इतिहास आइए जानते हैं 16 दिवसीय अभियान के इतिहास के बारे में

आइए जानते हैं 16 दिवसीय अभियान के इतिहास के बारे में

लैंगिक हिंसा के ख़िलाफ़ संयुक्त राष्ट्र का अंतरराष्ट्रीय अभियान 16 डेज़ एक्टिजिवम हर साल 25 नवंबर (महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा उन्मूलन के अंतरराष्ट्रीय दिवस) से लेकर 10 दिसंबर (अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस) तक आयोजित किया जाता है। यह अभियान 1991 में शुरू हुआ था।

‘तीन में से एक महिला अपने जीवन में कभी न कभी हिंसा का सामना करती हैं’, ‘640 मिलियन से अधिक महिलाएं इंटीमेट पार्टनर वॉयलेंस का सामना करती हैं’, ‘हर दस मिनट किसी महिला की उसके परिवार वाले या साथी द्वारा हत्या की जाती है’, ये कुछ तथ्य है जो दुनिया में महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा को दिखाते हैं। पूरी दुनिया में महिलाओं को महज उनकी लैंगिक पहचान की वजह से हिंसा का सामना करना पड़ता है। पुरुष प्रधान व्यवस्था के तहत महिलाओं को हाशिये का जीवन जीने के लिए मजबूर किया जाता है। पुरुषों को अधिक वरीयता देने वाले कानून बनाए गए हैं। महिलाओं की समानता के लिए पिछली सदी से प्रयास किए जा रहे हैं। सामाजिक, राजनीतिक हर स्तर पर महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। लैंगिक समानता को बनाने के लिए कानून और अभियान के ज़रिये जागरूकता लाई जा रही है।

लैंगिक हिंसा के ख़िलाफ़ संयुक्त राष्ट्र का अंतरराष्ट्रीय अभियान 16 डेज़ एक्टिजिवम हर साल 25 नवंबर (महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा उन्मूलन के अंतरराष्ट्रीय दिवस) से लेकर 10 दिसंबर (अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस) तक आयोजित किया जाता है। यह अभियान 1991 में शुरू हुआ था, जिसका उद्देश्य महिलाओं और लड़कियों के ख़िलाफ़ हिंसा को खत्म करने के लिए आवाज़ों को एकजुट करना और उन्हें सशक्त बनाना था। हर साल, यह अभियान दुनिया भर में सक्रिय आंदोलनों और संगठनों को प्रेरित करता है और सरकारों का ध्यान इस गंभीर समस्या पर केंद्रित करता है, ताकि लैंगिक आधार पर होने वाली हिंसा के उन्मूलन के लिए ठोस कदम उठाए जा सकें।

संयुक्त राष्ट्र द्वारा इस साल के 16 दिवसीय अभियान का थीम 2024 UNITE है, “Towards Beijing +30: UNiTE to End Violence Against Women and Girls.” 2025 में, वैश्विक समुदाय बीजिंग घोषणा और एक्शन प्लेटफ़ॉर्म की 30वीं वर्षगांठ की समीक्षा करेगा।

इन 16 दिनों के दौरान, यह अभियान दुनिया की सबसे गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों में से एक महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने का आह्वान करता है। 16 दिनों की सक्रियता के दौरान, दुनिया भर के लोग लैंगिक हिंसा के प्रति जागरूकता बढ़ाने, भेदभावपूर्ण रवैये को चुनौती देने और महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा को स्थायी रूप से समाप्त करने के लिए बेहतर कानून और सेवाओं की मांग करते हुए एकजुट होते हैं।

16 दिवसीय अभियान की शुरुआत कैसे हुई?

16 दिवसीय अभियान की शुरुआत पात्रिया, मिनर्वा और मारिया टेरेसा मिराबल तीन बहनों ने की थीं, जो डोमिनिकन गणराज्य में रहती थीं। उनके देश पर राफेल त्रुजिलो की तानाशाही का शासन था। त्रुजिलो का शासन अत्यंत क्रूर था। जो लोग भी उसके विरोध में खड़े होते थे वह उन्हें कैद, प्रताड़ित या मार दिया जाता था। 1930 के दशक के आखिर में, त्रुजिलो ने डोमिनिकन गणराज्य में रह रहे हजारों हैतियों की नस्ल के आधार पर हत्या का आदेश दिया। उसका शासन 31 साल तक चला और इस दौरान उनकी तानाशाही ने कई नागरिकों और उनके अधिकारों को दबा दिया। त्रुजिलो के शासन में युवतियों का शोषण होता था, वह अक्सर युवतियों के शोषण के लिए लोगों को काम पर लगाता था।

