संस्कृतिसिनेमा ‘अछूत कन्या’: जातिवाद और पितृसत्ता पर सवाल खड़े करती जरूरी फिल्म

‘अछूत कन्या’: जातिवाद और पितृसत्ता पर सवाल खड़े करती जरूरी फिल्म

फिल्म सिर्फ एक प्रेम कहानी ही नहीं दिखाती है, बल्कि तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था, जाति के बंधनों और उन्हें चुनौती देती दोस्ती को भी सामने लाती है। फिल्म अछूत कन्या सिर्फ एक प्रेम कहानी नहीं है, बल्कि समाज की सच्चाई को दिखाने वाली फिल्म है।

भारतीय समाज में सालों से शामिल जाति व्यवस्था और जाति के आधार पर भेदभाव चला आ रहा है, जो आज तक पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है। हमारे समाज में जाति व्यवस्था की जड़े इतनी मजबूत है कि आने वाले दिनों में भी समाज से जाति आधारित भेदभाव के खत्म होने की संभावनाएं धुंधली है। सालों से जातिवाद जैसे सामाजिक दंश को झेल रहे हाशिए के समुदाय के लोग आज भी वहीं खड़े हैं। हालांकि जातिवाद जैसी सामाजिक कुरीतियों को जड़ से मिटने के लिए कई समाज–सुधारवादी प्रयास किए गए है। इस सुधारवादी प्रयासों में फिल्मों के जरिए समाज में बदलाव लाने जैसी कोशिशें भी शामिल है। वर्तमान में मसान, धड़क 2, आर्टिकल 15, जय भीम, सद्गति, अंकुर और सुजाता जैसी अनेक फिल्मों के उदाहरण मौजूद है।

लेकिन साल 1936 में बॉम्बे टॉकीज के बैनर तले फ्रांज ऑस्टिन की निर्देशित फिल्म ‘अछूत कन्या’ भारतीय सिनेमा के लिए मिल का पत्थर साबित हुई। यह फिल्म उस दौर की क्रांतिकारी फिल्म थी, जब दलित समुदाय के साथ हो रहा अन्याय अपनी चरम सीमा पर था। उस दौर में जातिवाद जैसे संवेदनशील मुद्दे पर फिल्म बनाना अपनेआप में एक साहसिक कदम था। यह फिल्म न केवल जातिवाद बल्कि तत्कालीन समय के सामाजिक ताने-बाने को भी बखूबी दिखाती है। साथ ही अंतरजातीय विवाह के रास्ते में खड़े सामाजिक रोड़े और उस जमाने में अंतरजातीय शादी के समर्थन में खड़े लोगों का समाज किस प्रकार परेशान करता था, उसे चित्रित किया गया है। उस दौर के भारतीय समाज में अंतरजातीय विवाह को किसी पाप या गुनाह की तरह माना जाता था, जो आज भी बहुत हद तक कायम है। 

साल 1936 में बॉम्बे टॉकीज के बैनर तले फ्रांज ऑस्टिन की निर्देशित फिल्म ‘अछूत कन्या’ भारतीय सिनेमा के लिए मिल का पत्थर साबित हुई। यह फिल्म उस दौर की क्रांतिकारी फिल्म थी, जब दलित समुदाय के साथ हो रहा अन्याय अपनी चरम सीमा पर था।

क्या है कहानी

अछूत कन्या एक प्रेम कहानी है, जिसमें सवर्ण युवक प्रताप और दलित समुदाय से आने वाली कस्तूरी के रिश्ते को दिखाया गया है। दोनों एक-दूसरे से प्रेम करते हैं, लेकिन समाज के कठोर जातिगत नियमों के कारण उनका यह प्रेम पूरा नहीं हो पाता। फिल्म की कहानी कथित ऊंची जाति के नजरिए से कही गई है, जो जातिवाद पर सवाल तो उठाती है, लेकिन उसे पूरी तरह चुनौती नहीं देती। कहानी की शुरुआत कस्तूरी को एक बलिदानी नायिका के रूप में दिखाकर होती है, और फिर उसके जीवन की कहानी सामने आती है। प्रताप और कस्तूरी बचपन के दोस्त होते हैं। लेकिन, बड़े होने पर समाज के नियम उन्हें अलग कर देते हैं। कस्तूरी एक अहम सवाल उठाती है कि अगर बचपन में साथ खेलना गलत नहीं था, तो बड़े होकर साथ रहना गलत क्यों है? लेकिन उसे इसका कोई जवाब नहीं मिलता।

फिल्म में कस्तूरी को एक समझदार और समाज के नियमों को मानने वाली लड़की के रूप में दिखाया गया है। एक दृश्य में, जब प्रताप की माँ कस्तूरी के हाथ का खाना खाने पर नाराज़ होती है, तो कस्तूरी वादा करती है कि वह दोबारा ऐसा नहीं करेगी। वहीं, जब प्रताप उससे भाग जाने की बात करता है, तो कस्तूरी उसे मना कर देती है। वह उसे याद दिलाती है कि वह ‘अछूत’ है और प्रताप स्वर्ण जाति से है। इसलिए, उनका साथ संभव नहीं है। हालांकि अंत में, दोनों अपने-अपने समाज के अनुसार शादी कर लेते हैं और उस रिश्ते को निभाने की कोशिश करते हैं। लेकिन, सफल नहीं हो पाते। इस तरह फिल्म प्रेम और त्याग की कहानी तो दिखाती है, लेकिन समाज के बनाए नियमों को तोड़ने की हिम्मत नहीं दिखा पाती।

