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पीरियड्स के दौरान सैनेटरी पैड के लिए मां को बोलने से लेकर पापा और भाई तक से पैड के लिए बात करने तक का सफर आसान नहीं होता। शुरुआती दौर में माहवारी के खून को देखकर डर जाना हर किसी के लिए आम बात है। यह डर का माहौल हमें अपने घर और परिवार से ही मिला है। जब मैं छोटी थी तब मां का अचानक से रात को बाल धोकर नहाना समझ नहीं आता था। अचानक से मंदिर में न जाना, दिया जलाने के लिए मुझे कहना, कुछ समझ नहीं आता था। एकाएक खुद के लिए इस तरह का तरह बर्ताव होने देना, और खुद को एक छुआछूत की बीमारी से पीड़ित की तरह देखना कुछ समझ नहीं आता था। जब मैं पूछती तो यही जवाब मिलता कि किसी गंदी चीज को छू लिया गया है। तब कई सवाल मन में रहते, पर जवाब कोई नहीं देता। फिर कुछ दिन में मैं खुद ही भूल जाती पर हर महीने ये सवाल उठते ही थे, जिसका जवाब नहीं था किसी के पास।

आखिरकार, इसका जवाब मुझे मेरे पहले पीरियड्स के अनुभव से ही मिला। जब मुझे पहली बार पीरियड्स हुआ तब मुझे लग रहा था मुझे कोई बीमारी हो गई है। उस वक्त आठवीं की फाइनल परीक्षा भी चल रही थी उसका अलग दबाव था। डरते- डरते और रोते हुए मां को बताया कि कुछ खून जैसा पेशाब के दौरान आ रहा है, मां ने तब कुछ नहीं बोला बस कुछ एक पैड लगा दिए, तब भी मुझे कुछ समझ नहीं आया। तब मां से मैंने पूछा कोई बीमारी है क्या, ये हो क्या रहा है। तब जाकर उन्होंने कहा, “ऐसा हर लड़की को होता है एक उम्र में, तब मैंने पूछा कब तक चलेगा।” चूंकि मैं रो रही थी मां कहने लगीं, “रो मत, बेटी ठीक हो जाएगा एक दिन में।” एक दिन वाली बात सुनकर कुछ तसल्ली मिली। फिर दूसरे दिन जब यह प्रक्रिया खत्म न हुई तब मेरा पारा सातवें आसमान तक पहुंच चुका था। खुद को कमरे में बंद कर लिया, चूंकि खुद में इतनी हीन भावना आ गई थी, किसी से बात करने की इच्छा बिल्कुल भी नहीं होती थी और बस रोना जारी था।

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इस हीन की भावना का इलाज कभी घर, परिवारवाले या समाज नहीं करते। जब एक लड़की पढ़ती-लिखती है बाहर निकलती है, तब जाकर वह पीरियड्स के प्रति जागरूक हो पाती है। इस प्राकृतिक प्रक्रिया को स्वीकार कर पाती है। शरीर में होने वाले इस बदलाव को स्वीकार कर पाती है। यह प्रक्रिया भी बहुत लंबी होती है पर मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ। स्कूल तक तो पीरियड्स को लेकर पूरा टैबू रहा, न इसके बारे में किसी से बात करते न ही कुछ शेयर करते क्योंकि स्कूल में कभी इसकी शिक्षा दी ही नहीं जाती। पीरियड्स पर बात की ही नहीं जाती थी। मुझे लगता है कि स्कूल के स्तर पर ही लड़कियों में मेंस्ट्रुअल सायकल के प्रति शिक्षा, मेंस्ट्रुअल हाइजीन और मैनेजमेंट की शिक्षा देनी चाहिए। स्कूल में ही बच्चों को बताना चाहिए कि यह कोई गंदगी नहीं है यह एक प्रक्रिया है, जो प्राकृतिक है। इसमें निकलने वाला खून भी गंदा नहीं है क्योंकि जब भ्रूण बनता है इसी खून से ही बनता है। चूंकि घर से उम्मीद तो न के बराबर ही होती है, ऐसे में इस वक्त स्कूल ही ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा बच्चों में इसके प्रति जागरूकता और संवेदनशीलता फैलाई जानी चाहिए।

