क्या समाज में जीने के लिए दायरों में रहना ज़रूरी है? अगर कोई इन दायरों को तोड़ दे, तो क्या उसके हिस्से में सिर्फ हिंसा और बहिष्कार ही आता है? अमोल पालेकर की फिल्म दायरा इन्हीं सवालों को उठाती है। भारतीय समाज में जाति, धर्म और लिंग के आधार पर बने ये दायरे केवल सामाजिक नियम नहीं हैं, बल्कि सत्ता और नियंत्रण के टूल भी हैं। फिल्म की भाषा हिंदी है, और 1 घंटा 47 मिनट की यह फिल्म समाज का एक सच्चा आईना पेश करती है। इसके माध्यम से एक अकेली महिला और एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति की समाज में स्थिति, उनके संघर्ष और असुरक्षाओं को बेहद संवेदनशील तरीके से दिखाया गया है। दायरा की सबसे बड़ी खासियत इसकी संवेदनशीलता है। फिल्म बिना किसी शोर-शराबे या उपदेश के, बेहद शांत और प्रतीकात्मक तरीके से जेंडर की जटिलताओं को सामने लाती है। इसमें दिखाया गया है कि कैसे समाज ‘पुरुष’ और ‘स्त्री’ की तय सीमाओं यानी दायरा के बाहर किसी भी पहचान को स्वीकार करने से हिचकता है।
पितृसत्ता, हिंसा और असुरक्षा और किरदारों का तालमेल
दायरा की कहानी दो अजनबी किरदारों की एक अनोखी और भावनात्मक यात्रा के इर्द-गिर्द घूमती है। फिल्म में एक युवा महिला है, जो अपने साथ हुए सामूहिक बलात्कार के आघात का सामना कर रही है। दूसरी ओर एक पुरुष है, जो सामाजिक कारणों से खुद को एक महिला के रूप में प्रस्तुत करता है और उसी पहचान में जीता है। परिस्थितियों के चलते दोनों की मुलाकात होती है और वे साथ सफर पर निकल पड़ते हैं। यह यात्रा धीरे-धीरे उनके बीच एक गहरा रिश्ता बनाती है, जहां वे अपने दर्द, डर और अकेलेपन को एक-दूसरे के साथ साझा करते हैं। रास्ते में दोनों को समाज के तानों, हिंसा और भेदभाव का सामना करना पड़ता है, जिससे उनकी असुरक्षा और भी स्पष्ट होती है। कहानी सिर्फ इन दो किरदारों की नहीं, बल्कि उन दायरों की है, जो समाज ने जेंडर और पहचान के नाम पर खींच रखी हैं। फिल्म यह सवाल उठाती है कि क्या किसी इंसान की पहचान सिर्फ उसके शरीर से तय होती है, या उसके अनुभव और भावनाएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।
फिल्म बिना किसी शोर-शराबे या उपदेश के, बेहद शांत और प्रतीकात्मक तरीके से जेंडर की जटिलताओं को सामने लाती है। इसमें दिखाया गया है कि कैसे समाज ‘पुरुष’ और ‘स्त्री’ की तय सीमाओं यानी दायरा के बाहर किसी भी पहचान को स्वीकार करने से हिचकता है।
फिल्म में मुख्य किरदार सोनाली कुलकर्णी और निर्मल पांडे (इमली) हैं। इमली और सोनाली दोनों ही अपनी पहचान को बचाए रखने के लिए संघर्ष करते हैं। इमली, सोनाली का हर कदम पर साथ देती है। जब सोनाली को कुछ गुंडे उठा लेते हैं, तब इमली ही पहली होती है जो उसे समझती है और सहारा देती है। इमली खुद भी बेघर और बेसहारा है, लेकिन वह समाज के सामने झुकने के बजाय अपनी पहचान के साथ जीने की कोशिश करती है। शुरुआत में सोनाली, इमली से थोड़ा डरती है क्योंकि वह एक ट्रांसजेंडर है, लेकिन उसके व्यवहार और संवेदनशीलता को देखकर वह धीरे-धीरे उस पर भरोसा करने लगती है। फिल्म के अंत में दोनों के बीच एक गहरा भावनात्मक संबंध विकसित हो जाता है, जो उनके अकेलेपन और संघर्षों से उपजा है।
फिल्म के शुरूआत में दिखाया जाता है कि गुंडे सोनाली को नहीं बल्कि उसकी दोस्त सुशील को उठाने आए थे और सुशीला उनमें से एक गुंडे को पहले से जानती थी। वह सुशीला से प्यार नहीं करता था बल्कि उसे शहर की जिंदगी का झूठा झांसा देकर ले जाना चाहता था। अगले सीन में जब सोनाली जैसे-तैसे गुंडो के चंगुल से बच निकलती है। लेकिन, जब वह अकेली कोई सुरक्षित जगह खोज रही होती है तभी बाइक पर सवार तीन लड़के मिलकर उसका सामूहिक बलात्कार करते हैं। सोनाली इमली से दोबारा मिलती है और उसपर गुस्सा करती है। लेकिन, इमली सलाह देती है कि अगर उसे सुरक्षित रहना है तो उसे अपना हुलिया बदलते हुए पुरुषों की तरह रहना चाहिए। सोनाली खुद की भलाई के लिए यही करती है।
