गर्ल बॉस फेमिनिज़मः लैंगिक समानता की राह या बाधा
तस्वीर साभारः She TheQueen
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आपने अक्सर टी-शर्ट, कॉफ़ी मग और पोस्टर पर ‘गर्ल बॉस’ लिखे देखा होगा। सोशल मीडिया पर हैशटैग #GirlBoss के साथ बहुत सारी पोस्ट भी देखी होंगी। इस शब्द को देखते ही दिमाग में कामकाजी, सशक्त और ताकतवर महिला की छवि आती है। इस तरह से गर्ल बॉस की अवधारणा से लोग परिचित हैं जिसे एक तारीफ के तौर पर देखा जाता है लेकिन वास्तव में गर्ल बॉस फेमिनिज़म क्या है, कब इसकी शुरुआत हुई, कैसे यह नारीवाद के मूल सिंद्धातों से अलग हो गया आइए जानते हैं।

गर्ल बॉस कल्चर कब आया?

गर्ल बॉस कल्चर, पूंजीवाद का एक नया अवतार है। इसे महिला सशक्तिकरण के तौर पर देखा गया। जो 21वीं सदी की कामकाजी ताकतवर महिलाओं के लिए इस्तेमाल किया गया है। साल 2008 की ग्लोबल फाइनेशियल क्रैश की घटना के बाद गर्ल बॉस कल्चर ने तूल पकड़ा। गर्ल बॉस शब्द साल 2014 में सोफिया अमोरुसो ने मूल रूप से गढ़ा था, जिन्होंने कपड़ों का ब्रॉन्ड ‘नेस्टी गर्ल’ स्थापित किया था। उन्होंने इस शब्द का प्रयोग उन महिलाओं के लिए किया, जिन्होंने कार्यस्थल पर गैसलाइटिंग को चुनौती दी। उन्होंने खुद अपनी सफलता के लिए इसे मेटाफर के तौर पर भी इस्तेमाल किया। 

अमोरूसो के महिला कॉर्पोरेट में वर्चस्व के विजन को अन्य महत्वकांक्षी उद्यमियों ने फॉलो किया। अमोरूसो ने इस नाम से किताब, मीडिया कंपनी लॉन्च की जिसमें नेटवर्किंग कॉन्फ्रेंस, ब्रांडेड मर्चेडाइज और एक नेटफिल्क्स सीरीज़ भी शामिल है। जल्द ही ‘गर्ल बॉस’ को आदर्श मानकर हर इंडस्ट्री में शक्तिशाली महिलाओं ने मार्केटिंग के लिए इसका इस्तेमाल किया। करियर में ऊंचे पायदान पर मौजूद महिलाओं ने खुद के लिए इसे लेबल के तौर पर इस्तेमाल किया।

तस्वीर साभारः Wikipedia

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गर्ल बॉस कल्चर, पूंजीवाद का एक नया अवतार है। इसे महिला सशक्तिकरण के तौर पर देखा गया। जो 21वीं सदी की कामकाजी ताकतवर महिलाओं के लिए प्रयोग किया गया है। साल 2008 की ग्लोबल फाइनेशियल क्रैश की घटना के बाद गर्ल बॉस कल्चर ने तूल पकड़ा। जल्द ही ‘गर्ल बॉस’ को आदर्श मानकर हर इंडस्ट्री में शक्तिशाली महिलाओं ने मार्केटिंग के लिए इसका इस्तेमाल किया। करियर में ऊंचे पायदान पर मौजूद महिलाओं ने खुद के लिए इसे लेबल के तौर पर इस्तेमाल किया।

गर्ल बॉस की पहचान आत्मविश्वासी, सक्षम महिला होने से जुड़ गई जिन्होंने दूसरों के लिए काम करने और जीवन में अपनी महत्वकांक्षाओं को प्राथमिकता दी। गर्ल बॉस के माध्यम से महिला उद्यमियों को समर्थन दिया गया। उन्होंने अपने बिजनेस मॉडल स्थापित किए। युवाओं को इस बिजनेस मॉडल के केंद्रक के रूप में रखा। खासतौर पर आकर्षक मर्चेंडाइजिंग के माध्यम से यह विचार बेचा गया।