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पैड के लिए मम्मी को कहना, घर में भाई-पापा आदि लोगों से पैड जैसी चीज़ों को छिपाकर रखना। बड़ी मुश्किल से हिम्मत जुटाकर दुकान भी चले गए तो दुकान में लड़की से ही इसे खरीदना। गलती से दुकान में लड़की नहीं है तो वापस घर आ जाना, और पैड देते वक्त काले रंग की पॉलीथिन में या कागज में लपेटकर देना। यह सब तो टैबू ही है। जैसे हम कोई हथियार खरीद रहे हो।

हम आज भी देखते है स्कूल में यह सब मैनेज करना और भी मुश्किल होता है, चूंकि वहां पर्याप्त व्यवस्था नहीं होती। आज मैं जब आंकड़े देखती हूं माहवारी के दौरान  लड़कियां स्कूल क्यों छोड़ती हैं, इसका जवाब मुझे मिल जाता है उस बीते वक्त को याद करके। चूंकि परिवार की संस्था के बाद स्कूल ही ऐसी संस्था होती है जहां बच्चे अलग-अलग चीज़ें सीखते हैं और यहीं से वे सारी भी सीखते हैं जिससे आगे उनका विकास सुनिश्चित हो पाता है। यहां वह हर माहौल बच्चों को देने की कोशिश की जानी चाहिए, जिससे माहवारी के प्रति उनमें संवेदशीलता और जागरूकता फैल सके, समाज द्वारा बनाए गए टैबू खत्म किया जा सके और बच्चे इसके प्रति सहज हो सकें।

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भारतीय समाज घरों में पिता, भाई आदि से ही माहवारी के संबंध में बात करना ही एक बड़ा टैबू है तो बाहर किसी दोस्त, खासकर लड़कों से यह सब बातें करना तो बिल्कुल असंभवन ही नज़र आता है। इस टैबू को हम पैड के लिए मां को कहना, घर में भाई-पापा आदि लोगों से पैड जैसी चीज़ों को छिपाकर रखना। बड़ी मुश्किल से हिम्मत जुटाकर दुकान भी चले गए तो दुकान में लड़की से ही इसे खरीदना। गलती से दुकान में लड़की नहीं है तो वापस घर आ जाना, और पैड देते वक्त काले रंग की पॉलीथिन में या कागज में लपेटकर देना। यह सब तो टैबू ही है। जैसे हम कोई हथियार खरीद रहे हो। इन सब फेज से निकलकर इसे सहज रूप से स्वीकार करने की प्रक्रिया जिन्हें पीरियड्स होते हैं, उनके लिए आसान नहीं होती है, बहुत वक्त लग जाता है चूंकि यह पूरी प्रक्रिया एकतरफा होती है। यदि यह प्रक्रिया दोतरफा हो समाज परिवार और आसपास के लोगों द्वारा भी उतनी ही कोशिश यदि की जाए जितनी खुद के प्रयासों से एक ये करते हैं इसे सहज प्रक्रिया के रूप में स्वीकारने में, तो इस प्रक्रिया में उतना समय नहीं लगेगा जितना एक शख्स को अपनी आधी जिंदगी इसके प्रति ही खुद को सहज करने और फिर इसके प्रति जागरूकता फैलाने में लग जाता है।

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तस्वीर साभार : मुहीम

मैं शिवानी अग्रवाल रायपुर छत्तीसगढ़ की रहने वाली हूँ। मेरा "मास्टर ऑफ सोशल वर्क" महात्मा गांधी हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा से अभी हाल ही में पूरा हुआ है, वर्तमान में "मीडिया एवं वूमेन स्टडी" में पीजी डिप्लोमा चल रहा है, स्नातक बी.एस. सी (इलेक्ट्रॉनिक मीडिया) से रहा है, जेंडर से जुड़े हुए विषयों पर पढ़ना लिखना अच्छा लगता है, इन्ही माध्यमो से पितृसत्ता के प्रति जागरूकता व नारीवाद के प्रति लोगो मे समझ विकसित करने का प्रयास जारी है।

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