समाजख़बर सूखे की वजह से महिलाओं के स्वास्थ्य पर अधिक असरः रिपोर्ट

सूखे की वजह से महिलाओं के स्वास्थ्य पर अधिक असरः रिपोर्ट

बड़े सूखे के संपर्क में आने के कारण महिलाओं में कम वजन होने की संभावना 35 फीसदी और लड़कियों में बाल विवाह की संभावना 37 फीसदी बढ़ जाती है। कम उम्र में माँ बनना और अंतरंग साथी हिंसा का भी महिलाओं और असमान रूप से सामना करना पड़ता है।

उत्तर प्रदेश के जिले ललितपुर की ग्राम पंचायत देवगढ़ की रहने वाली 11 वर्षीय संतोषी देश के उस इलाके में रहती है जहां पानी की समस्या इतने विकराल रूप में मौजूद है कि पानी की कमी, पानी सिर पर लादकर लाना, डब्बों में पानी इकट्ठा करके रखने और पानी के लिए नल पर लाइन पर लगना उनके जीवन का आम हिस्सा है। स्कूल और खेलकूद की उम्र में संतोषी जैसी अन्य छोटी-छोटी बच्चियां सिर पर पानी की घगरी लादे दिख जाती हैं। वह कहती है, “जब घर में पानी नहीं होता है तो कभी-कभी मुझे स्कूल से छुट्टी भी लेनी पड़ती है। घर में भाई-बहनों में सबसे बड़ी होने के कारण वह ही घर में पानी का इंतजाम करने का काम करती है।”

जलवायु परिवर्तन की वजह से प्राकृतिक आपदाओं में तेजी होती जा रही हैं और यह महिलाओं और लड़कियों को असमान रूप से प्रभावित कर रही है। सूखे जैसी घटनाएं यानी पानी की कमी उनके जीवन को कई स्तर पर प्रभावित करती है। आमतौर पर पानी के प्रबंधन से लेकर उसके अकाल तक की हर स्थिति का महिलाओं और लड़कियों पर ज्यादा असर पड़ता है। हाल ही में जारी रिपोर्ट के अनुसार जब गरीब और ग्रामीण इलाकों में सूखा पड़ता है तो सबसे पहले लड़कियां और महिलाएं प्रभावित होती है। डाउन टू अर्थ में प्रकाशित ख़बर के अनुसार केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अनुसार हाल ही में जारी एक नए अध्ययन के अनुसार सूखे के संपर्क में आने के कारण महिलाओं और लड़कियों के स्वास्थ्य और आजीविका पर प्रभाव पड़ता है।

पानी की समस्या पर बोलते हुए वह कहती है, “हम जब से ब्याहकर इस गाँव में आए है तब से सिर पर लादकर पानी ला रहे हैं। घर में रसोई, साफ-सफाई, खाने-नहाने के पानी की व्यवस्था हम औरतों को ही करनी पड़ती हैं। इस गाँव की सारी औरतों का यही जीवन है।

रिपोर्ट के अनुसार बड़े सूखे के संपर्क में आने के कारण महिलाओं में कम वजन होने की संभावना 35 फीसदी और लड़कियों में बाल विवाह की संभावना 37 फीसदी बढ़ जाती है। कम उम्र में माँ बनना और अंतरंग साथी हिंसा का भी महिलाओं को असमान रूप से सामना करना पड़ता है। बहुत गंभीर सूखे के बाद यह संभावना 17 फीसदी और 50 फीसदी बढ़ जाती है। यह अध्ययन एमएस स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन के नेतृत्व में एक गैर-सरकारी संस्थान कर्मन्या काउंसिल और एसोसिएटिड चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया के सहयोग से हुआ है। इसमें काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवॉयरमेंट और वॉटर के 2021 के क्लाइमेट वनरबेलिटी और नैशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 2019 -21 के डेटा का मूल्याकंन किया गया है।

सीईईडब्ल्यू के अनुसार भारत के 640 जिलों में से 349 में सूखा पड़ा और 183 जिले एक से अधिक बार सूखे की चपेट में आए। यह 50 साल के जलवायु आंकड़ों पर निर्भर है। एनएफएचएस-5 के अनुसार 54 फीसदी महिलाएं और उनके पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चे 2021 में जल मौसम खतरों ( हाईड्रो-मेट हैजार्ड) के उच्चीय जोखिम वाले जिलों से हैं। सूखे की वजह से ही खेती-किसानी से जुड़ी महिलाओं और लड़कियों को और अधिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। तापमान में वृद्धि महिला किसानों की आजीविका और उत्पादकता दोनों को प्रभावित करती है। सूखे के कारण महिलाओं के ऊपर काम का भार अधिक बढ़ता है लेकिन साथ ही उनमें भोजन की अनियमित खपत और अस्वास्थ्यकर मुकाबला जैसे भोजन छोड़ना, महिला किसानों में गंभीर कुपोषण का कारण बनता है जिससे उनके वजन में कमी देखी जाती है।