गर्ल बॉस एक पूंजीवादी अवधारणा है

धीरे-धीरे गर्ल बॉस एक टॉक्सिक कल्चर के तौर पर सामने आया। अमेरिकी पूंजीवाद की नीतियों को साकार करने का ही माध्यम बनता दिखा। निर्ममता और प्रतिस्पर्धा के कारण रूढ़िवादी विचारों का ही अनुसरण किया गया। तय मानकों के आधार पर श्वेत और संपन्न मिलेनियम महिलाओं की महत्वकांक्षाओं को ही विस्तार मिला। गला घोंटू प्रतियोगिता और मुनाफे की नीतियों को अपनाया गया। पूंजीवाद कुछ लोगों को दूसरों की कीमत पर सफल होने की अनुमति देकर काम करता है। सीधे शब्दों में कहे तो पूंजीवाद केवल मज़दूर वर्ग के शोषण से ही अस्तित्व में रह सकता है। गर्ल बॉस कल्चर में भी इन्हीं नियमों का पालन किया गया।

कैसे यह नारीवाद से सिद्धांतों से खिलाफ़ है

महिलाओं को ताकत देने और आगे बढ़ाने वाले इस विचार की जड़ में नारीवाद स्थित है। लेकिन धीरे-धीरे गर्ल बॉसिफिकेशन उन महिलाओं के लिए एक जगह बनता चला गया जिनके पास सबकुछ हासिल करने का मौका पहले से मौजूद होता है। गर्ल बाॉस नारीवाद के अंदर विशेषतौर पर एक सीमित वर्ग की महिलाएं फिट बैठती हैं। इससे विशेषाधिकार प्राप्त श्वेत, उच्च वर्ग की महिलाओं को बढ़ावा मिला। गर्ल बॉस ने भी दमनकारी नीतियों के साथ पूंजीवाद को बढ़ावा देने का काम किया। यही वजह रही की बीते कुछ ही सालों में इसकी आलोचना होनी भी शुरू हो गई।  

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इसकी पहचान नारीवाद और महिलाओं की स्वतंत्रता को सफलता के साथ जोड़ने की धारणा के साथ एक ऐसे सामाजिक ढ़ांचे के तहत हुई जो दूसरों को प्रतिबंधित और सीमित भी करती है। गर्ल बॉस कल्चर के तहत उन्हीं नीतियों का पालन किया गया जिनका विरोध नारीवाद करता आ रहा है। यह कल्चर विशेषतौर पर इंटरसेक्शनल नारीवाद को नकारता नजर आता है। गर्ल बॉस फेमिनिज़म में वर्ग, नस्ल, भारत के संदर्भ में जाति और सेक्शुअल आइडेंटिटी का प्रतिनिधित्व नदारद है। भले ही गर्ल बॉस फेमिनिज़म में सशक्त, ऊंचे पदों वाली महिलाओं की छवि को सबके सामने रखा हो लेकिन इसमें सबका हिस्सा नहीं है। समावेशी नारीवाद से इतर गर्ल बॉस फेमिनिज़म में हर तबके की महिला का प्रतिनिधित्व गायब है। साथ ही यह पूंजीवादी व्यवस्था के साथ मिलकर अन्य और अधिक कमजोर महिलाओं को नीचे धकेलने का काम भी करता है। 

महिलाओं को ताकत देने और आगे बढ़ाने वाले इस विचार की जड़ में नारीवाद स्थित है। लेकिन धीरे-धीरे गर्ल बॉसिफिकेशन उन महिलाओं के लिए एक जगह बनता चला गया जिनके पास सबकुछ हासिल करने का मौका पहले से मौजूद होता है। गर्ल बाॉस नारीवाद के अंदर विशेषतौर पर एक सीमित वर्ग की महिलाएं फिट बैठती हैं।

विशेषाधिकार प्राप्त महिलाओं के लिए एक प्लैटफॉर्म 

सीमित नेतृत्व क्षमता गर्ल बॉस फेमिनिज़म की एक बड़ी समस्या दिखाती है। इसमें महिलाओं के उत्पीड़न को रोकने का वादा किया गया था लेकिन यहां महिलाओं ने केवल शीर्ष पद पर पहुंचकर पहली व्यवस्था में फिट रहने का विकल्प चुना। गर्ल बॉस नारीवाद पर अमांडा मूल कहती है, “संरचनात्मक बदलाव एक ऐसी चीज है जो संरचनाओं में होती है, उनके भीतर नहीं। एक श्वेत महिला का आसानी से शीर्ष पद पर बैठना, आर्श्चयजनक रूप जैसा कुछ लोग सोच सकते हैं लेकिन कार्यस्थल तब तक नहीं बदलते हैं जबतक सत्ता संरचना, पदानुक्रम और अधिकार के आधार पर, पुरुषों द्वारा निर्मित नीतियां रहती हैं।”

