राबिया बसरी
तस्वीर साभार: Wikipedia
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राबिया बसरी का जन्म 717 ईसवी में बसरा (ईराक) में हुआ था। उनका जन्म एक बेहद ही गरीब परिवार में हुआ था। वह अपने माता-पिता की चौथी बेटी थीं। जल्द ही राबिया के माता-पिता की मौत हो गई थी। इसके बाद ईराक में भीषण अकाल आया और बाद में इन्हें एक गुलाम के रूप में बेच दिया गया। इस तरह वह अपनी बहनों से भी अलग हो गई। दिन के वक़्त राबिया अपने मालिक के घर के काम करती थीं और रात में प्रार्थना। माना जाता है कि एक बार उनके मालिक ने रात में राबिया के आस-पास एक रोशनी देखी जिसकी अगली सुबह ही उसने राबिया को आज़ाद कर दिया। मशहूर सूफ़ी संत और कवि हज़रत फरिदुद्दीन के लेखन में राबिया बसरी की शुरुआती ज़िंदगी का ज़िक्र मिलता है।

एक स्वतंत्र, प्रभावशाली और बौद्धिक महिला के रूप में राबिया बसरी के जीवन ने दिखाया कि धन और स्थिति वित्तीय संसाधनों के माध्यम से नहीं, बल्कि आध्यात्मिक मूल्य में समृद्धि और अहंकार के नियंत्रण के ज़रिये हासिल की जाती है। इसलिए भगवान की नज़र में ऊंचा दर्जा पाने के लिए किसी भी इंसान को अमीर होने की जरूरत नहीं है। राबिया ने एक ऐसा जीवन व्यतीत किया जिसमें उसने खुद को दूसरी सभी इच्छाओं से पूरी तरह से अलग कर लिया था।

राबिया एक मजबूत इरादों वाली औरत थीं, जिन्होंने अपने समय के दूसरे सूफ़ी संतों की आलोचना की और उन्हें आगे बढ़ने में मदद की। उन्होंने भविष्य की महिला संतों के लिए एक रास्ता बनाया।

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राबिया बसरी शादी ही नहीं करना चाहती थीं। वह सबसे ज्यादा अपने खुदा से स्नेह करती थीं। वह हर वक़्त प्रार्थना में लीन रहती थीं। उनके पास शादी के लिए कई रिश्ते आए लेकिन उन्होंने हर रिश्ते को ठुकरा दिया। उनका मानना था कि उनके पास अपने ख़ुदा के अलावा किसी भी दूसरे काम के लिए कोई वक़्त है ही नहीं। राबिया अपने परमेश्वर से इतना प्यार करती थीं कि वह कहती थीं कि उनके पास शैतान से नफ़रत करने का समय नहीं है। उनका दिल परमेश्वर के प्रेम से भर गया है और उसमें घृणा के लिए कोई जगह नहीं है।

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उन्होंने औरतों और मर्दों दोनों को अपना क्रांतिकारी प्रेम-रहस्यवाद सिखाया जिसने एक समृद्ध विरासत की नींव रखी। वह एक मजबूत इरादों वाली औरत थीं, जिन्होंने अपने समय के दूसरे सूफ़ी संतों की आलोचना की और उन्हें आगे बढ़ने में मदद की। उन्होंने भविष्य की महिला संतों के लिए एक रास्ता बनाया। राबिया बसरी को इराक की पहली महिला सूफ़ी संत माना जाता है।

राबिया बसरी शादी ही नहीं करना चाहती थीं। वह सबसे ज्यादा अपने खुदा से स्नेह करती थीं। वह हर वक़्त प्रार्थना में लीन रहती थीं। उनके पास शादी के लिए कई रिश्ते आए लेकिन उन्होंने हर रिश्ते को ठुकरा दिया। उनका मानना था कि उनके पास अपने ख़ुदा के अलावा किसी भी दूसरे काम के लिए कोई वक़्त है ही नहीं।

उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी गरीबी में ही गुज़ारी। 80 साल की उम्र में जब उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा तो उनकी संपत्ति में एक ईख की चटाई, एक मिट्टी का जग और एक बिस्तर शामिल था जिसका इस्तेमाल वह अपनी इबादत के लिए भी किया करती थीं। उनका मानना था कि जिसका यह संसार है, उस से इस संसार की चीज़ें मांगने में मुझे शर्म आनी चाहिए। जीवन में तमाम कठिनाइयों के बीच इन्होंने अपनी इबादत और हौसले को बनाए रखा।

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