भारतीय समाज में जाति केवल एक पहचान नहीं, बल्कि कई लोगों के लिए एक ऐसी हकीकत है जो उनके सपनों, रिश्तों और भविष्य को तय करती है। इसी कड़वी सच्चाई पर आधारित ‘फेंड्री’ साल 2014 की जातिगत भेदभाव और अंतर्जातीय प्रेम पर बनी एक मराठी ड्रामा फिल्म है, जिसे नागराज मंजुले ने लिखा और निर्देशित किया है, जो सामाजिक विषयों पर अपनी बेबाक प्रस्तुति के लिए जाने जाते हैं। इस फिल्म में सोमनाथ अवघड़े और राजेश्वरी खरात मुख्य भूमिकाओं में हैं। यह फिल्म सामाजिक भेदभाव को केंद्र में रखकर बनाई गई है। इसकी कहानी हाशिए पर रहने वाले समुदाय के एक किशोर लड़के के आस पास घूमती है, जो गंभीर सामाजिक भेदभाव और हिंसा का सामना करते हुए अपने ही कक्षा की एक ऊंची जाति की लड़की से प्यार कर बैठता है, जो सामाजिक समस्याओं और परंपराओं को बड़े पर्दे पर दिखाता है।
शुरुआती फिल्मों में जातिवाद जैसे विषयों को ज्यादा खुलकर नहीं दिखाया जाता था। उस दौर की फिल्में खासतौर पर मनोरंजन पर केंद्रित होती थीं। फिर भी अछूत कन्या जैसी फिल्मों में पहली बार अस्पृश्यता और अंतर्जातीय प्रेम संबंधों को दिखाने की कोशिश की गई।इससे यह समझ में आया कि सिनेमा समाज की सच्चाई भी दिखा सकता है। लेकिन आज के समय में आधुनिक भारतीय सिनेमा में जातिवाद और अन्य संवेदनशील विषय पहले से अधिक खुलकर दिखाए जा रहे हैं। जैसे सैराट, आर्टिकल 15 और मसान जैसी फिल्मों ने यह दिखाया है कि जातिवाद आज भी समाज में मौजूद है। खासतौर पर फैंड्री जैसी फिल्में समाज की रूढ़िवादिता और जातिवाद जैसी सच्चाइयों को बहुत ही प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत करती हैं। यह फिल्म बताती है कि जातिवाद बस एक सामाजिक समस्या नहीं है, बल्कि शुरू से चलती आ रही रूढ़िवादी मानसिकता है, जो लोगों के व्यवहार को प्रभावित करती है।
‘फेंड्री’ साल 2014 की जातिगत भेदभाव और अंतर्जातीय प्रेम पर बनी एक मराठी ड्रामा फिल्म है, जिसे नागराज मंजुले ने लिखा और निर्देशित किया है, जो सामाजिक विषयों पर अपनी बेबाक प्रस्तुति के लिए जाने जाते हैं।
बचपन, प्रेम और जातिगत तिरस्कार का बोझ
फेंड्री मराठी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ सूअर यानी पिग होता है। यह एक मराठी फिल्म है, जो महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव में रहने वाले किशोर ‘जब्या’ के जीवन के इर्द-गिर्द घूमती है। जब्या का परिवार कैकाड़ी (दलित) समुदाय से संबंध रखता है, जिसे पारंपरिक रूप से समाज के हाशिए पर रखा गया है। फिल्म में दो अलग – अलग मानसिकता के लोग दिखाए गए हैं, एक सूअर के छूने मात्र से नहाने वाले लोग और दूसरे सूअर किसी को छू ना दे, इसलिए उसको पकड़ने वाले लोग। जब्या अपने परिवार के साथ रहता है जो आर्थिक रूप से कमजोर होते है, और उन्हें गाँव के कथित ऊंची जाति के लोगों के आज्ञा पर सूअर पकड़ने का काम करने पड़ता हैं। ये काम अपमानजनक और तिरस्कार का जरूर है। लेकिन उनकी मजबूरी होती है क्योंकि इसके अलावा उनके पास रोजगार का कोई अन्य साधन नहीं होता। परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति के बावजूद जब्या का स्कूल जाना उसकी महत्वाकांक्षा को दिखाता है। बाकी बच्चों की तरह उसके भी सपने हैं।