तस्वीर साभारः TheGuardian.com

गर्ल बॉस के शब्दों के जाल में शोषण और असमानता के वही तरीके अपनाते दिखता है जिसका नारीवाद विरोध करता है। सोफिया अमोरुसो खुद इसका उदाहरण है। तमाम कामयाबी, आर्थिक लाभ और अन्य उपलब्धियों के बाद वह वही करती दिखी, जिसका नारीवाद विरोध करता है। कर्मचारिओं को अवैध रूप से प्रेगनेंसी के दौरान काम से निकालना, किसी अन्य के काम की चोरी आदि ने अमोरूसो की वैधता पर संदेह पैदा किया। 

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गर्ल बॉस नारीवाद, पितृसत्ता की व्यवस्था को बदलने से अलग व्यक्तिगत सफलता को हासिल करने की कोशिश करता दिखता है। इसमें पूरे तरीके से एक ही व्यक्ति, स्वयं तक केंद्रित होकर पूंजीवादी लाभ पाने के लिए कारोबार को बढ़ा रहा है। साथ में यह अन्य महिलाओं को इस कदम पर चलने के लिए प्रेरित करने और शीर्ष पहुंचने की प्रेरणा के लिए कहता है। इसमें उत्पीड़न करने वाली संरचना पर बात ही नहीं की जाती है। सोफिया अमोरूसो के बड़े व्यवसाय से दुनिया में बड़ी प्रगति दिखी लेकिन यह व्यक्तिगत सफलता से आगे नहीं निकल सकी। 

गर्ल बॉस फेमिनिज़म में वर्ग, नस्ल, भारत के संदर्भ में जाति और सेक्शुअल आइडेंटिटी का प्रतिनिधित्व नदारद है। भले ही गर्ल बॉस फेमिनिज़म में सशक्त, ऊंचे पदों वाली महिलाओं की छवि को सबके सामने रखा हो लेकिन इसमें सबका हिस्सा नहीं है। समावेशी नारीवाद से इतर गर्ल बॉस फेमिनिज़म में हर तबके की महिला का प्रतिनिधित्व गायब है।

विक्की स्प्रेट ने गर्ल बॉस के लिए सेक्सिस्ट ट्रोजन हॉर्स शब्द का इस्तेमाल किया है। वह कहती हैं कि यह शब्द पुरुषों से भरी दुनिया में महिलाओं के लिए जगह बनाता है, वास्तव में यह एक बड़ा बंटवारा कर सकता है। जब महिला कामगारों की बात आती है तो ‘बॉस’ शब्द के सामने गर्ल लगाने की आवश्यकता क्यों पड़ी? यदि वास्तव में उस समानता की हिमायत कर रही थी जिसकी वह बात करती है तो इसकी कोई जरूरत नहीं है। महिलाओं के काम को अलग-थलग दिखाने से बेहतर वास्तव में बदलाव लाकर समावेशी विचारों के तहत अधिक से अधिक स्थायी प्रयासों को करना जरूरी है। 

पूरी दुनिया में वास्तव में अधिक महिलाओं के नेतृत्व और प्रतिनिधित्व की जरूरत है। लेकिन साथ में यह तय करना आवश्यक है कि वे किसी ऐसी कीमत पर न आगे बढ़े जो समस्या को और बढ़ाए। यह देखने की बहुत ज़रूरत है कि किसी तरह के टॉक्सिक और रूढ़िवादी विचारों की स्थापना न हो। नारीवाद महिलाओं की आजादी, समान व्यवहार, अधिकारों के विस्तार और जेंडर पे गैप जैसे मुद्दों पर बात करता है। नारीवाद का कोई भी रूप हो उसमें सभी महिलाओं को शामिल और किसी भी वर्ग, जेंडर के साथ दूसरा व्यवहार न हो। गर्ल बॉस क्लचर बाहरी तौर पर ऐसा लगता है कि यह नारीवाद आंदोलन के तौर पर महिला अधिकारो की पैरवी कर रहा है लेकिन इसमें व्यक्तिगत और विशेषाधिकार लाभ को ज्यादा प्रोत्साहित किया गया। 

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तस्वीर साभारः She TheQueen

स्रोतः 

wearerestless.org

Utblick.org

Theatlantic.com

Refinery29.com

मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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