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संस्कृतिसिनेमा प्रेम, परंपरा और परिवर्तन की बहस दिखाती वेबसीरीज़ ‘बंदिश बैंडिट्स सीज़न-2’

प्रेम, परंपरा और परिवर्तन की बहस दिखाती वेबसीरीज़ ‘बंदिश बैंडिट्स सीज़न-2’

वेबसीरीज़ में राधे और मोहिनी देवी की बहस परंपरा बनाम आधुनिकता पर केंद्रित है। मोहिनी देवी परंपरा को सही मानती हैं, जबकि राधे तर्क देता है कि समय के साथ बदलाव जरूरी है।

बंदिश बैंडिस्ट सीज़न-2 वेबसीरीज़ ऐसे कई मुद्दों पर समीक्षात्माक दृष्टि रख रही है जो मुद्दे ज्यादातर व्यवसायिक सिनेमा या वेबसीरीज़ में गायब रहते हैं। इस वेबसीरीज़ में जो भी पात्र शामिल हैं, सब अपनी-अपनी बहस के साथ शामिल हैं। नए समय के साथ स्त्री-पुरुष संबंधों में बदलाव आया है। वेबसीरीज़ में प्रेम का पारंपरिक रूप और नया स्वरूप, दोनों की खुले मन से विवेचना की गई है। साथ ही आधुनिक स्त्री और पारंपरिक स्त्री का अंतर और उनके संघर्ष पर बेहद खूबसूरत और सार्थक ढंग से विमर्श रखती है ये वेबसीरीज़। वेबसीरीज़ के आखिरी के दृश्य में प्रेम, स्त्री मन का द्वंद्व और उसकी मुक्ति की बहस को इतने संवेदनशील और मनोवैज्ञानिक पहलू से समझने के लिए यह वेबसीरीज़ याद रखी जायेगी। ‘बंदिश बैंडिट्स सीजन-2’  की कहानी पंडित राधे मोहन (नसीरुद्दीन शाह) की मृत्यु से शुरू होती है। कहानी में हलचल तब होती है, जब एक लेखक पंडित राधेमोहन के जीवन पर आधारित एक  किताब लिखता है।

किताब के लोकार्पण समारोह में पंडित राधेमोहन के परिवार को बुलाया जाता है। किताब में लेखक ने पंडित राधेमोहन के स्त्री-द्वेष और उनके अहम भरे व्यक्तित्व को रेखांकित करता है।  हालांकि ये बातें काफी हद तक सच थीं और इस सच्चाई को भी उनके बेटे ने शराब के नशे में लेखक को बता दी थी। लेकिन लेखक इसे बहुत आलोचकीय दृष्टि से लिख दिया था, जिससे लोगों में लंबे समय से छिपी इस सच्चाई  को लेकर आक्रोश दिखता है। राजघराने के राजा भी राठौड़ घराने का बहिष्कार करते हैं और पंडित राधेमोहन की स्मृति में होने वाले संगीत समारोह को रद्द कर देते हैं। नायक राधे (ऋत्विक भौमिक) इस बात से तनाव में आ जाते हैं क्‍योंकि राठौड़ घराने के संगीत को आगे ले जाने की जिम्‍मेदारी  राधे पर ही थी। राधे के जीवन में ये बात तूफान की तरह आयी थी।  

तमन्ना शास्त्रीय संगीत का बेसिक सीखने के लिए कसौली के म्‍यूजिक स्‍कूल में एडमिशन ले लेती है।  वहां की संगीत टीचर (दिव्या दत्ता)  एक सख्त-अनुशासन पसंद टीचर हैं। तमन्ना म्यूजिक अल्बम की दुनिया की स्टार है, लेकिन वे तमन्ना को एक सामान्य स्टूडेंट्स की तरह ही ट्रीट करती हैं।