वह पढ़-लिखकर कुछ बनना चाहता है और अपनी सामाजिक और आर्थिक स्थिति को बदलने की इच्छा रखता है। लेकिन स्कूल जैसा स्थान, जो समानता और सीखने का प्रतीक माना जाता है, वहां भी उसे भेदभाव का सामना करना पड़ता है। अन्य बच्चे उसे उसके नाम से नहीं बल्कि उसकी जाति के नाम से पुकारते हैं और उसे अलग नजरों से देखते हैं, जिससे उसके आत्मसम्मान और आत्मविश्वास पर गहरा असर पड़ता है। जब्या को अपनी ही कक्षा की एक लड़की शालू से प्यार हो जाता है, जो कथित ऊंची जाति से संबंध रखती है।वह यह अच्छी तरह से जानता है कि उसका यह प्रेम कभी पूरा नहीं हो पाएगा, फिर भी वह अपने भावनाओं को रोक नहीं पाता। शालू का दिल जीतने की कोशिश में वह खुद को बदलने लगता है। कभी साफ-सुथरे कपड़े पहनता है, तो कभी अपने व्यवहार और व्यक्तित्व को अलग दिखाने की कोशिश करता है। लेकिन उसके ये प्रयास उस कठोर सामाजिक सच्चाई से टकराते हैं, जहां जाति उसकी पहचान से अलग नहीं हो पाती।
जब्या को अपनी ही कक्षा की एक लड़की शालू से प्यार हो जाता है, जो कथित ऊंची जाति से संबंध रखती है।वह यह अच्छी तरह से जानता है कि उसका यह प्रेम कभी पूरा नहीं हो पाएगा, फिर भी वह अपने भावनाओं को रोक नहीं पाता। शालू का दिल जीतने की कोशिश में वह खुद को बदलने लगता है।
एकतरफा प्यार और जातिगत दीवार
फिल्म में जब्या को एक काली चिड़िया का पीछा करते हुए दिखाया गया है। उसे विश्वास होता है कि अगर वह उस चिड़िया को पकड़कर उसकी राख शालू के सिर पर लगा दे, तो वह हमेशा के लिए उसकी हो जाएगी। इसी विश्वास में वह बार-बार उस चिड़िया को पकड़ने की कोशिश करता है। लेकिन हर बार असफल रहता है। असल में वो चिड़िया उसकी उम्मीद और प्यार का प्रतीक है। शालू, जब्या की तरफ कोई आकर्षण नहीं दिखाती, इसलिए नहीं कि वो उसे पसंद नहीं करती, बल्कि इसलिए क्योंकि उनके बीच पहले से ही जातियों की दीवार है।इस तरह ये फिल्म दिखाती है कि हमारे समाज में आज भी प्रेम पूरी तरीके से आज़ाद नहीं है, इसका फैसला आज भी समाज के हाथों में है, कि कौन किससे प्यार कर सकता है और किस से नहीं।
जब्या के परिवार के सदस्य ग्रामीणों के बार-बार किए जाने वाले शोषण और अमानवीय व्यवहार को सहते रहते हैं। उसकी बहन के लिए शादी का प्रस्ताव आता है और उसके पिता दूल्हे के परिवार को 20,000 रुपये दहेज देने के लिए सहमत हो जाते हैं, जिससे परिवार पर आर्थिक बोझ और बढ़ जाता है। एक दिन कथित ‘स्वर्ण’ समुदाय के लोग उसके परिवार को सबके सामने सूअर पकड़ने के लिए मजबूर करते हैं। मजबूरी में वह भी इस काम में शामिल होता है, और उसी दौरान शालू और स्कूल के बाकी बच्चे उसे इस हालत में देख लेते हैं। उसके लिए ये बेहद शर्मनाक होता है, उसका आत्मविश्वास और सम्मान टूट जाता है। इसके साथ ही उसका गुस्सा, और उसका दर्द एक साथ बाहर आता है।लंबे समय से दबा हुआ उसका गुस्सा और दर्द आखिरकार फूट पड़ता है। अंत में वह एक पत्थर उठाकर भीड़ की ओर फेंकता है। यह पत्थर केवल लोगों पर नहीं, बल्कि उस पूरी जातिगत व्यवस्था पर एक प्रतिरोध है, जिसने उसे हमेशा नीचा दिखाया और उसके अस्तित्व को अपमानित किया।
एक दिन कथित ‘स्वर्ण’ समुदाय के लोग उसके परिवार को सबके सामने सूअर पकड़ने के लिए मजबूर करते हैं। मजबूरी में वह भी इस काम में शामिल होता है, और उसी दौरान शालू और स्कूल के बाकी बच्चे उसे इस हालत में देख लेते हैं। उसके लिए ये बेहद शर्मनाक होता है, उसका आत्मविश्वास और सम्मान टूट जाता है।