तस्वीर साभारः पूजा राठी।

देवगढ़ गाँव की रहने वाली सरिता रोज सुबह और शाम और दिन में ज़रूरत के हिसाब से घर से दूर एक नल से सिर पर पानी लाती है। घर से नल तक सिर पर पानी ढ़ोने के लिए वह कई चक्कर लगाती है। पानी की समस्या पर बोलते हुए वह कहती है, “हम जब से ब्याहकर इस गाँव में आए हैं तब से सिर पर लादकर पानी ला रहे है। घर में रसोई, साफ-सफाई, खाने-नहाने के पानी की व्यवस्था औरतों को ही करनी पड़ती हैं। इस गाँव की सारी औरतों का यही जीवन है। सर्दी में तो कम पानी की खपत होती है लेकिन गर्मी में तो पानी की प्यास भी बहुत लगती है। हर काम में पानी की ज़रूरत पड़ती है। प्रधान ने अपने घर के बाहर तो नल लगा लिया है लेकिन हमारे बारे एक बार नहीं सोचा है। हमें इतनी दूर से पानी सिर पर लादकर ढोना पड़ना है।”

वह आगे बताती है, “सिर पर पानी लादकर आने से सिर में दर्द होता है। बार-बार पानी ढ़ोने से बचने के लिए एक बार में ही ज्यादा पानी लाने की कोशिश के चक्कर में कमर दर्द की भी परेशानी रहने लगी है। पानी की समस्या यहां इतनी आम हो गई है कि लोग इस बारे में बात ही नहीं करते है। पानी का कम होना हमारे जीवन का हिस्सा बन गया है। पानी का न होना किसी को कुछ नहीं दिखता है। हम औरतें घर में पानी की व्यवस्था कर देती हैं तो मर्द उस तरह से सोचते भी नहीं है कि एक दिन में कितने पानी की ज़रूरत पड़ती है।”

जलवायु परिवर्तन की वजह से सूखा ही नहीं अन्य समस्याएं भी बढ़ती जा रही है है। सूखे से महिलाओं के स्वास्थ्य पर तो असर पड़ रहा ही है तापमान बढ़ने की वजह से भी वे अनेक समस्याओं का सामना करती है। गर्मी में हीटवेव्स की वजह से मृत्यु दर में वृद्धि होती है। इसमें गर्भवती महिलाओं की संख्या भी है। समय से पहले प्रसव, हाई ब्लडप्रेशर और एक्लम्पसिया जैसी जटिलताएं गर्भवती महिलाओं की मृत्यु का कारण बनती है। रिपोर्ट में शोधकर्ताओं और डॉक्टरों ने मनुष्य के स्वास्थ्य पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने की दिशा में काम करने की लिए नीति-निर्माताओं के सहयोग का समर्थन करने का आग्रह किया है। 

भारत के 640 जिलों में से 349 में सूखा पड़ा और 183 जिले एक से अधिक बार सूखे की चपेट में आए। यह 50 साल के जलवायु आंकड़ों पर निर्भर है। एनएफएचएस-5 के अनुसार 54 फीसदी महिलाएं और उनके पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चे 2021 में जल मौसम खतरों ( हाईड्रो-मेट हैजार्ड) के उच्चीय जोखिम वाले जिलों से हैं।

महिलाओं और लड़कियों को भुगतना पड़ता है ज्यादा ख़ामियाजा

हाल ही में जारी संयुक्त राष्ट्र की वॉटर डेवलपमेंट रिपोर्ट के अनुसार साफ पीने के जल की व्यवस्था से महिलाओं और लड़कियों के जीवन स्तर को सुधारा जा सकता है। दुनिया भर में गरीब और ग्रामीण इलाकों में पानी की व्यवस्था की प्राथमिक जिम्मेदारी महिलाओं और लड़कियां निभाती है। सुरक्षित स्वच्छता की कमी होने के कारण पढ़ाई छोड़ना एक प्रमुख कारण है। इस वजह से उनमें असुरक्षा की भावना बढ़ जाती है। इस रिपोर्ट में इस बात का ज़िक्र भी किया गया है कि गाजा में इजरायल और हमास के बीच संघर्ष में पानी तक पहुंच एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। गार्जियन में छपी जानकारी के अनुसार कुछ पर्यवेक्षकों ने इज़रायल पर ताजे पानी तक पहुंच को हथियार देने का आरोप तक लगया गया है, क्योंकि गाजा अपने अधिकांश जल आपूर्ति के लिए इजराइल पर निर्भर है। गाजा में सैंकड़ों-हजारों बच्चे गंभीर भूख और अकाल का सामना कर रहे हैं। साफ पानी की कमी से उनमें प्यास बढ़ रही है। 

पानी की कमी और तनाव

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में पाया गया है कि पानी की कमी और पानी पर तनाव के असर से खाद्य असुरक्षा, अन्य स्वास्थ्य खतरे और महिलाओं और लड़कियों के लिए विशेष खतरे शामिल है। पानी की कमी से दुनिया भर में तनाव बढ़ रहा है। आज दुनिया में लगभग आधी आबादी के पास स्वच्छता तक की पहुंच नहीं है। लगभग 2.2 बिलियन लोग पीने के पानी की सुरक्षित आपूर्ति पर भरोसा नहीं कर सकते हैं। 2030 तक संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों में से एक के रूप में लक्षित होने के बावजूद पिछले दो दशकों में दुनिया भर में इन ज़रूरतों में और वृद्धि हुई है। साल 2002 से 2021 के बीच सूखे से 1.4 बिलियन से अधिक लोग प्रभावित हुए हैं। पानी का संकट महिलाओं, लड़कियों और देशों के अन्य नागरिकों को प्रभावित कर रहा है। देशों में तनाव बढ़ रहा है और लोगों के आम जीवन में कई आयामों जैसे स्वास्थ्य, जीविका आदि में मुश्किले बढ़ रही है।


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