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पिछले दिनों इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक फैसले ने हमें बच्चों के यौन हिंसा पर एक बार फिर सोच-विचार करने के लिए मजबूर कर दिया। यह फैसला एक नाबालिग की यौन हिंसा के मामले में प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्राम सेक्सुअल अफेंसेस एक्ट (POSCO) के तहत सुनाया गया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि नाबालिग के साथ ओरल सेक्स ‘अग्ग्रावेटेड या गंभीर यौन उत्पीड़न’ या ‘यौन उत्पीड़न’ की श्रेणी में नहीं आता। उच्च न्यायालय के अनुसार ओरल सेक्स ‘पेनेट्रेटिव यौन उत्पीड़न’ की श्रेणी में आता है जो पॉक्सो अधिनियम के धारा 4 के तहत दंडनीय है। उच्च न्यायालय के न्यायाधीश अनिल कुमार ओझा की सिंगल जज बेंच ने इस फैसले के साथ आरोपी की सजा भी कम कर दी। भारत में व्यापक कानून और कई कोशिशों के बावजूद बच्चों के साथ यौन हिंसा और उनका बाल श्रमिक के रूप में शोषण रोका नहीं जा सका है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार, साल 2018 में भारत में हर दिन 109 बच्चों का यौन शोषण किया गया, जो साल 2017 की तुलना में 22 प्रतिशत अधिक था।

क्या है इलाहाबाद उच्च न्यायालय का तत्कालीन मामला ?

इलाहाबाद उच्च न्यायालय का यह मामला स्पेशल सेशन कोर्ट में दिए गए एक फैसले के खिलाफ आरोपी की अपील से जुड़ा है। इसमें आरोपी को 10 साल के बच्चे का यौन शोषण करने का दोषी पाया गया था। सेशन कोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 377 (अप्राकृतिक अपराध), धारा 506 (आपराधिक धमकी के लिए सजा) और पॉक्सो एक्ट के धारा 6 (अग्ग्रावेटेड या गंभीर यौन हिंसा) के तहत दोषी ठहराया था। आरोपी पर यह आरोप था कि वह सर्वाइवर लड़के के घर गया और उसे अपने साथ एक मंदिर ले गया। वहां उसने इस लड़के को बीस रुपए दिए और उसके साथ ओरल सेक्स किया।

सर्वाइवर लड़के के रिश्तेदार को इस अपराध का पता तब चला जब बच्चे के पास हिसाब के बाहर बीस रुपए मिले। बच्चे से रुपए के बारे में पूछे जाने पर बच्चे ने अपनी आपबीती बताई। लाइव लॉ में छपी खबर मुताबिक आरोपी ने पीड़ित को घटना के बारे में किसी को न बताने की धमकी भी दी थी। गौरतलब हो कि पॉक्सो अधिनियम के धारा 4 के तहत ‘पेनेट्रेटिव यौन उत्पीड़न’ धारा 6 के ‘एग्रावेटेड या गंभीर पेनेट्रेटिव यौन उत्पीड़न’ से कानूनी तौर पर कमतर अपराध माना जाता है। इसलिए पॉक्सो अधिनियम के तहत ‘गंभीर’ यौन हिंसा के अपराध के लिए अधिक गंभीर सजा तय की जाती है।

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क्या कहता है पॉस्को एक्ट ?

पॉस्को एक्ट के अनुसार ‘पेनेट्रेटिव सेक्शुअल असॉल्ट’ या ‘पेनेट्रेटिव यौन उत्पीड़न’ तब कहा जाएगा जब कोई व्यक्ति नाबालिग बच्चे के गुप्तांग या मुंह में अपना लिंग डालता है, उसे ऐसा करने पर मजबूर करता है या नाबालिग बच्चे को किसी और व्यक्ति के साथ यौन संबंध के लिए मजबूर करता है।

पॉस्को एक्ट की धारा 4 के तहत नाबालिग बच्चे के साथ ‘पेनेट्रेटिव यौन उत्पीड़न’ के लिए जेल की सजा और जुर्माना तय किया गया है।

