संस्कृतिसिनेमा ‘एडोलसेंस’: डिजिटल युग में किशोरों में बढ़ते स्त्रीद्वेष पर बात करती ज़रूरी सीरीज़

‘एडोलसेंस’: डिजिटल युग में किशोरों में बढ़ते स्त्रीद्वेष पर बात करती ज़रूरी सीरीज़

मुख्य किरदार जैमी अपनी सहपाठी केटी की हत्या कर देता है, लेकिन कारण स्पष्ट नहीं है—क्या यह उसके इंस्टाग्राम कमेंट से आहत होने का नतीजा था या जेंडर-विरोधी ऑनलाइन कंटेंट का प्रभाव? यह कहानी केवल ऑनलाइन बुलिंग की प्रतिक्रिया के रूप में नहीं, बल्कि एक डिजिटल माहौल में पनप रहे स्त्री-द्वेषी विचारों के विकास को दिखाती है।

चारों तरफ़ ब्रिटिश क्राइम ड्रामा सीरीज़ ‘एडोलसेंस’ की काफ़ी चर्चा हो रही है। एक ओर जहां ये नेटफ़्लिक्स सीरीज़ सारे रिकॉर्ड तोड़ रही है वहीं दूसरी ओर इस सीरीज़ ने शानदार अभिनय, लेखन और संवेदनशील तरीके से परिपक्व विषयों को पेश करने के लिए ख़ूब तारीफ़ बटोरी है। इसके साथ ही शो के मेकर्स की तकनीकी समझ की भी प्रशंसा बनती है। बीबीसी ब्रेकफ़स्ट में शो के निर्माता स्टीफ़न ग्राहम बताते हैं कि उन्होंने अख़बार में एक ख़बर पढ़ी थी, जिसमें एक लड़के ने एक लड़की की हत्या कर दी थी। तीन हफ़्ते बाद, वो न्यूज़ देख रहे थे और फिर एक ख़बर आई कि एक लड़के ने एक लड़की को चाकू मारकर हत्या कर दी। यह सुनकर उनका दिल टूट गया। उन्होंने सोचा कि आख़िर समाज में ऐसा क्या हो रहा है कि इस तरह की घटनाएं आम होती जा रही हैं? उनके समझ ये नहीं आ पाया। इसलिए वो मैं इस विषय को गहराई से देखना चाहता था और इसपर रोशनी डालना चाहते थे।

शो बेशक किसी असल घटना पर आधारित नहीं है पर इसकी उपज असल घटना से ही हुई है। स्टीफ़न ग्राहम बताते हैं कि यह किसी के साथ भी हो सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कोई भी जैमी जैसा बन सकता है। यह उन माता-पिता की कहानी है जिन्होंने उसे नहीं देखा, उस स्कूल सिस्टम की जो उसे समझने में विफल रहा, और उन विचारों की, जिन्हें उसने अपनाया। यह एक आम परिवार की कहानी है, एक आम दुनिया की और यह डराने वाली बात है कि आज के समय में क्या-क्या संभव हो सकता है। शो के रिलीज़ के बाद से ही इनसेल कल्चर, सोशल मीडिया के दौर में बढ़ते टॉक्सिक मैस्क्युलिनिटी और महिलाओं के प्रति बढ़ती हिंसा आम लोगों के बीच चर्चा का हिस्सा बनी हुई है। यह सीरीज़ जेंडर, हिंसा और युवाओं के डिजिटल रेडिकलाइज़ेशन पर एक गहरा चिंतन प्रस्तुत करती है। यह डॉक्यू-ड्रामा  स्टाइल की सीरीज़ दिखाती है कि कैसे टॉक्सिक मैस्क्युलिनिटी और ऑनलाइन स्त्री-विरोधी मानसिकता आम किशोरों की घबराहट और असुरक्षा को घातक हिंसात्मक व्यवहार में बदल सकती है।

शो के रिलीज़ के बाद से ही इनसेल कल्चर, सोशल मीडिया के दौर में बढ़ते टॉक्सिक मैस्क्युलिनिटी और महिलाओं के प्रति बढ़ती हिंसा आम लोगों के बीच चर्चा का हिस्सा बनी हुई है। यह सीरीज़ जेंडर, हिंसा और युवाओं के डिजिटल रेडिकलाइज़ेशन पर एक गहरा चिंतन प्रस्तुत करती है।

