पहले प्रिंटिंग प्रेस का काम किया करते और परिवार की ज़रूरतभर की कमाई हुआ करती। हुमा का परिवार एक सुखी परिवार था, लेकिन अचानक वक्त ने करवट ली और पिता जी को अपने काम में भारी नुक़सान हुआ। इसके बाद घर में एक के बाद एक मुसीबतों का दौर चल पड़ा। एक समय के बाद हुमा के माता-पिता की तबीयत बेहद ख़राब रहने लगी, उस दौरान हुमा की बड़ी बहन ने घर की बागडोर सँभाली। पर एकदिन अचानक उनकी बड़ी बहन की तबियत ख़राब हुई और उनका निधन हो गया। इससे हुमा और उनका परिवार टूट-सा गया। तब हुमा ने काम करना शुरू किया और घर की ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर ली। माता-पिता के इलाज का खर्च और अपनी छोटी बहन की शादी इन सभी ज़िम्मेदारियों को हुमा ने बखूबी निभाया। हुमा को इसबात का एहसास था कि अगर वो शादी करती हैं तो वो इस तरह घर की ज़िम्मेदारी नहीं उठा पाएँगीं, जैसा बिना शादी के कर पा रही हैं, इसलिए हुमा ने शादी न करने का फ़ैसला लिया। हाल ही में हुमा की माता का निधन हो गया, जो हुमा और उसके पिता के लिए बड़ा झटका लगा। पर हुमा इन तमाम मुश्किलों के बावजूद आज भी पूरी हिम्मत से अपने पिता के साथ खुश है और अपनी ज़िम्मेदारियों को अच्छी तरह निभा रही है। हंसमुख हुमा की मुस्कुराहट के पीछे उनके संघर्ष को भाँप पाना मुश्किल है, पर वास्तव में हुमा हर बच्चे के लिए एक मिसाल है और अपनी भूमिकाओं व ज़िंदगी के मायने से पितृसत्ता पर गहरी चोट करती है।

माँ-बाप का साथ देने या उनकी ज़िम्मेदारी लेने की बात आती है तो हमेशा ज़िक्र ‘बेटों’ का किया जाता है और बेटियों को हमेशा पराई घर की बोलकर पल्ला झाड़ दिया जाता है।

दीपाली और हुमा अकेली नहीं है। आज कई ऐसी बेटियाँ है जो आज की श्रवण कुमारी है और अपने माता-पिता की सेवा और उनके प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को उसी तरह निभा रही हैं जिसकी उम्मीद हमारा पितृसत्तात्मक  समाज सिर्फ़ बेटों से करता है। लेकिन इस पितृसत्तात्मक व्यवस्था में बेटी होकर बेटों के हिस्से बताए गये काम और जिम्मदारियों को अपने कंधें पर लेना सीधे पितृसत्ता पर वार करता है और कई बार ये वार इतना गहरा होता है कि बेटियों को मानसिक तौर पर तोड़ने लग जाता है। ये अलग बात है कि ये वार बेटियों के इरादों को नहीं तोड़ पाते है।

इस संदर्भ में प्रसिद्ध नारीवादी व सामाजिक कार्यकर्ती कमला भसीन का मानना है कि ‘अगर बेटे-बेटी दोनों की सामान परवरिश हो, दोनों को सामान सुविधाएं और अवसर दिए जाएँ, दोनों को उनकी पसंद और काबलियत के हिसाब से शिक्षा दी जाए तो दोनों फले-फूलेंगेl अगर बेटा माँ-बाप के काम धंधे को नहीं संभालना चाहता तो बेटी संभाल लेगीl अगर बेटा निकम्मा निकल जाता है या उसे कुछ हो जाता है तो बेटी है न बुढापे की लाठी या सहारा बनने कोl माँ बाप और परिवार के विकल्प भी दुगने हो जायेंगेl मैंने आजतक कोई ऐसे किसान नहीं देखा या देखी जो अपनी आधी ज़मीन को पर पूरा ध्यान दे और आधी पर न देl तो फिर माँ बाप ऐसा कैसे कर सकते हैंl यह तो अपने पाँव पर खुद कुल्हाड़ी मारने वाली बात हैl’ बदलते वक्त के साथ हमें अपनी सोच और क़िस्सों को बदलना होगा और आज की श्रवण कुमारियों की कहानियों को भी उजागर करना होगा क्योंकि बात से ही बात बनेगी।

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Swati lives in Varanasi and has completed her B.A. in Sociology and M.A in Mass Communication and Journalism from Banaras Hindu University. She has completed her Post-Graduate Diploma course in Human Rights from the Indian Institute of Human Rights, New Delhi. She has also written her first Hindi book named 'Control Z'. She likes reading books, writing and blogging.

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