समाजराजनीति चुनावी प्रक्रिया में क्या है ‘नोटा’ का महत्व, चुनाव आयोग को नोटा पर सुप्रीम कोर्ट का नोटिस

चुनावी प्रक्रिया में क्या है ‘नोटा’ का महत्व, चुनाव आयोग को नोटा पर सुप्रीम कोर्ट का नोटिस

वोटर्स के पास उपरोक्त में कोई नहीं या नोटा का इस्तेमाल कर चुनाव में खड़े सभी उम्मीदवारों को खारिज करने का विकल्प है। साल 2013 में अधिकांश चुनावों में भारत के वोटर्स के लिए एक विकल्प के तौर पर प्रदान किया गया है।

भारत में 18वीं लोकसभा के चुनाव जारी है। शुरुआती दो चरण की वोटिंग भी हो चुकी है। हर राजनैतिक पार्टी सत्ता की कुर्सी तक पहुंचने के लिए अपने उम्मीदवारों को मैदान में उतार रही है और आम नागरिकों की वोट अपने पाले में लाने के लिए तमाम वादे कर रही है। सूरत की लोकसभा सीट पर एक भी वोट पड़ने से पहले ही चुनाव का नतीजा घोषित कर दिया गया है। लाखों वोटर्स को ईवीएम के बटन दबाने और लोकतंत्र में खुद की पसंद और राय जाहिर करने का मौका नहीं मिला हैं। कांग्रेस के उम्मीदवार के नामांकन पत्र खारिज होने और अन्य लोगों के नामांकन वापस लेने के बाद भाजपा उम्मीदवार को विजेता घोषित किया गया है। 

इस बात के सामने आने के बाद इस पर बहस छिड़ गई है कि लोकसभा सीट कोई उम्मीदवार निर्विरोध कैसे जीत सकता है। क्या ‘नोटा’ नहीं था। इस मालमे में नोटा पर चुनाव आयोग को सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस दिया है। अदालत ने उस याचिका पर चुनाव आयोग से जवाब मांगा है कि नोटा के पक्ष में अधिक वोट पड़ने पर किसी विशेष निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव परिणामों को रद्द करने और नए सिरे से चुनाव कराने के निर्देश देने पर सवाल पूछा है। अदालत में इस मामले में जनहित याचिका दायर की गई है। इसके बाद नोटा के विकल्प पर कई दिशा में बहस सामने आ रही है। 

दुनिया में नोटा विकल्प का इस्तेमाल करने वाला 14वां देश बना था। भारत के पिछले दो आम चुनावों में नोटा के वोट प्रतिशत की बात करे तो साल 2014 में 1.08 फीसदी वोट नोटा पर पड़े थे वहीं 2019 में लोकसभा चुनावों में 1.06 प्रतिशत वोटर्स ने नोटा का बटन दबाया था।  

लोकतंत्र में प्रत्येक नागिरक के पास वोट डालने का अधिकार है। वह अपनी पसंद के उम्मीदवार को चुनते हुए लोकतांत्रिक प्रक्रिया की व्यवस्था को लागू करने का काम करता है। लोकतंत्र में चुनावों में वोट के अधिकार और ताकत के द्वारा ही आम नागरिक अपनी पसंद की सरकार का चुनाव करते हैं। लेकिन जब वोट के लिए लोगों को राजनैतिक पार्टियों द्वारा तय किए गए उम्मीदवार पसंद ना हो। जिस तरह से देश के प्रत्येक 18 साल से ऊपर के नागरिक को वोट डालने का अधिकार है उसी तरह से अगर राजनैतिक पार्टियों द्वारा तय किये गए उम्मीदवारों में से कोई पसंद नहीं है तो ‘नोटा’ का विकल्प भी लोगों के पास है। नोटा, जिसे आमतौर पर ‘उपरोक्त में से कोई नहीं’ के लिए जाना जाता है। नोटा, वोट डालते समय निर्वाचन क्षेत्र में किसी भी चुनावी उम्मीदवार को वोट न देने का विकल्प देता है। 

नोटा क्या है?

तस्वीर साभारः The Hindu

वोटर्स के पास उपरोक्त में कोई नहीं या नोटा का इस्तेमाल कर चुनाव में खड़े सभी उम्मीदवारों को खारिज करने का विकल्प है। साल 2013 में अधिकांश चुनावों में भारत के वोटर्स के लिए यह एक विकल्प के तौर पर प्रदान किया गया था। 2013 के पीयूसीएल बनाम भारत संघ के फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट ने भारत के आम चुनावों और विधानसभा के चुनाव में नोटा को शामिल करने का निर्देश दिया था। उसी वर्ष चार राज्यों छत्तीसगढ़, मिजोरम, राजस्थान और मध्य प्रदेश और केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली में हुए विधानसभा चुनावों में सबसे पहले ईवीएम मशीन में नोटा के विकल्प को दर्शाया गया। नोटा के विकल्प के बाद से ही बड़ी संख्या में वोटर्स नोटा को अपनी वोट देने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। कुछ विधानसभा चुनावों में नोटा को कुछ उम्मीदवारों की तुलना में अधिक वोट मिले हैं और पंचायत के चुनावों में भी नोटा को जीतने वाले प्रत्याशी से अधिक वोट मिले हैं। 

नोटा की शुरुआत क्यों हुई थी?

