नारीवाद मेरा फेमिनिस्ट जॉय: पितृसत्तात्मक समाज में रिश्तों के सहारे सपनों को सच करने की कहानी  

मेरा फेमिनिस्ट जॉय: पितृसत्तात्मक समाज में रिश्तों के सहारे सपनों को सच करने की कहानी  

मेरे सफ़र में मेरे माता-पिता, भाई और दोस्तों का साथ ही मेरी सबसे बड़ी ताक़त रहा है। यही रिश्ते और दोस्ती मुझे खुशी, आत्म-संतुष्टि और आत्मविश्वास देते हैं। मेरे लिए यही समर्थन मेरी फेमिनिस्ट जॉय है,क्योंकि इसने मुझे यह सिखाया कि कोई भी मुश्किल इतनी बड़ी नहीं होती जिसे हल न किया जा सके।

लड़की हो इतना पढ़ के क्या करोगी? इतनी देर रात में बाहर लड़कियां नहीं जाती, लड़कियों को घर के काम सीखने चाहिए क्योंकि शादी करके घर ही तो संभलना है। इस तरह की बातें हम अपने आस पास रोजमर्रा की जिंदगी में आए दिन सुनते हैं। हमारे समाज में सालों से लड़कियों पर पाबंदी है। ऐसे समाज में मैं अपने घर से हजारों मिल दूर अपनी शिक्षा के लिए अकेली रहती हूं, अकेले रहते हुए अपना कॉलेज और बाकी कामकाज भी खुद ही संभालती हूं, जो मुझे बहुत खुशी देता है सिर्फ खुशी नहीं साथ में संतुष्टि और आत्मविश्वास भी देता है। इसके पीछे मेरे माता- पिता, भाई और दोस्तों का हमेशा से समर्थन रहा है, मेरे जीवन में मेरे रिश्ते और दोस्ती ही मेरे सामाजिक संघर्षों से लड़ने की ताकत रहे हैं । इन्होंने मुझे हमेशा सिखाया कि कोई भी मुश्किल इतनी बड़ी नहीं होती जिसे हल नहीं किया जा सकता। इस प्रकार के रिश्ते और दोस्तों का साथ हो, तब किसी भी समाज की सोच से लड़ना आसान हो जाता है। 

पितृसत्ता के बीच सपनों की उड़ान 

मैं बिहार के छोटे से शहर आरा से आती हूं, जहां की सामाजिक संरचना और हवाओं में आज भी पितृसत्तात्मक सोच की गहरी पैठ है, जो लड़कियों के स्वतंत्र अस्तित्व पर हावी रहती है, जहां लड़कियों की शिक्षा महत्वहीन होती है या फिर महत्व होता भी है तो सिर्फ इतना कि शादी के लिए समाज को पढ़ी लिखी बहू चाहिए। इस छोटे से पितृसत्तात्मक सोच वाले शहर में मेरा जन्म मेरे माता पिता के घर हुआ, जिन्होंने हमेशा मेरे सपनों को उड़ान दी।  साथ ही यह सिखाया कि लड़कियां लड़कों से कम नहीं, बल्कि बराबर होती हैं। एक समय ऐसा था जब हमारे घर की आर्थिक स्थिति खराब थी। किताबें खरीदने को पूरे पैसे नहीं थे, वैसी हालत में भी मेरे माता–पिता ने मुझे और मेरे भाई की पढ़ाई को साथ में जारी रखा। अगर वो चाहते तो जैसे समाज के अन्य लोगों की तरह लड़कियों की पढ़ाई को कमतर आंकते हुए लड़कों की पढ़ाई को ज्यादा महत्व देते।

किताबें खरीदने को पूरे पैसे नहीं थे, वैसी हालत में भी मेरे माता–पिता ने मुझे और मेरे भाई की पढ़ाई को साथ में जारी रखा। ऐसे में मेरे परिवार ने मुझमें और मेरे भाई में जेंडर आधारित भेदभाव नहीं किया। लेकिन इस कारण मेरी बुआ और अन्य रिश्तेदार अक्सर मेरे माता पिता को ताने देते कि लड़की को इतना पढ़ा के क्या करोगे, जब अंत में इसे दूसरे घर ही जाना है, आखिर लड़कियां पराई धन ही तो होती हैं।