दो पीढ़ियों में अंतर और ताल-मेल दिखाती कहानी

किसी भी विधा का बेसिक ज्ञान कितना महत्वपूर्ण होता है ये वेबसीरीज़ इस बात को गहराई से समझाती है। तमन्ना (श्रेया चौधरी) और राधे का ब्रेकअप हो चुका है। तमन्ना शास्त्रीय संगीत का बेसिक सीखने के लिए कसौली के म्‍यूजिक स्‍कूल में एडमिशन ले लेती है।  वहां की संगीत टीचर (दिव्या दत्ता)  एक सख्त-अनुशासन पसंद टीचर हैं। तमन्ना म्यूजिक अल्बम की दुनिया की स्टार है, लेकिन वे तमन्ना को एक सामान्य स्टूडेंट्स की तरह ही ट्रीट करती हैं। बार-बार तमन्ना का सेलिब्रिटी होना उसके सामने आता है। लेकिन तमन्ना संगीत की बेसिक शिक्षा की जरूरत को समझती है। 

तस्वीर साभार: Koimoi

तमन्ना राधे से ब्रेकअप तो कर लेती है लेकिन ब्रेअकप के दुख से निकल नहीं पाती। संयोग से एक बेहद हाईप्रोफाइल म्यूजिक रियलिटी शो में राधे और तमन्‍ना फिर मिलते हैं। लेकिन कड़वाहटें, गिले-शिकवे उन दोनों बीच खत्म नहीं हुए होते हैं। इंडिया बैंड चैंपियनशिप प्रतियोगिता में जाने के लिए राधे और माँ मोहिनी देवी की बहसें इस वेबसीरीज़ में बहुत तार्किकता से चलती हैं। दो पीढ़ियां आमने-सामने खड़ी दिखती हैं, जहां की दीवारें पुरानी और नयी विचारधारा के टकराहट से गूँजती हैं।

संगीत हो या कोई विधा हमें समझना होगा कि नये समय की चुनौतियां जटिल होती जा रही हैं। अगर पुराने फ्रेम में बिठाकर हम उसे देखना चाहते हैं तो असफल ही होंगे। जब राधे माँ को टीम में साथ रहने के लिए कहता है तो माँ इनकार करती हैं। वो कहती हैं कि संगीत बाजार में बेचने की चीज नहीं है। राधे कहता है कि इस बाजार से हम इतना डरते क्यों हैं। वो कहता है कि संगीत पहले भी लोगों के लिए था आज भी वो लोगों के लिए ही होना चाहिए।

तमन्ना राधे से ब्रेकअप तो कर लेती है लेकिन ब्रेअकप के दुख से निकल नहीं पाती। संयोग से एक बेहद हाईप्रोफाइल म्यूजिक रियलिटी शो में राधे और तमन्‍ना फिर मिलते हैं। लेकिन कड़वाहटें, गिले-शिकवे उन दोनों बीच खत्म नहीं हुए होते हैं।

बाजार और बाजारवाद में फर्क समझना जरूरी है। बाजार हमारी सुविधा के लिए होता है, जबकि बाजारवाद सिर्फ मुनाफाखोरी की प्रवृत्ति है, जो इंसान के लिए घातक हो सकती है। वेबसीरीज़ में राधे और मोहिनी देवी की बहस परंपरा बनाम आधुनिकता पर केंद्रित है। मोहिनी देवी परंपरा को सही मानती हैं, जबकि राधे तर्क देता है कि समय के साथ बदलाव जरूरी है। उसका संवाद— अब बात इस पार या उस पार की नहीं, तैरने या डूब जाने की है”—यही सवाल उठाता है कि हम नए समय के साथ सामंजस्य बैठाएंगे या परंपराओं में उलझकर रुक जाएंगे।

वेबसीरीज़ का मनमोहक संगीत

बंदिश बैंडिस्ट के पहले सीजन की तरह एक बार फिर से मनमोहक संगीत वेबसीरीज़ का केंद्रीय विषय रहा।  कहानी को जैसे संगीत की विविध लड़ियों में पिरोकर कहा जा रहा है। लेकिन, विशेषता ये भी है कि विमर्श कहीं भी कमजोर नहीं पड़ता। वेबसीरीज़ जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, यह संगीत का सम्‍मोहन और भी  गहराता जाता है। शास्त्रीय संगीत के कठिन रागों को  भाव से भरी हुई बंदिशों के साथ रॉक, जैज और पॉप जैसी पश्चिमी संगीत शैलियों का अद्भुत मिश्रण बेहद खूबसूरती से कहानी को रोचक और खूबसूरत बनाये रखता है।

