इतिहास यामिनी कृष्णामूर्तिः शास्त्रीय नृत्य को नये आयाम पर पहुंचाने वाली कलाकार| #IndianWomenInHistory

यामिनी कृष्णामूर्तिः शास्त्रीय नृत्य को नये आयाम पर पहुंचाने वाली कलाकार| #IndianWomenInHistory

भरतनाट्य, कुचिपुड़ी और ओडिसी में महारत हासिल करने वाली यामिनी ने भारतीय शास्त्रीय नृत्य को एक नये आयाम पर पहुंचाया। वह दशकों तक भारतीय शास्त्रीय नृत्य का प्रतीक और पहचान रहीं। अपनी नृत्य शैलियों को उन्होंने भारत और दुनिया के हर कोने तक पहुंचाया।

यामिनी कृष्णमूर्ति वो नाम हैं जिन्होंने 1950 के दशक के अंत से 1990 के दशक की शुरुआत तक भारत के शास्त्रीय नृत्य परिदृश्य को बदल दिया। वह भरतनाट्यम और अन्य भारतीय शास्त्रीय नृत्य शैलियों की प्रसिद्ध नृत्यांगना थीं। उन्होंने अपनी कला से सभी को मंत्रमुग्ध किया और भारतीय शास्त्रीय नृत्य में अपनी एक अलग जगह बनाई। भरतनाट्य, कुचिपुड़ी और ओडिसी में महारत हासिल करने वाली यामिनी ने भारतीय शास्त्रीय नृत्य को एक नये आयाम पर पहुंचाया। वह दशकों तक भारतीय शास्त्रीय नृत्य का प्रतीक और पहचान रहीं। अपनी नृत्य शैलियों को उन्होंने भारत और दुनिया के हर कोने तक पहुंचाया। उनकी इतनी लोकप्रियता थी कि लोग उनकी प्रस्तुतियों को देखने के लिए बारिश में भी इंतजार किया करते थे।

जन्म और प्रारंभिक जीवन

यामिनी कृष्णमूर्ति का जन्म 20 दिसंबर, 1940, मदनापल्ले, आंध्र प्रदेश में हुआ था। यामिनी के पिता का एम. कृष्णमूर्ति था। वह संस्कृत के विद्वान थे। उनके दादा उर्दू शायरी के विशेषज्ञ थे। इनका नाम इनके दादा जी ने ही रखा था। महज पांच साल की उम्र से उन्होंने नृत्य करना शुरू कर दिया था। उन्होंने चेन्नई के कलाक्षेत्र स्कूल ऑफ डांस में भरतनाट्यम की छात्रा के रूप में दाखिला दिलाया गया। इस स्कूल में उन्होंने रूख्मिणी देवी अरुंडेल के मार्गदर्शन में नृत्य का प्रशिक्षण प्राप्त किया। वहीं उन्होंने नृत्य की अपनी प्रांरभिक शिक्षा प्राप्त की थी। यह उस समय भारत का प्रमुख नृत्य संस्थान था। नृत्य में उनकी रुचि तमिलनाडु के चिदंबरम के 2000 साल पुराने तिल्लई नटराज मंदिर में पत्थर की मूर्तियों से आई, जहां उनका परिवार बाद में रहने लगा। 

कृष्णमूर्ति ने अपनी क्षमताओं को कुचीपुड़ी और ओडिसी नृत्य शैलियों में भी विस्तारित किया। 1960 के दशक में, जब वह दिल्ली में आकर रहने लगी तो तो उन्होंने इन नृत्य शैलियों को उत्तर भारत में लोकप्रिय बनाया।

कृष्णामूर्ति ने नृत्य में पांरगत होने के लिए कई स्तर पर और अलग-अलग विधाओं के निपुण कलाकारों से नृत्य सीखा। अपनी कला को और निखारने के लिए उन्होंने कांंचीपुरम एलप्पा पिल्लई और तंजावुर किटप्पा पिल्लई जैसे प्रसिद्ध गुरुओं से सीखा। बाद में उन्होंने वेदांतम लक्ष्मी नारयारण शास्त्री से कुचिपुड़ी सीखना शुरू किया जो एक तेज़ और सहज नृत्य शैली है। उन्होंने पंकज चरण दास और केलुचरण महापात्र से ओडिसी भी सीखा। शास्त्रीय नृत्य के अलावा, उन्होंने कर्नाटक संगीत और वीणा में भी प्रशिक्षण लिया। यामिनी ने कुचिपुड़ी को एकल नृत्य रूप के रूप में लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

 पहली ही परफॉर्म से सबका ध्यान खींचा

तस्वीर साभारः Timeline Daily

साल 1957 में कृष्णमूर्ति ने 1957 में मद्रास में एक भरतनाट्यम प्रदर्शन के साथ अपने नृत्य करियर की शुरुआत की। इस दौरान उनके गुरु में कांचीपुरम एलप्पा पिल्लई, किट्टप्पा पिल्लई, धनदायुत्तपानी पिल्लई और मैलापुर गोरी अम्माल शामिल थे। अपनी कला निपुणता और नृत्य में लय की वजह से वह जल्द ही देश की सबसे प्रसिद्ध नृत्यांगनाओं में से एक बन गईं। 1960 तक वह देश की सबसे प्रशंसित नृत्यांगनाओं में से एक बन गईं। यामिनी के प्रदर्शनों ने भरतनाट्यम और कुचिपुड़ी को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। उन्होंने कुचिपुड़ी को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जो उस समय आंध्र प्रदेश में एकल नृत्य रूप के रूप में उभर रहा था।

