इतिहास एलिस वॉकर के इंटरसेक्शनल नारीवादी सिद्धांतों को समझना क्यों है ज़रूरी

एलिस वॉकर के इंटरसेक्शनल नारीवादी सिद्धांतों को समझना क्यों है ज़रूरी

एलिस वॉकर ने वुमनिस्ट के बारे में यह कहा है, "वुमनिस्ट इज टू फेमिनिस्ट एज पर्पल टू लैवेंडर" यानी नारीवादी, नारीवाद के लिए उसी तरह है जैसे बैंगनी, लैवेंडर के लिए है। वह कहती है कि इस शब्द का उद्देश्य नारीवाद की एक शाखा को नामित करना नहीं है बल्कि यह इंटरसेक्शनल नज़रिये से शोषण के तरीकों को संबोधित करता है।

पुरुषों की वर्चस्व वाली दुनिया के स्वरूप को बदलने के लिए और समान अधिकारों के लिए औरतें लगातार अंहिसात्मक तरीकें से अपनी लड़ाई लड़ रही हैं। सभी वर्ग, समुदायों की औरतें पितृसत्ता के कारण असमानता, भेदभाव, शारीरिक हिंसा और मानसिक हिंसा का सामना कर रही हैं। नारीवाद की पहली और दूसरी लहर में मुख्य तौर पर श्वेत उच्च वर्ग और मध्यम वर्ग की महिलाएं शामिल रही जिसमें सामाजिक और आर्थिक और रंगभेद का सामना करने वाली ब्लैक महिलाएं शामिल नहीं थीं। मुख्यधारा के नारीवादी आंदोलन में नस्लवाद और लिंगवाद से जुड़े मुद्दों के गायब होने पर ब्लैक महिलाओं के संघर्षों को स्वीकार करने के लिए एक समानांतर महिलावादी आंदोलन का गठन किया गया। यह ‘वुमनिस्ट’ शब्द अफ्रीकी अमेरिकी लेखक ऐलिस वॉकर द्वारा गढ़ा गया। एलिस वॉकर एक अमेरिकी उपन्यासकार, कथाकार, कवि, नारीवादी और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। 1982 में वह फिक्शन के लिए पुलित्जर पुरस्कार जीतने वाली पहली अफ्रीकी अमेरिकी महिला बनीं। अपने उपन्यास ‘द पर्पल कलर’ के लिए उन्होंने यह सम्मान प्रदान किया गया।

वुमनिज़म क्या है?

वुमनिज़म, मुख्य तौर पर ब्लैक महिलाओं की स्थितियों और चिंताओं पर केंद्रित है। वुमनिस्ट शब्द का इस्तेमाल एलिस वॉकर ने 1981 में अपने लघु कहानी संग्रह ‘यू कैन्ट कीप ए गुड वुमन डाउन’ में किया था। बाद में निबंध संग्रह ‘इन सर्च ऑफ अवर मदर्स गार्डन्सः वुमनिस्ट प्रोज ’(1983) में इस धारणा को उजागर किया। एलिस वॉकर द्वारा वुमनिज़म टर्म नारीवादी आंदोलन के लिए एक महत्वपूर्ण समय पर आया जो कलर्ड महिलाओं और कामकाजी महिलाओं के प्रभाव और आलोचनों के बाद बिखरना शुरू हो गया था। 

एक आंदोलन के रूप में वुमनिज़म ने नस्ल और सामाजिक-आर्थिक वर्ग के साथ-साथ जेंडर को ध्यान में रखते हुए इंटरसेक्शनल नारीवाद के रूप में नारीवादी आंदोलन का विस्तार करने का तरीका पेश किया। इंटरसेक्शनैलिटी यह समझने के लिए एक विश्लेषात्मक ढांचा है कि कैसे किसी व्यक्ति की सामाजिक स्थिति उसके लिए भेदभाव और विशेषाधिकार के विभिन्न तरीके बनाती हैं। यह शब्द 1989 में किम्बर्ले क्रेंशॉ द्वारा गढ़ा गया था। इंटरसेक्शनैलिटी बताती है कि किसी की जाति, वर्ग, लिंग, यौनिकता आदि के आधार किस तरह उसके जीवन में महत्वपूर्ण है और यह जीवन जीने में किस तरह लाभ या नुकसान के कारक बनते हैं। भारतीय परिदृश्य में जाति के नज़रिये से देखें तो एक तथाकथित उच्च जाति वाली महिला कुछ स्थिति में एक दलित पुरुष से अधिक मजबूत स्थिति में होती है। लैंगिक पहचान से अलग जाति, वर्ग, समुदाय की पहचान सामाजिक, राजनीतिक और अन्य कारकों में मायने रखती है।

वॉकर कहती है, “मुझे ऐसे शब्द पसंद है जो चीजों को सही तरीके से जाहिर करते है। अब मेरे लिए ब्लैक फेमिनिस्ट ऐसा नहीं करता है। मुझे एक ऐसे शब्द की आवश्यकता थी जो जैविक (ऑर्गेनिक) हो और जो वास्तव में संस्कृति से निकला हो।”

 “वुमनिस्ट इज टू फेमिनिस्ट एज पर्पल टू लैवेंडर”

तस्वीर साभारः Bookish Santa

वुमनिज़म शब्द की उत्पत्ति के बारे में न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू में वॉकर कहती है, “मुझे ऐसे शब्द पसंद हैं जो चीजों को सही तरीके से जाहिर करते हैं। अब मेरे लिए ब्लैक फेमिनिस्ट ऐसा नहीं करता है। मुझे एक ऐसे शब्द की आवश्यकता थी जो जैविक (ऑर्गेनिक) हो और जो वास्तव में संस्कृति से निकला हो, जो वास्तव में उस भावना को जाहिर करता हो जो हम ब्लैक महिलाओं में देखते हैं और यह केवल स्त्रीत्व है।” 