क्या है कहानी

तस्वीर साभार: India Today

सीरीज़ की कहानी 13 वर्षीय जैमी मिलर (ओवेन कूपर) के इर्द-गिर्द घूमती है जिसे अपनी सहपाठी केटी की हत्या के आरोप में गिरफ़्तार किया जाता है। पूरी सीरीज़ में अपनाई गई कंटीन्यूअस फ़िल्मिंग तकनीक एक तनावपूर्ण माहौल तैयार करती है जो आज की डिजिटल दुनिया के जंजाल से न बच पाने को बख़ूबी दिखाती है। वही स्पेस जहां आज किशोर अपनी पहचान गढ़ते हैं। शो का ये तकनीकी पहलू कहानी के विषयों को और ज़्यादा प्रभावी बना देता है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि डायनेमिक कैमरावर्क और एक रोचक प्रासंगिक कहानी के साथ यह शो अब तक 2025 के सबसे लोकप्रिय शो में से एक बन गया है। यह नेटफ़्लिक्स की टॉप रेटिंग लिस्ट में 71 देशों में नंबर 1 पर है।

किशोरों में बढ़ता स्त्रीद्वेषी 

सीरीज़ का सबसे प्रभावशाली तीसरा एपिसोड है, जो जैमी और चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट ब्रायनी एरिस्टन (एरिन डोहर्टी) के बीच  52 मिनट की लंबी बातचीत को दिखाता है। चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट जो यह समझने की कोशिश कर रही है कि आख़िर जैमी ने हत्या क्यों की? यह ‘किसने किया’ की कहानी नहीं, बल्कि ‘क्यों किया’ की पड़ताल करती है। ये एपिसोड सीरीज़ की कहानी को महज़ एक सनसनीख़ेज़ ट्रू-क्राइम ड्रामा बनने से बचाकर किशोरों की मानसिकता की पड़ताल में बदल देती है। एक ऐसी पड़ताल जो यह दिखाती है कि कैसे लड़कों में, ख़ासकर किशोरों में स्त्रीद्वेषी सोच विकसित होती है। बाक़ी सीरीज़ जहां दर्शकों को झकझोरने के लिए चौंकाने वाले एलिमेंट्स या घटनाओं का सहारा लेती है, वहीं एडोलसेंस दर्शकों को असहज करने वाली उस सच्चाई को देखने पर मजबूर कर देती है जिसमें स्त्री-विरोधी मानसिकता को वास्तविक समय में बनते हुए दिखाया गया है।

सीरीज़ की कहानी 13 वर्षीय जैमी मिलर (ओवेन कूपर) के इर्द-गिर्द घूमती है जिसे अपनी सहपाठी केटी की हत्या के आरोप में गिरफ़्तार किया जाता है। पूरी सीरीज़ में अपनाई गई कंटीन्यूअस फ़िल्मिंग तकनीक एक तनावपूर्ण माहौल तैयार करती है जो आज की डिजिटल दुनिया के जंजाल से न बच पाने को बख़ूबी दिखाती है।

पहले एपिसोड में जब जैमी को अपने ‘अप्रोप्रियेट एडल्ट’ (वह व्यक्ति जो पूछताछ के दौरान उसके साथ रहेगा) को चुनने कहा जाता है तो वह बिना किसी झिझक के अपने पिता ऐडी (स्टीफ़न ग्राहम) को चुनता है। नतीजन उसकी ज़िन्दगी में सबसे करीबी महिला शख़्सियत; उसकी मां (क्रिस्टीन ट्रेमार्को) का ज़्यादा ज़िक्र नहीं किया जाता। इसके बजाय, फ़ोकस जैमी और उसके पिता के रिश्ते पर रहता है जोकि इसका एक उदाहरण है कि उसके लिए ‘एक मर्द’ होने का क्या मतलब है। सीरीज़ में कई सूक्ष्म बारीकियां हैं जिन पर कम ही लोगों का ध्यान गया होगा। ये वे डिटेल्स हैं जो सोचने पर मजबूर करते हैं कि क्या वाक़ई ये सीरीज़ महिलाओं के मुद्दों को इतनी सशक्त तरीके से उठा पाई है?

क्या महिलाओं के मुद्दों पर सख्ती से बात करती है सीरीज़?

तस्वीर साभार: USA Today

इस शो के भीतर और ये शो देख रहे माता-पिता अपनी पेरेंटिंग को लेकर काफ़ी सजग होकर सोचना शुरू करते हैं। ठीक ऐसे जैसे सीरीज़ में इन्वेस्टिगेशन ऑफ़िसर DI ल्यूक बैसकॉम्बे (एशली वॉल्टर्स) भी अपने बेटे से अपने रिश्ते को लेकर चिंतित है। एक सीन में वह यह सोचता हुआ नज़र आता है कि क्या वह एक अच्छा पिता है? सीरीज़ महिलाओं के बारे में भी काफ़ी बारीकी से बात करती है। जब शिक्षक मिसेज़ फ़ेनुमोर (जो हार्टली) पुलिस टीम को क्लासरूम में स्टूडेंट्स से मिलवाती हैं, तो वह बैसकॉम्बे की जूनियर कॉलिग DS फ़्रैक को संबोधित करना ही भूल जाती हैं। यह कामकाजी जगह में कई महिलाओं के लिए एक जाना-पहचाना अनुभव हो सकता है। लेकिन इस अनदेखी के बावजूद, सीरीज़ में फ़्रैक की उपस्थिति बेहद अहम है। उसी के ज़रिए बैसकॉम्बे और साथ ही दर्शक भी इस सच्चाई को समझते हैं कि किस तरह महिलाओं को अक्सर अपनी ही कहानी में फुटनोट बना दिया जाता है। फ़्रैक का बैसकॉम्बे के साथ वो पूरा संवाद सच में काफ़ी ज़रूरी डिस्कोर्स शुरू करता है, जिस पर आप एक सिरे से सोचना शुरू करते हैं। 