आधुनिक समय में जातिवाद की हकीकत
एक ओर जहां भारत को प्रगतिशील और आधुनिक देश के रूप में देखा जा रहा है। टेक्नोलॉजी और शिक्षा का विकास हो रहा है, बराबरी और समानता की भी बातें होती हैं।अगर हम ध्यान से देखें, तो पता चलता है कि जातिगत भेदभाव आज भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। आज भी कई जगहों पर लोगों का काम उनकी जाति और धर्म के आधार पर तय होता है। उन्हें वही काम करने के लिए मजबूर किया जाता है, जो उनके पूर्वज करते आए हैं। समाज में उन्हें बराबरी का दर्जा नहीं मिलता और जाति की वजह से उन्हें अपमान भी सहना पड़ता है।
व्यक्ति का सरनेम और बैकग्राउंड आज भी उनको जज करने का मानक है। नौकरी या किराए पर घर देते समय भी लोगों की जाति और उसके धर्म को ध्यान में रखा जाता है। ये उदाहरण बताता है कि समाज में जाति की प्राथमिकता आज भी है। इसका असर रिश्तों में भी देखने को मिलता है, आज भी बहुत सारे परिवार अंतर्जातीय विवाह को स्वीकार नहीं करते। अगर कोई अलग जाति के व्यक्ति से शादी करना चाहते हैं, तो उन्हें परिवार और समाज दोनों का विरोध झेलना पड़ता है और कई बार रिश्ते टूट जाते हैं या लोगों को अपनी जान तक गंवानी पड़ती है। इस फिल्म में इस सच्चाई को बहुत बारीकी से दिखाया गया है।
लंबे समय से दबा हुआ उसका गुस्सा और दर्द आखिरकार फूट पड़ता है। अंत में वह एक पत्थर उठाकर भीड़ की ओर फेंकता है। यह पत्थर केवल लोगों पर नहीं, बल्कि उस पूरी जातिगत व्यवस्था पर एक प्रतिरोध है, जिसने उसे हमेशा नीचा दिखाया और उसके अस्तित्व को अपमानित किया।
खामियों के बावजूद असरदार फिल्म
इस फिल्म को एमएएमआई फिल्म महोत्सव में ग्रैंड जूरी पुरस्कार मिला। इसके साथ ही यह फिल्म साल 2014 में वैलेंटाइन डे के दिन सिनेमाघरों में रिलीज हुई। इसके अलावा, 61वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में इसे सर्वश्रेष्ठ पहली फिल्म के लिए इंदिरा गांधी पुरस्कार भी मिला। लेकिन कुछ बिंदुओं पर काम करके फिल्म को और संतुलित किया जा सकता था। फिल्म के कुछ सीन्स को कई जगहों पर बहुत लंबा चलाया गया है। उसको छोटा कर के उसमें और मुद्दे जोड़े जा सकते थे। एक ही सीन इतना लंबा खींचना कुछ दर्शकों के लिए बोरिंग हो सकता है। इसके साथ ही फिल्म में शालू के दृष्टिकोण की कमी है। फिल्म में संवाद की बहुत कमी है, हालांकि ये इस फिल्म की खासियत है।
किरदारों के भाव और शब्द थोड़ी और स्पष्टता से बताए और दिखाए जाते तो फिल्म सबके दिलों को छू सकती थी और ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंच सकती थी। इसके बावजूद भारतीय सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज की सच्चाइयों को उजागर करने का माध्यम भी है। फेंड्री केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि समाज की उस कड़वी सच्चाई का आईना है, जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। जब्या के हाथ में उठा पत्थर केवल उसका गुस्सा नहीं, बल्कि उस जातिगत व्यवस्था के खिलाफ एक तीखा प्रतिरोध है, जो आज भी लोगों की पहचान और रिश्तों को तय करती है। यह फिल्म हमारी सोच को एक नई दिशा देती है और हमें खुद से सवाल करने पर विवश कर देती है कि क्या हम सच में किसी व्यक्ति को उसके काम और जाति के आधार पर ही जज करते रहेंगे।