एलिस वॉकर ने वुमनिस्ट के बारे में यह कहा है, “वुमनिस्ट इज टू फेमिनिस्ट एज पर्पल टू लैवेंडर” यानी नारीवादी, नारीवाद के लिए उसी तरह है जैसे बैंगनी, लैवेंडर के लिए है। वह कहती है कि इस शब्द का उद्देश्य नारीवाद की एक शाखा को नामित करना नहीं है बल्कि यह इंटरसेक्शनल नज़रिये से शोषण के तरीकों को संबोधित करता है। यह नारीवाद आंदोलन को समावेशी बनाता है क्योंकि शुरुआत में मुख्यधारा के नारीवादी आंदोलनों में ब्लैक महिलाओं का प्रतिनिधित्व और मुद्दे नहीं थे।

इंटरसेक्शनल नारीवाद के सिंद्धात और एलिस वॉकर

फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए श्रिया टिंगल।

फिर भी दो आंदोलनों की विचारधाराएं कभी-कभी ओवरलैप होती हैं। साल 1990 और 2000 के दशक में तीसरी लहर के नारीवादी आंदोलन ने महिलावादी अवधारणाओं को अपने सिद्धांत में शामिल किया। तीसरी लहर में महिलावादी अपनी पहचान को अन्य विशेषाताओं के बजाय संस्कृति के लेंस के माध्यम से भी देखते है जैसे वर्ग और सेक्सुअलिटी। नारीवादी विचारधारा सभी जेंडर को सहयोगी बनने के लिए प्रोत्साहित करता है और पितृसत्ता और लैंगिक भेदभाव को खत्म करने की बात कहती है। वॉकर और उनकी सैंद्धांतिक अवधारणाओं ने हमें नारीवादी आंदोलनों को अधिक समावेशी और इंटरसेक्शनल तरीके से आगे बढ़ाने में मदद की है।  

साथ ही वॉकर महिलावादियों को सार्वभौमिकतावादियों के रूप में परिभाषित करती हैं जो सभी की समानता की वकालत करते हैं। एक ऐसी दुनिया की कल्पना करती है जहां पुरुष और महिलाएं विशिष्ट सांस्कृति पहचान रखते हुए सह-अस्तित्व में रह सकें। वुमनिज़म संपूर्ण मानवता, पुरुष और महिला की भलाई को तय करने पर जोर दिया है। एलिस वॉकर पितृसत्ता के ख़िलाफ लड़ाई में पुरुषो को दुश्मन के रूप में प्रस्तुत न करते हुए उन्हें भी इस लड़ाई में शामिल किया है। पुरुषों के साथ महिलाओं के संबंधों और परिवार के महत्व पर जोर दिया है। साथ ही कहा है कि नारीवाद न केवल लैंगिक समानता के लिए है बल्कि अफ्रीकी अमेरिकी पुरुषों और महिलाओं के ख़िलाफ़ नस्लीय भेदभाव के खिलाफ़ और न्याय के लिए भी लड़ता है।

वॉकर ने शिक्षक और एक्टिविस्ट एना जूलिया कॉपर और महिला अधिकारों की पैरवी करने वाली सोर्जानर ट्रुथ सहित इतिहास से अन्य उदाहरणों का भी इस्तेमाल किया है। उन्होंने नारीवाद के मॉडल के रूप में वर्तमान सक्रियता और विचार के उदाहरणों का भी उपयोग किया, जिनमें बेल हुक्स और ऑड्रे लॉर्ड शामिल हैं। एलिस वॉकर वुमनिज़म की व्याख्या ब्लैक महिलाओं के साहस, बहादुरी और आत्मविश्वासपूर्ण के साथ-साथ अन्य महिलाओं और पूरी मानवता के लिए उनके प्यार को अपनाने के रूप में परिभाषित किया है। वॉकर ने अपनी शुरुआत के बाद से नारीवाद में अलग-अलग क्षेत्रों को शामिल करने के लिए विस्तार किया जिसमें अफ्रीकन नारीवाद और नारीवादी धर्मशास्त्र या आध्यात्मिकता जैसी अवधारणओं को भी जन्म दिया। 

नारीवादी विचारधारा सभी जेंडर को सहयोगी बनने के लिए प्रोत्साहित करता है और पितृसत्ता और लैंगिक भेदभाव को खत्म करने की बात कहती है। वॉकर और उनकी सैंद्धांतिक अवधारणाओं ने हमें नारीवादी आंदोलनों को अधिक समावेशी और इंटरसेक्शनल तरीके से आगे बढ़ाने में मदद की है।   

1990 के दशक के अंत में एक अग्रणी नारीवादी और नागरिक अधिकार कार्यकर्ता के रूप में ऐलिस वॉकर की भूमिका और मजबूत होती है। उन्होंने अपनी सभी उपन्यासों में भेदभाव और सेक्सिजम को रोकने के लिए जागरूकता फैलाई। उनके काम से सभी नस्लों, आकृतियों और आकारों के लोग उनसे जुड़ाव महसूस करते चले गए। उनकी कलम की मदद से उन्होंने समाज को देखने का मानदंड बदलने में मदद की। एलिस वॉकर ने नारीवाद के लिए बहुत महत्वपूर्ण संदर्भात्मक ढांचे के रूप में काम किया है और नारीवादी आंदोलनों के दायरे को व्यापक बनाया है। हाशिये की महिलाओं पर विशेष जोर देते हुए नारीवादी आंदोलनों को अधिक समावेशी बनाया है। 


स्रोतः 

  1. Wikipedia
  2. Britannica
  3. Nickledanddimed.com
  4. thewomd.in

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