सीरीज़ महिलाओं के बारे में भी काफ़ी बारीकी से बात करती है। जब शिक्षक मिसेज़ फ़ेनुमोर (जो हार्टली) पुलिस टीम को क्लासरूम में स्टूडेंट्स से मिलवाती हैं, तो वह बैसकॉम्बे की जूनियर कॉलिग DS फ़्रैक को संबोधित करना ही भूल जाती हैं। यह कामकाजी जगह में कई महिलाओं के लिए एक जाना-पहचाना अनुभव हो सकता है।

जैसाकि असल दुनिया में महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा को लेकर चर्चाएं होती हैं, यहां भी आरोपी का नाम पूरे विमर्श पर हावी रहता है। उस घटना के बारे में बात की जाती है, जिसने एक महिला की ज़िन्दगी ले ली, लेकिन ख़ुद उस महिला के बारे में हमें ज़्यादा पता नहीं चलता। सीरीज़ जानबूझकर यह करती है और इस प्रक्रिया में वास्तविकता को हमारे सामने आईने की तरह रखने की कोशिश करती है। महिला चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट ब्रायनी एरिस्टन को जैमी का मूल्यांकन करने के लिए नियुक्त किया जाता है। एरिस्टन के पास डिग्री, अनुभव और प्रशिक्षण है, जिससे वो एक हत्या के आरोपी का मानसिक विश्लेषण कर सके।

वो एक प्रशिक्षित पेशेवर है। लेकिन जब वो जेल के पुरुष गार्ड से पूछती है कि क्या वो इन्वेस्टिगेशन रूम की रिकॉर्डिंग देख सकती है, तो वो तुरंत ‘बॉडी लैंग्वेज’ पर अपनी जानकारी की डींगें हांकने लगता है। वो बड़े गर्व से उसे बताने लगता है कि उसने इसपर एक किताब पढ़ी है। हालांकि सीरीज़ में आख़िर में वह कहता है कि एरिस्टन को कहता है कि उसे यह बताने की ज़रूरत नहीं थी। हां, सच में समाज में महिलाओं को ऐसी चीजों की ज़रूरत नहीं है।

कैसा रहा अभिनय

सीरीज़ को इसकी बेहतरीन अदाकारी और तकनीकी श्रेष्ठता के लिए ज़बरदस्त सराहना मिल रही है। सीरीज़ को बनाने की शैली के कारण फ़िल्म निर्माताओं में भी इसकी काफ़ी चर्चा है। अक्सर दर्शक लॉन्ग शॉट्स देखते हैं, पर इस सीरीज़ में हर एपिसोड सिंगल शॉट में है। बिना कट, एडिटिंग या CGI की मदद से 50 से 55 मिनट लम्बे एपिसोड को रिकॉर्ड किया गया है। सीरीज़ के पहले एपिसोड को बनाने में 2 टेक, दूसरे एपिसोड में 13 टेक, तीसरे एपिसोड में 11 टेक और आख़री एपिसोड में 16 टेक लगे हैं। यह डॉक्यूड्रामा-स्टाइल नैचुरलिज़्म को अपनाती है, जिसे कलाकारों की ज़बरदस्त अभिनय और शानदार बना देती है। सीरीज़ के सभी क़िरदार अपने अभिनय को बख़ूबी निभाते हैं। जैमी मिलर के पिता का क़िरदार निभाने वाले स्टीफ़न ग्राहम अपने अभिनय से दर्शकों तक अपना दुख, झुंझलाहट और चिंता बख़ूबी दिखाते हैं। बैकग्राउन्ड स्कोर की बात की जाए तो वो दर्शकों के साथ हर दृश्य को जोड़ने में सफ़ल होती है। सीरीज़ का पेस काफ़ी तेज़ है जो दर्शकों को बांधे रखती है और लगभग सारी जानकारी होने के बावजूद दर्शकों में वो थ्रिल बना रहता है।