 ऐसे में मेरे परिवार ने मुझमें और मेरे भाई में जेंडर आधारित भेदभाव नहीं किया। लेकिन इस कारण मेरी बुआ और अन्य रिश्तेदार अक्सर मेरे माता पिता को ताने देते कि लड़की को इतना पढ़ा के क्या करोगे, जब अंत में इसे दूसरे घर ही जाना है, आखिर लड़कियां पराई धन ही तो होती हैं। कई बार ऐसा भी हुआ कि जो रिश्तेदार बाहर से आते थे वो अक्सर पापा से पूछते थे, ‘आपकी बेटी की तो शादी की उमर हो गई है , अब तो कुछ सालों में इसकी शादी करोगे आप’। इसके जवाब में मेरे पिता हमेशा कहते थे, “आज की लड़कियां लड़कों से ज्यादा योग्य है, और मेरी बेटी पढ़ाई में तेज है, जिसे वो अभी जारी रखेगी।” पिता के इन जवाबों ने हमेशा मेरे हौसले को पंख दिए हैं। लेकिन समाज और बाहरी रिश्तेदारों के लगातार रूढ़िवादी सवालों का असर ये हुआ कि सामाजिक रूढ़िवादिता के दबाव में मेरे पिता भी कहीं न कहीं ये मानने लगे कि लड़कियों की शादी ग्रेजुएशन पूरी होने तक कर देनी चाहिए। 

पितृसत्ता के बीच रिश्तों की ताकत: मेरी उड़ान की असली वजह 

हालांकि इस सोच और रूढ़िवादिता के खिलाफ लड़ाई में मेरी मां ने भरपूर सहयोग और साथ दिया। इसके साथ ही यह सुनिश्चित किया कि जब तक मैं अपनी पढ़ाई पूरी करके अपने पैरों पर खड़ी न हो जाती,  तब तक इस तरह का सामाजिक दबाव मेरे रास्ते का रोड़ा न बने और मैं बिना किसी दबाव के अपनी पढ़ाई पूरी करूं।मेरे जीवन का निर्णायक मोड़ तब आया, जब मैंने सीयूईटी का एग्जाम दिया और दिल्ली विश्वविद्यालय में मेरा दाखिला हुआ। दाखिला तो हो गया, लेकिन इसके आगे का रास्ता आसान नहीं था। मै घर की पहली लड़की हूं , जिसने राज्य से हजार मिल दूर पढ़ने जाने की बात की थी। पापा के मन में हजार चिंताएं और दुविधाएं थीं कि लड़की है इतने दूर जाकर कैसे पढ़ाई करेगी, अकेले कैसे रहेगी। 

लेकिन समाज और बाहरी रिश्तेदारों के लगातार रूढ़िवादी सवालों का असर ये हुआ कि सामाजिक रूढ़िवादिता के दबाव में मेरे पिता भी कहीं न कहीं ये मानने लगे कि लड़कियों की शादी ग्रेजुएशन पूरी होने तक कर देनी चाहिए। हालांकि इस सोच और रूढ़िवादिता के खिलाफ लड़ाई में मेरी मां ने भरपूर सहयोग और साथ दिया।

इन दुविधाओं के कारण वो राजी नहीं थे मुझे बाहर भेजने के लिए। उस वक्त मेरा साथ मेरे बड़े भाई ने दिया, और पापा को भरोसा दिलाने में मेरा सहयोग किया और इसके आगे हर रास्ते पर मेरा भाई मेरे साथ खड़ा रहा। अक्सर हम सुनते हैं कि लड़कियां ही लड़कियों की दुश्मन होती हैं। लेकिन मुझे मेरे जीवन में कुछ ऐसे दोस्त मिले, जिन्होंने न केवल हमेशा मुझे आगे बढ़ाने में सहयोग किया, बल्कि हर वक्त मेरे समर्थन में भी खड़े रहे।  इसके साथ ही मुझे यह भी सिखाया कि हम जिस समाज में रहते हैं, वहां एक लड़की होने के कारण हमें रोज सैकड़ों सामाजिक रूढ़ियों  का सामना करना होगा। लेकिन हमें रूढ़िवादिता की इस लड़ाई से डरने के बजाय उसका डटकर मुकाबला करना चाहिए।

मेरे सफ़र में मेरे माता-पिता, भाई और दोस्तों का साथ ही मेरी सबसे बड़ी ताक़त रहा है। यही रिश्ते और दोस्ती मुझे खुशी, आत्म-संतुष्टि और आत्मविश्वास देते हैं। मेरे लिए यही समर्थन मेरी फेमिनिस्ट जॉय है,क्योंकि इसने मुझे यह सिखाया कि कोई भी मुश्किल इतनी बड़ी नहीं होती जिसे हल न किया जा सके। जब परिवार और दोस्त हमारे साथ खड़े हों, तब समाज की रूढ़िवादी सोच से लड़ना आसान हो जाता है और यही एहसास मुझे अपने अस्तित्व का सम्मान करने और अपने सपनों को पूरा करने की राह दिखाता है।

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