तस्वीर में मिराबल बहनें। तस्वीर साभारः IWDA

मिराबल बहनें, त्रुजिलो के शासन की क्रूरता और हिंसा का जमकर विरोध करती थीं। उसके शासन को चुनौती देने के लिए एक भूमिगत आंदोलन का नेतृत्व करती थीं। ये तीनों बहनें लगातर त्रुजिलो की आलोचना और विरोध करती रहीं। तानाशाह द्वारा अक्सर गिरफ्तार कराने और परेशान करने का आदेश दिया जाता था। त्रुजिलो के कृत्यों के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए, मिराबल बहनों ने पर्चे तैयार किए और लोगों में बांटें। 25 नवंबर 1960 को, पात्रिया, मिनर्वा और मारिया टेरेसा की त्रुजिलो द्वारा भेजे गए लोगों ने पीट-पीटकर हत्या कर दी। उनकी लाशों को चट्टानों से नीचे फेंक दिया गया ताकि यह एक दुर्घटना लगे। मिराबल बहनों की हत्या ने जनता में भारी आक्रोश पैदा करने का काम किया था।

मिराबल बहनें लोकतांत्रिक और नारीवादी प्रतिरोध का प्रतीक बन गईं। उन्हें ‘लास मरिपोसास’ कहा जाने लगा, जिसका अर्थ है ‘तितलियां’। उनकी मृत्यु की याद में, 25 नवंबर को 1980 में लैटिन अमेरिका में महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा उन्मूलन का अंतरराष्ट्रीय दिवस घोषित किया गया। इस दिन को 1999 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा औपचारिक रूप से मान्यता दी गई। जून 1991 में, सेंटर फॉर वूमेन ग्लोबल लीडरशिप (CWGL) और पहले वीमंस ग्लोबल इंस्टीट्यूट ऑन वीमंस, वायलेंस एंड ह्यूमन राइट्स के प्रतिभागियों ने लैंगिक हिंसा के ख़िलाफ़ 16 दिनों के वैश्विक अभियान की घोषणा की। मिराबल बहनों द्वारा चलाए गए जागरूकता अभियान और उनके संघर्ष आज भी प्रासंगिक और महत्वपूर्ण हैं। मिराबल बहनों को “टाइम्स 100 वूमेन ऑफ द ईयर” में शामिल भी किया जा चुका है। 

16 दिवसीय अभियान क्यों महत्वपूर्ण है? 

तस्वीर साभारः LinkedIn

महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा दुनिया के हर देश में भयावह पैमाने पर जारी है। पितृसत्तात्मक व्यवस्था के कारण अक्सर इसे सामान्य व्यवहार मान लिया जाता है। महिलाओं के ख़िलाफ़ भेदभाव की वैश्विक संस्कृति इस हिंसा को बिना किसी दंड के होने देती है। महिलाएं खुद एकत्र होकर अपने ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा के बारे में समाज को जागरूक कर रही हैं। #मीटू अभियान दुनियाभर की औरतों ने कार्यस्थल पर होने वाली यौन हिंसा के बारे में बात कहीं। हर देश की महिलाएं अपने मुल्कों में महिलाओं के विरुद्ध होने वाली हिंसा के बारे में बात कर रही हैं। #MeToo और #TimesUp जैसे आंदोलनों ने इस मुद्दे को वैश्विक मंच पर लाकर केंद्र में रखा है।

महिलाओं के अधिकारों के हनन के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना एक ऐसा कार्य है, जिसे महिला अधिकार संगठन हर दिन करते हैं। ये संगठन बेहतर कानून और सेवाएं लागू करवाने के लिए सरकारों से बातचीत करते हैं और समुदायों के साथ मिलकर भेदभावपूर्ण रवैये और व्यवहार को बदलने का प्रयास करते हैं। फिर भी, महिलाओं के खिलाफ हिंसा एक वैश्विक समस्या है, जिसके लिए वैश्विक कार्रवाई की आवश्यकता है। 16 दिवसीय अभियान जैसे कदम महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा के मुद्दे को उजागर करते हैं। ये अभियान सार्वजनिक जागरूकता पैदा करने का अवसर प्रदान करते हैं, ताकि स्थानीय, राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे रोकने के लिए आवश्यक बदलाव किए जा सकें।