कृष्णमूर्ति ने अपनी क्षमताओं को कुचीपुड़ी और ओडिसी नृत्य शैलियों में भी विस्तारित किया। 1960 के दशक में, जब वह दिल्ली में आकर रहने लगी तो तो उन्होंने इन नृत्य शैलियों को उत्तर भारत में लोकप्रिय बनाया। दिल्ली में जब अशोका होटल का उद्घाटन हुआ था तो उस समय के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसे एक मजबूत सांस्कृतिक विंग देने की इच्छा व्यक्त की। कृष्णमूर्ति, उसी दौरान केंद्रीय मंत्री के निमंत्रण पर दिल्ली आईं। अपनी तेज, तय, ऊर्जा और जटिल पांवों की तकनीक से उन्होंने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा। उनकी प्रस्तुति चर्चा का केंद्र बनीं। वह पंडित रविशंकर, उस्ताद अल्ला रक्खा और उस्ताद बिस्मिल्लाह खान जैसे कलाकारों में से थीं जिन्होंने वैश्विक स्तर पर यात्रा की और भारतीय संस्कृति को हर जगह पहुंचाने का काम किया। दिल्ली में एक प्रदर्शन के बाद, कनाडाई प्रधानमंत्री पियरे ट्रुडो ने उनके पास जाकर कहा, “नृत्य करते रहो। मत रुकना। बस नृत्य करते रहो।” उनके प्रदर्शन ने न केवल देश में, बल्कि अमेरिका, यूके, पूर्व सोवियत संघ, थाईलैंड, ईरान और पाकिस्तान जैसे अन्य देशों में भी उन्हें पहचान दिलाई।

पुरस्कार और सम्मान

तस्वीर साभारः Alchetron

नृत्य की विरासत को देश में आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने नृत्य प्रशिक्षिण भी दिया। साल 1990 में उन्होंने दिल्ली में यामिनी स्कूल ऑफ डांस की स्थापना की। 1995 में “ए पैशन फॉर डांस” नाम से इनकी आत्मकथा प्रकाशित हुई। भारतीय नृ्त्य के क्षेत्र में अपने महत्वपूर्ण योगदान और दुनिया भर में शोहरत हासिल करने वाली कृष्णमूर्ति को अनेक पुरस्कारों से नावाज़ा गया। भारत में शास्त्रीय नृत्य के लिए शानदार साल 1968 में उन्हें सरकार द्वारा पद्म श्री से सम्मानित किया गया। यह कारवां लगातार आगे बढ़ता रहा। उन्हें साल पद्म भूषण (2001), पद्म विभूषण (2016) और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1977) जैसे प्रतिष्ठित सम्मान से सम्मानित किया गया। उन्होंने 2000 साल पुरानी तिरुपति तिरुमाला की अस्तान नर्तकी (स्थायी नर्तकी) का खिताब भी धारण किया। 

कृष्णामूर्ति ने नृत्य में पांरगत होने के लिए कई स्तर पर और अलग-अलग विधाओं के निपुण कलाकारों से नृत्य सीखा। अपनी कला को और निखारने के लिए उन्होंने कांंचीपुरम एलप्पा पिल्लई और तंजावुर किटप्पा पिल्लई जैसे प्रसिद्ध गुरुओं से सीखा। बाद में उन्होंने वेदांतम लक्ष्मी नारयारण शास्त्री से कुचिपुड़ी सीखना शुरू किया जो एक तेज़ और सहज नृत्य शैली है।

उन्होंने चार दशकों से अधिक समय तक अपनी कला का प्रदर्शन किया है और उनका जीवन नृत्य के प्रति समर्पित रहा है। उनका जीवन उनके नृत्य विद्यालय, उनके छात्रों और उनके रचनाओं के इर्द-गिर्द घूमता रहा। नव स्वतंत्र भारत में शास्त्रीय नृत्य के लिए एक शानदार युग था, जिसने यामिनी कृष्णमूर्ति और उनके समय के अन्य महान कलाकारों को nurtured किया और उन्हें गहरा सम्मान प्रदान किया। उनके करियर में कई पुरस्कारों के अलावा, तिरुमाला-तिरुपति देवस्थानम ट्रस्ट ने उन्हें ‘अस्तान नर्तकी’ का खिताब भी दिया। यामिनी कृष्णमूर्ति ने अपना सारा जीवन नृत्य को समर्पित किया। 3 अगस्त 2024 में उन्होंने लंबी बीमारी के बाद हमेशा के लिए दुनिया को अलविदा कहा। वह नृत्य में जीती थीं, उनका जीवन नृत्य के चारों ओर घूमता था। 


सोर्सः

  1. Britannica
  2. Weebly.com
  3. Indian Express
  4. Deccan Herald

About the author(s)

मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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