पॉस्को एक्ट के तहत धारा 5 ‘गंभीर पेनेट्रेटिव यौन उत्पीड़न’ के लिए है। बारह साल से कम उम्र के बच्चे के साथ किया गया पेनेट्रेटिव यौन उत्पीड़न धारा 5 के खंड ‘एम’ के तहत आता है।

वहीं, पॉस्को एक्ट की धारा 6 के तहत ‘गंभीर पेनेट्रेटिव यौन उत्पीड़न’ के लिए सजा तय की गई है।

उच्च न्यायालय इस मामले पर सुनवाई करते हुए आरोपी को सेशन कोर्ट के दिए गए दस साल की जेल की सजा को कम कर अब सात साल कर दिया है। उच्च न्यायालय के अनुसार आरोपी ने नाबालिग बच्चे के साथ ओरल सेक्स किया था, जो कि पॉक्सो एक्ट के धारा 4 के तहत आता है। यह महत्वपूर्ण है कि हम इस बात पर ध्यान दें कि न्यायालय ने अपने आदेश में पॉक्सो अधिनियम के धारा 5 (एम) को ध्यान में नहीं रखा। यदि अपराध के वक़्त सर्वाइवर के उम्र को ध्यान में रखें, तो यह साफ है कि उसकी उम्र 12 वर्ष से कम थी।

भारतीय कानून के तहत यौन हिंसा के गंभीरता का मापदंड भले अलग-अलग तरीके से हो लेकिन सर्वाइवर पर इसके प्रभाव का विश्लेषण सिर्फ इस बुनियाद पर नहीं किया जा सकता कि उसका प्रकार क्या था, या कितनी देर तक और किस तरह किया गया था।

नाबालिगों के साथ यौन हिंसा के मामलों में न्यायालय का दक़ियानूसी रवैया

हालांकि यह कोई पहली बार नहीं था जब न्यायालय ने ऐसे चौंकाने वाले फैसले दिए हो। इससे पहले बॉम्बे उच्च न्यायालय की नागपुर बेंच की न्यायाधीश पुष्पा गनेडीवाला ने कई विवादास्पद निर्णय दिए थे। इनमें नाबालिग के साथ हुए यौन हिंसा की घटना के मामले में ‘स्किन-टू-स्किन कॉन्टैक्ट’ वाला फैसला शामिल था। गनेडीवाला ने अपने फैसले में कहा था कि बिना ‘स्किन-टू-स्किन कॉन्टैक्ट’ के नाबालिग के स्तन को दबोचना पॉस्को अधिनियम के तहत यौन उत्पीड़न कहा नहीं जा सकता। ‘यौन उत्पीड़न’ माने जाने के लिए यौन संबंध स्थापित करने के इरादे से ‘स्किन-टू-स्किन कॉन्टैक्ट’ होना चाहिए।

बता दें कि हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे उच्च न्यायालय के इस फैसले को रद्द कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार नाबालिगों के यौन उत्पीड़न के आरोपी व्यक्तियों को दंडित करने के लिए ‘स्किन-टू-स्किन कॉन्टैक्ट’ होना आवश्यक नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि पॉस्को अधिनियम को लागू करने का उद्देश्य बच्चों को यौन शोषण से बचाना है। यदि इस तरह की संकीर्ण व्याख्या को स्वीकार किया जाता है, तो यह इस अधिनियम के बेतुके व्याख्या को जन्म देगा। इस तरह यह ऐसी हानिकारक स्थिति को जन्म दे सकता है जो अधिनियम के उद्देश्य को विफल कर देगा। ऐसी स्थिति में बच्चे के शरीर के यौन या गैर-यौन अंगों को दस्ताने, कंडोम, चादर या कपड़े से छूना पॉस्को अधिनियम के धारा 7 के तहत यौन उत्पीड़न नहीं माना जा सकेगा।  

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यौन हिंसा का कोई भी प्रकार कम गंभीर नहीं है    