लैंगिक आधार पर होने वाली हिंसा बेहद कम रिपोर्ट किये जाने वाले और कम जांच किया जाने वाला अपराध है। अपराधियों के लिए दंड से मुक्ति से मतलब ऐसे घटनाओं को बढ़ावा मिलता है। इससे भय और कलंक का माहौल बनता है, जिससे जीवित बचे लोगों के इलाज में रुकावट आती है। वास्तविक दुनिया में तो महिलाओं को हिंसा का सामना करना पड़ता ही है वर्चुअल दुनिया में भी डिजिटल हिंसा के रूप में हिंसा का सामना करना पड़ता है। जिसमें महिलाओं को ट्रोल किया जाता है, डिजिटल उनका पीछा किया जाता है। इससे महिलाओं को डर, घबराहट और अवसाद का अनुभव करना पड़ता है। कई मामलों में जान तक गंवानी पड़ती है। कभी-कभी डिजिटल हिंसा ऑफलाइन भी जाती है, जिससे शारीरिक सुरक्षा को खतरा होता है।

तस्वीर साभारः The Guardian

लैंगिक हिंसा के गंभीर प्रभावों के बावजूद, इस मुद्दे को अभी भी पर्याप्त तेजी के साथ नहीं निपटाया जा रहा है। दो तिहाई से अधिक महिलाएं इस तरह के शोषण का सामना करती हैं, बावजूद इसके इस मुद्दें को गंभीरता से नहीं देखा जाता हैं। लैंगिक आधार पर होने वाली हिंसा के व्यवहार को खत्म करने के लिए कहीं अधिक संसाधन निवेश करने होंगे और अधिक राजनीतिक इच्छाशक्ति जुटानी होगी। जीवित बचने वाले और उनके समर्थनकर्मी लगातार अपनी आवाज़ उठा रहे हैं, अपनी कहानियां साझा कर रहे हैं और बदलाव की मांग कर रहे हैं। उनकी बातों और अनुभवों को गंभीरता से सुनने और उठाने की ज़रूरत है।

मिराबल बहनें लोकतांत्रिक और नारीवादी प्रतिरोध का प्रतीक बन गईं। उन्हें ‘लास मरिपोसास’ कहा जाने लगा, जिसका अर्थ है ‘तितलियां’। उनकी मृत्यु की स्मृति में, 25 नवंबर को 1980 में लैटिन अमेरिका में महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा उन्मूलन का अंतरराष्ट्रीय दिवस घोषित किया गया। इस दिन को 1999 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा औपचारिक रूप से मान्यता दी गई।

संयुक्त राष्ट्र द्वारा इस साल के 16 दिवसीय अभियान का थीम 2024 UNITE है, “Towards Beijing +30: UNITE to End Violence Against Women and Girls.” 2025 में, वैश्विक समुदाय बीजिंग घोषणा और एक्शन प्लेटफ़ॉर्म की 30वीं वर्षगांठ की समीक्षा करेगा। पिछले 30 वर्षों में 12 महत्वपूर्ण क्षेत्रों में प्रगति की रिपोर्ट तैयार की जा रही है। महिलाओं के अधिकारों और हिंसा के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाला ऐतिहासिक बीजिंग घोषणा और एक्शन प्लेटफ़ॉर्म की साल 2025 में 30वीं वर्षगांठ है। यह लैंगिक समानता और महिलाओं और लड़कियों के अधिकारों को हर जगह हासिल करने के लिए एक दृष्टिवादी खाका है। हमें मिलकर महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा को खत्म करने के लिए उस मानसिकता पर चोट करनी होगी जो हिंसा को बढ़ावा देती हैं, इसे उचित ठहराती हैं, और सामान्य बनाती हैं। जो महिलाओं के सुरक्षा और समानता के अधिकार को नकारती हैं। लैंगिक आधार पर होने वाली हिंसा को जड़ से खत्म करने के लिए पुरुषों की मानसिकता में बदलाव की आवश्यकता है और उन्हें साथ लेकर चलना भी ज़रूरी है ताकि हम एक समावेशी समाज का निर्माण कर सकें। 

सोर्सः

  1. UN Women
  2. IWDA
  3. UNFPA
  4. welshwomensaid.org.uk

About the author(s)

मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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