तस्वीर साभार: Variety

वेबसीरीज़ के इस दूसरे सीजन में प्रेम, दोस्ती, ब्रेकअप, नए संबंधों में जाने की गति और उनके द्वंद्व पर ठहर कर विस्तार से बात करती है। साथ ही  परंपरा और आधुनिकता के बीच टकराव पर बहुत सार्थक बहस करती दिखती है। ‘बंदिश बैंडिट्स सीजन 2’ का मुख्य केंद्र संगीत है, जो कहानी के साथ खूबसूरती से घुल-मिल जाता है। एना रहमान और दिग्विजय सिंह परियार का संगीत प्रभावशाली है।

मोहिनी देवी परंपरा को सही मानती हैं, जबकि राधे तर्क देता है कि समय के साथ बदलाव जरूरी है। उसका संवाद— “अब बात इस पार या उस पार की नहीं, तैरने या डूब जाने की है”—यही सवाल उठाता है कि हम नए समय के साथ सामंजस्य बैठाएंगे या परंपराओं में उलझकर रुक जाएंगे।

वेबसीरीज़ के गाने बेहतरीन लिखे गए हैं, जिनमें ‘घर आ माही’, ‘होल्डिंग ऑन’, ‘हिचकी 2.0’, ‘सुर ही परमात्मा’ और ‘निर्मोहिया’ खास तौर पर यादगार हैं। तमन्ना के ब्रेकअप का दर्द और उससे उबरने की प्रक्रिया संगीत के जरिए गहराई से उभरती है। कुल मिलाकर, संगीत और कहानी का तालमेल बेहतरीन है। बंदिश बैंडिट्स सीजन 2 संगीत की गहरी समझ के साथ क्लासिकल और पश्चिमी धुनों के गणित व डेटा साइंस के उपयोग को दर्शाता है। यह नई दुनिया को समझने और उसके साथ तार्किक रूप से चलने की दृष्टि देता है। नायिका तमन्ना की भावनात्मक मुक्ति और पुराने प्रेम से निकलकर नए प्रेम की ओर बढ़ने की कहानी स्त्री स्वतंत्रता का महत्वपूर्ण विमर्श रचती है। आनंद तिवारी, आत्मिका डिडवानिया और करण सिंह त्यागी ने वेबसीरीज़ को व्यापक वैचारिक फलक पर ले जाने का बेहतरीन काम किया है।

क्यों देखनी चाहिए ये वेबसीरीज़

इस वेबसीरीज़ सीरीज में सभी कलाकारों ने अच्छा अभिनय किया है। हालांकि कुछ जगहों पर थोड़ा-बहुत सपाटपन भी दिखा है। ये कहानी की लंबाई के कारण भी हो सकता है। लेकिन सबने अपने किरदारों के साथ न्‍याय किया है। तमन्ना के किरदार में श्रेया चौधरी ने कमाल का अभिनय किया है। नये समय, नये विचारों की आधुनिक लड़की जो बेहद संवेदनशील है लेकिन उतनी ही सशक्त भी है। राधे के किरदार में ऋत्विक भौमिक बढ़िया रहे। परम्परा और आधुनिकता का मिश्रण उनका अभिनय अपने कैरेक्टर में ढला हुआ लगा। मोहिनी देवी के किरदार में शीबा चड्ढा ने एकबार फिर कमाल कर दिखाया है। दर्शकों को मोहिनी देवी का पूरा व्यक्तित्व बहुत लुभाया।

उनका ये कहना कि ‘संगीत संगत से ही बनता है’ के जरिए साथ संगीत में सामूहिकता की भावना को बड़ी खूबसूरती से व्यक्त किया है। साथ ही इस वेबसीरीज़ में नया करेक्टर  दिव्या दत्ता बहुत ही आकर्षक दिखीं। इंसान को उसकी कमियों के साथ स्वीकारना, पितृसत्ता के अभ्यास में ढला मनुष्य कैसे न्यायबोध में पीछे रह जाता है, स्त्री के प्रेम में एकनिष्ठा और दैहिक पवित्रता जैसी बहसें अब बहुत पुरानी हो गयी हैं। परम्परा और आधुनिकता की सार्थक बहस और बढ़ते बाजार को बरतना सीखना होगा जैसी जरूरी बहसों के लिए वेबसीरीज़ सभी को एक बार जरूर देखनी चाहिए।

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