चुनावी प्रक्रिया में नोटा को शामिल करने का फैसला इस आधार पर लिया गया कि जो वोटर्स असंतोष है वे भी अपनी भागीदारी भी चुनाव में दर्ज करा सकते हैं। नोटा का विकल्प उन्हें चुनावी की प्रणाली में भाग लेने के लिए प्रेरित करेगा और स्वतंत्र तौर पर अपनी राय जाहिर करने का मौका देगा। यह उन लोगों के लिए एक विकल्प दिया गया है जो किसी भी उम्मीदवार की उम्मीदवारी से संतुष्ट नहीं है और मतदान केंद्रों से दूर है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने नोटा के विकल्प के बारे में कहा था कि नोटा विकल्प को एकीकृत करना वास्तव में राजनीतिक दलों को एक अच्छे उम्मीदवार को नामांकित करने के लिए मजबूर करेगा। 

नोटा से पहले भी ऐसा प्रावधान था। इस विकल्प के आने से पहले नकारात्मक वोट डालने वाले लोगों को एक रजिस्टर में अपना नाम दर्ज करना होता था और एक अलग बैलेट पेपर पर अपना वोट डालना होता था। कंडक्ट ऑफ इलेक्शन रूल्स, 1961 की धारा 49 (ओ) के तहत वोटर फॉर्म 17ए में अपना चुनावी क्रमांक दर्ज कर सकता है और नकारात्मक वोट डाल सकता है। इसके बाद पीठासीन अधिकारी फॉर्म में एक टिप्पणी डालेगा और उस पर वोटर के उसके साइन करवाएगा। ऐसा वोटिंग में धोखाधड़ी या वोटों के गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए किया गया था। हालांकि सुप्रीम कोर्ट के द्वारा इसे असंवैधानिक करार दिया गया था क्योंकि यह वोटर की पहचान को जाहिर करता था। 

तस्वीर साभारः The Statesman

ईवीएम पर नोटा का विकल्प का चुनावी मूल्य नहीं है क्योंकि डाले गए वोटों की अधिकतम संख्या नोटा के लिए हो, शेष वोटों में से सबसे ज्यादा पाने वाला उम्मीदवार को ही विजेता घोषित किया जाएगा। वर्तमान नियमों के अनुसार अगर किसी निर्वाचन क्षेत्र में नोटा को सबसे अधिक वोट मिलते हैं, तो दूसरे सबसे अधिक वोट पाने वाले उम्मीदवार को विजेता घोषित किया जाएगा। सूरत की घटना के बाद यह बात निकलकर आती है कि नोटा का पहला चरण लागू हो चुका है और इससे अलग परिदृश्य में भी वोटर्स के हितों को देखने और लोकतंत्र में प्रत्येक व्यक्ति के प्रतिनिधित्व के नज़रिये से चीजें देखने की ज़रूरत है।  

2013 के पीयूसीएल बनाम भारत संघ के फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट ने भारत के आम चुनावों और विधानसभा के चुनाव में नोटा को शामिल करने का निर्देश दिया था। उसी वर्ष चार राज्यों छत्तीसगढ़, मिजोरम, राजस्थान और मध्य प्रदेश और दिल्ली में हुए विधानसभा चुनावों में सबसे पहले ईवीएम मशीन में नोटा के विकल्प को भी दर्शाया गया था।     

भारत के अलावा दुनिया के अन्य देशों में भी नोटा का विकल्प इस्तेमाल कर वोटर्स अपनी राय रख सकते हैं। इंडोनेशिया में बिना किसी प्रतिदंद्धी वाले उम्मीदवार को अनिवार्य रूप में नोटा के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ना होता है। साल 2018 में मकासर शहर में मेयर के चुनाव में नोटा को अकेले उम्मीदवार से अधिक वोट मिले। चुनाव को 2020 के लिए दोबारा से कराना तय किया गया। वहीं भारत में नोटा के माध्यम से उम्मीदवारों को अस्वीकार करने का अधिकार नहीं देता है। दुनिया में नोटा विकल्प का इस्तेमाल करने वाला 14वां देश बना था। भारत के पिछले दो आम चुनावों में नोटा के वोट प्रतिशत की बात करे तो साल 2014 में 1.08 फीसदी वोट नोटा पर पड़े थे वहीं 2019 में लोकसभा चुनावों में 1.06 प्रतिशत वोटर्स ने नोटा का बटन दबाया था। 2019 में बिहार में सबसे ज्यादा नोटा का वोट शेयर 2 फीसदी था। उसके बाद आंध्र प्रदेश में 1.54 फीसदी और छत्तीसगढ़ में 1.44 फीसदी था। लोकसभा चुनाव 2019 में कुल 6.52 लाख वोटर्स ने नोटा का बटन दबाया था। 

लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए राइट टू रिजेक्ट, नोटा जैसे विकल्प वोटर्स के लिए आवश्यक है। सूरत के मामले के बाद सुप्रीम कोर्ट में मामला पहुंचने के बाद इस दिशा में चर्चा हो रही है। नोटा उस दिशा में अभी आधा कदम है इसलिए इसके कई अलग-अलग पहलू को देखते हुए आगे और बदलाव करने ज़रूरी है। संसद और राजनीति में जनता के अधिकार और उनकी बातों को लागू करने के लिए चुनाव सुधारों को गंभीरता से लेना होगा। नोटा के द्वारा आम मतदात चुनाव में खड़े उम्मीदवारों को अस्वीकार कर अपना निजी विरोध जाहिर करता है जो लोकतंत्र के लिए बहुत आवश्यक है और इस दिशा में अन्य सुधार होने भी ज़रूरी है।


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