अक्सर दर्शक लॉन्ग शॉट्स देखते हैं, पर इस सीरीज़ में हर एपिसोड सिंगल शॉट में है। बिना कट, एडिटिंग या CGI की मदद से 50 से 55 मिनट लम्बे एपिसोड को रिकॉर्ड किया गया है। सीरीज़ के पहले एपिसोड को बनाने में 2 टेक, दूसरे एपिसोड में 13 टेक, तीसरे एपिसोड में 11 टेक और आख़री एपिसोड में 16 टेक लगे हैं।

डिजिटल मैनोस्फ़ेयर में महिलाओं का वस्तुकरण

तस्वीर साभार: USA Today

यह सीरीज़ बेबाकी से दिखाती है कि कैसे डिजिटल स्पेस युवा लड़कों को स्त्री-विरोधी विचारधाराओं की ओर धकेल सकता है। आमतौर पर, स्त्री-द्वेषी पुरुषों को किसी ट्रॉमा या घटना से प्रभावित दिखाया जाता है, लेकिन यह कहानी बताती है कि एक सामान्य लड़का भी ऑनलाइन इंसेल संस्कृति से प्रभावित होकर स्त्री-द्वेषी बन सकता है। ‘रेड पिल’ जैसी विचारधाराएं पुरुषों में महिलाओं के प्रति हक़ और आक्रोश की भावना भरती हैं। शो इस धारणा को तोड़ता है कि स्त्री-द्वेष केवल मानसिक रूप से परेशान पुरुषों की समस्या है। यह दिखाता है कि यह एक सामाजिक संरचना का हिस्सा है, जहां महिलाओं के प्रति हिंसा को सामान्य बना दिया गया है।

यह सीरीज़ बेबाकी से दिखाती है कि कैसे डिजिटल स्पेस युवा लड़कों को स्त्री-विरोधी विचारधाराओं की ओर धकेल सकता है। आमतौर पर, स्त्री-द्वेषी पुरुषों को किसी ट्रॉमा या घटना से प्रभावित दिखाया जाता है, लेकिन यह कहानी बताती है कि एक सामान्य लड़का भी ऑनलाइन इंसेल संस्कृति से प्रभावित होकर स्त्री-द्वेषी बन सकता है।

मुख्य किरदार जैमी अपनी सहपाठी केटी की हत्या कर देता है, लेकिन कारण स्पष्ट नहीं है—क्या यह उसके इंस्टाग्राम कमेंट से आहत होने का नतीजा था या जेंडर-विरोधी ऑनलाइन कंटेंट का प्रभाव? यह कहानी केवल ऑनलाइन बुलिंग की प्रतिक्रिया के रूप में नहीं, बल्कि एक डिजिटल माहौल में पनप रहे स्त्री-द्वेषी विचारों के विकास को दिखाती है। सीरीज़ यह भी उजागर करती है कि सबसे खतरनाक जगह किसी किशोर के लिए उसका अकेला कमरा हो सकता है। सोशल मीडिया और एल्गोरिदम ऐसे एकांत में बैठे लड़कों को कट्टर विचारों की ओर धकेल सकते हैं, खासकर जब वे समाज में अपनी जेंडर-आधारित स्थिति समझने की कोशिश कर रहे होते हैं।

भारत में टॉक्सिक मैस्क्युलिनिटी और डिजिटल स्पेस

भारत में टॉक्सिक मैस्क्युलिनिटी एक गंभीर समस्या है। अख़बारों में बलात्कार, घरेलू हिंसा, यौन हिंसा और एसिड अटैक की ख़बरें आम हैं। सोशल मीडिया पर इंसेल ग्रुप्स और मीम कल्चर इसे और बढ़ावा देते हैं, जहां महिलाओं को वस्तु की तरह पेश किया जाता है। ऑनलाइन स्पेस में लड़कों में कट्टरता तेज़ी से बढ़ रहा है। लेकिन, इसके समाधान पर बात करने के बजाय अक्सर विक्टिम-ब्लेमिंग शुरू हो जाती है या अपराधियों का बचाव किया जाता है। कोर्ट के अनेकों फैसले भी इसी सोच को बताते हैं। भारतीय सिनेमा पर टॉक्सिक मैस्क्युलिनिटी को बढ़ावा देने का आरोप लगता है। इस समस्या को खत्म करना आसान नहीं, लेकिन बेहद ज़रूरी है। हमें एक ऐसा माहौल बनाना होगा जहां पुरुषत्व की पहचान हिंसा और स्त्री-द्वेष से न होकर, सम्मान, समानता और संवेदनशीलता से हो।

About the author(s)

 I'm Sonali Rai, a student of Hindi Language & Literature, a Journalist by heart and a poet by soul. I firmly believe in Sahir Ludhianvi's very famous sher: “le de ke apne paas faqat ik nazar to hai kyun dekhen zindagi ko kisi ki nazar se ham”

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