फिल्म में कस्तूरी को एक समझदार और समाज के नियमों को मानने वाली लड़की के रूप में दिखाया गया है। एक दृश्य में, जब प्रताप की माँ कस्तूरी के हाथ का खाना खाने पर नाराज़ होती है, तो कस्तूरी वादा करती है कि वह दोबारा ऐसा नहीं करेगी।

दो पिताओं के बीच दोस्ती और समाज का डर  

फिल्म में नायक और नायिका के पिता मोहनलाल और दुखिया के बीच गहरी दोस्ती दिखाई गई है। यह दोस्ती तब शुरू होती है जब कस्तूरी के पिता दुखिया, प्रताप के पिता मोहनलाल की जान बचाते हैं। इसे शुरुआत में एक उपकार और दया के रूप में दिखाया गया है, लेकिन समय के साथ उनकी दोस्ती और मजबूत होती जाती है। कहानी में कई ऐसे मौके आते हैं, जहां उनकी दोस्ती की परीक्षा होती है। दोनों अपने बच्चों, प्रताप और कस्तूरी, की शादी करना चाहते हैं, लेकिन समाज के डर से इस विचार को छोड़ देते हैं। एक बार जब दुखिया बीमार पड़ जाता है, तो मोहनलाल उसे अपने घर लाकर उसकी देखभाल करता है।

यह बात गाँव के लोगों को पसंद नहीं आती। वे विरोध करते हुए मोहनलाल के घर पर हमला कर देते हैं, उसका सिर फोड़ देते हैं और घर में आग लगा देते हैं। इसके बावजूद मोहनलाल अपने दोस्त का साथ नहीं छोड़ता और समाज के खिलाफ खड़ा रहता है। दुखिया भी अपनी दोस्ती पूरी ईमानदारी से निभाता है। अपनी खराब तबीयत के बावजूद वह इलाज के लिए शहर जाने की कोशिश करता है और इस दौरान रेलवे के नियम तोड़ देता है, जिससे वह बुरी तरह घायल हो जाता है। इस तरह, दुखिया और मोहनलाल की दोस्ती उस समय में एक ब्राह्मण और एक “अछूत” के बीच सच्ची मित्रता की मजबूत मिसाल बनकर सामने आती है।

फिल्म उस समय की सामाजिक व्यवस्था के बारे में बहुत कुछ बताती है और अपने किरदारों के जरिए समाज के ढांचे को चुनौती भी देती है। उदाहरण के लिए, प्रताप के पिता सवर्ण हैं पर पंडित या पुरोहित नहीं हैं, बल्कि उन्हें एक व्यापारी के रूप में दिखाया गया है।

सामाजिक ढांचे को चुनौती और मानवीय रिश्तों की झलक

फिल्म उस समय की सामाजिक व्यवस्था के बारे में बहुत कुछ बताती है और अपने किरदारों के जरिए समाज के ढांचे को चुनौती भी देती है। उदाहरण के लिए, प्रताप के पिता सवर्ण हैं पर पंडित या पुरोहित नहीं हैं, बल्कि उन्हें एक व्यापारी के रूप में दिखाया गया है। यह उस दौर की तय भूमिकाओं से अलग एक सोच को सामने लाता है। जब जाति आधारित भेदभाव बहुत ज्यादा था, तब फिल्म में कथित ऊंची और नीची जाति के बीच गहरी दोस्ती को दिखाया गया है। यह अपने आप में एक साहसिक बात थी।

दुखिया और मोहनलाल की दोस्ती इस बात का उदाहरण है कि इंसानियत जाति से बड़ी हो सकती है। फिल्म में गाँव के लोगों के बीच सहयोग की भावना भी बहुत खूबसूरती से दिखाई गई है। एक दृश्य में, जब किसी के घर मेहमान आते हैं, तो मोहल्ले की सभी महिलाएं मिलकर घर के कामों में मदद करती हैं। इससे उस समय के सामूहिक जीवन और आपसी सहयोग की झलक मिलती है। फिल्म सिर्फ एक प्रेम कहानी ही नहीं दिखाती है, बल्कि तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था, जाति के बंधनों और उन्हें चुनौती देती दोस्ती को भी सामने लाती है। फिल्म अछूत कन्या सिर्फ एक प्रेम कहानी नहीं है, बल्कि समाज की सच्चाई को दिखाने वाली फिल्म है। यह उस समय की कठोर जाति जातिवाद जैसी बुराइयों को सामने लाती है और लोगों को सोचने पर मजबूर करती है।

प्रताप और कस्तूरी की अधूरी प्रेम कहानी यह दिखाती है कि समाज के नियम अक्सर लोगों की इच्छाओं और भावनाओं से ज्यादा ताकतवर होते हैं। वहीं, दुखिया और मोहनलाल की दोस्ती यह बताती है कि जाति के फर्क के बावजूद इंसानियत और सच्चे रिश्ते बने रह सकते हैं। इस फिल्म की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसने जाति और अंतरजातीय शादी जैसे संवेदनशील मुद्दों को खुलकर दिखाया। भले ही फिल्म इन समस्याओं को पूरी तरह खत्म नहीं करती, लेकिन यह समाज के सामने जरूरी सवाल जरूर रखती है। अछूत कन्या को भारतीय सिनेमा की एक महत्वपूर्ण फिल्म मानी जा सकती है, जिसने मनोरंजन के साथ-साथ लोगों में सामाजिक जागरूकता भी पैदा की।

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