भारतीय कानून के तहत यौन हिंसा के गंभीरता का मापदंड भले अलग-अलग तरीके से हो लेकिन सर्वाइवर पर इसके प्रभाव का विश्लेषण सिर्फ इस बुनियाद पर नहीं किया जा सकता कि उसका प्रकार क्या था, या कितनी देर तक और किस तरह किया गया था। यौन हिंसा किसी के लिए भी एक बुरा और भयानक अनुभव होता है। बच्चों के लिए यह और भी भयावह हो सकता है क्योंकि अक्सर छोटी उम्र में इन बातों की समझ नहीं होती। हमारे पितृसत्तात्मक समाज में सेक्स एजुकेशन की कमी और छोटी उम्र के कारण यौन हिंसा का तुरंत प्रतिरोध करना आम तौर पर उनके लिए संभव नहीं। इसके अलावा, बच्चों के साथ होनेवाली यौन हिंसा की अधिकतर घटनाएं उनके करीबी या परिचित व्यक्ति करते हैं, जिन पर वे विश्वास करते हैं। ऐसे में इस तरह की घटनाओं को गंभीर न मानना उत्पीड़कों को बढ़ावा दे सकता है।

किसी व्यक्ति के जीवन में यौन संबंध का आधार ही सहमति होता है। यह सुखद तभी हो सकता है जब वह दो लोगों के सहमति से हुआ हो। असहमति से हुआ यौन संबंध या किसी ऐसे व्यक्ति के साथ यौन संबंध जो इसे समझने लायक या परिपक्व न हो, वह बलात्कार से कम गंभीर या भयानक नहीं हो सकता। एक-दूसरे को छूना, महसूस करना, ओरल सेक्स या बीडीएसएम जैसी प्रक्रियाएं लोग आपसी सहमति से यौन संबंध के दौरान करते हैं। ये सभी प्रक्रियाएं यौन संबंध के ही अलग-अलग अवयव हैं। इसलिए यदि किसी भी व्यक्ति के साथ उसके सहमति के बिना ऐसी कोई घटना होती है, तो उसे गंभीर यौन हिंसा ही कहा जाना चाहिए। छोटी से छोटी यौन उत्पीड़न की घटना भी आजीवन दुख और सदमा का कारण बन सकती है। अनचाहे यौन संबंध से शारीरिक और भावनात्मक दोनों ही तरह का आघात हो सकता है। हालांकि कुछ मामलों में इसका दुष्परिणाम तुरंत महसूस किया जा सकता है, लेकिन कई मामलों में इसका दुष्परिणाम शारीरिक या मनोवैज्ञानिक रूप में आजीवन महसूस होता है। इसलिए यौन हिंसा अपनेआप में ही एक गंभीर अपराध है। इसकी गंभीरता की जांच के लिए कोई और कारक की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।  

गौरतलब हो कि द वायर में छपी रिपोर्ट के अनुसार राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव से इलाहाबाद उच्च न्यायालय के इस फैसले के खिलाफ अपील दायर करने का आग्रह किया है। आयोग ने अपने पत्र में कहा है कि यह पॉक्सो अधिनियम के पत्र और भावना के अनुसार नहीं है। भारत में बच्चों के यौन हिंसा के मामले में इलाहाबाद न्यायालय के दिए गए फैसले शोषण करने वालों के लिए मददगार साबित हो सकता है। बजाय इसके कि हम बच्चों से प्रतिरोध और खुद के लिए खड़े होने की उम्मीद करें, या यौन हिंसा जैसे अपराध का लेखाजोखा करें, हमें उनके लिए एक सुरक्षित समाज बनाने का प्रयास करना चाहिए।    

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तस्वीर साभार : The Leaflet

कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से हिंदी में बी ए और पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद बतौर पत्रकार और शिक्षिका मैंने लम्बे समय तक काम किया है। बिहार और बंगाल के विभिन्न क्षेत्र में पले-बढ़े होने के कारण सामाजिक रूढ़िवाद, धार्मिक कट्टरपन्त, अंधविश्वास, लैंगिक और शैक्षिक असमानता जैसे कई मुद्दों को बारीकी से जान पायी हूँ। समावेशी नारीवादी विचारधारा की समर्थक, लैंगिक एवं शैक्षिक समानता ऐसे मुद्दें हैं जिनके लिए मैं निरंतर प्रयासरत हूँ।

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