जब सोनाली को कुछ गुंडे उठा लेते हैं, तब इमली ही पहली होती है जो उसे समझती है और सहारा देती है। इमली खुद भी बेघर और बेसहारा है, लेकिन वह समाज के सामने झुकने के बजाय अपनी पहचान के साथ जीने की कोशिश करती है।
फिल्म की शैली और प्रस्तुति
फिल्म की शैली बेहद यथार्थवादी है। कहानी को सादगी के साथ प्रस्तुत किया गया है, जिससे उसकी गंभीरता और प्रभाव और उभरकर सामने आता है। विज़ुअल स्टोरीटेलिंग के माध्यम से फिल्म भावनाओं को गहराई से व्यक्त करती है, जिससे दर्शक कहानी से सीधे जुड़ाव महसूस करते हैं। फिल्म में सुनसान रास्ते, खाली जगहें और अंधेरी रात के दृश्य बार-बार दिखाई देते हैं, जो एक तरह के बंद दायरे और भय का माहौल रचते हैं। ये दृश्य ‘दायरा’ के मूल विचार को और प्रभावशाली बनाते हैं। खुले रास्ते, वीरान लोकेशन और लंबी यात्राएं किरदारों के भीतर चल रहे संघर्ष को गहराई देती हैं। फिल्म की सिनेमैटोग्राफी और नैरेटिव स्टाइल खास तौर पर उल्लेखनीय हैं। संवाद कम हैं, लेकिन जो भी कहा जाता है, वह सीधे दर्शकों के दिल और दिमाग पर असर छोड़ता है।
स्वतंत्रता और नारीवाद की झलक
जब निर्मला इमली के साथ रहना शुरू करती है, तो अपनी सुरक्षा के लिए उसे लड़के का रूप अपनाना पड़ता है। वह लड़कों जैसे कपड़े पहनती है और अपने बाल छोटे करवा लेती है। इसके बाद उसके जीवन में बड़ा बदलाव आता है—वह रात की अंधेरी गलियों में भी बिना डर के चल-फिर पाती है। एक दृश्य में वह इमली के साथ ऐसी जगह जाती है जहां कई पुरुष मौजूद होते हैं, लेकिन कोई भी यह पहचान नहीं पाता कि वह लड़की है। यह साफ दिखाता है कि हमारे समाज में सुरक्षा और आज़ादी अक्सर इस बात पर निर्भर करती है कि आप किस जेंडर के रूप में दिखते हैं।
फिल्म में सुनसान रास्ते, खाली जगहें और अंधेरी रात के दृश्य बार-बार दिखाई देते हैं, जो एक तरह के बंद दायरे और भय का माहौल रचते हैं। ये दृश्य ‘दायरा’ के मूल विचार को और प्रभावशाली बनाते हैं।
इन पलों में निर्मला एक ऐसी आज़ादी महसूस करती है, जो आमतौर पर लड़कियों को नहीं मिलती—जैसे बेखौफ बाहर घूमना या कहीं भी रुक जाना। आज भी कई लड़कियाँ रात में बाहर जाने से डरती हैं, क्योंकि उनके मन में असुरक्षा का डर बैठा होता है। फिल्म यही सवाल उठाती है कि क्या महिलाओं को सुरक्षित महसूस करने के लिए अपनी पहचान बदलनी पड़ेगी?
क्यों है ये फिल्म खास
यह फिल्म खासकर उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जो जेंडर, पहचान और असमानता के मुद्दों को समझना चाहते हैं। यह सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि पूरे समाज की सोच पर सवाल है। फिल्म में निर्मला के साथ हुई यौन हिंसा यह दिखाती है कि पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री का शरीर किस तरह हिंसा का निशाना बनता है। साथ ही, यह भी समझाती है कि सिर्फ ‘मजबूत बनने’ की बात काफी नहीं है, बल्कि उस सामाजिक ढांचे को बदलना जरूरी है जो ऐसी असुरक्षा पैदा करता है।
फिल्म के अंत में जब निर्मला के पिता उसे ठुकरा देते हैं, तो यह समाज की जड़ सोच को सामने लाता है—क्या एक महिला अपने दम पर नहीं जी सकती? इस तरह ‘दायरा’ न सिर्फ स्त्री की असुरक्षा को दिखाती है, बल्कि उस सोच को भी चुनौती देती है, जो महिलाओं की आज़ादी को सीमित करती है। आज के संदर्भ में देखें तो दायरा भारतीय सिनेमा की उन शुरुआती फिल्मों में से है, जिसने जेंडर फ्लूइडिटी और क्वीयर पहचान जैसे विषयों को गंभीरता से छूती है। यह फिल्म सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि समाज के बनाए हुए दायरों पर सवाल उठाने की एक कोशिश है। कुल मिलाकर, दायरा एक साहसिक, संवेदनशील और विचारोत्तेजक फिल्म है, जो दर्शकों को अपने पूर्वाग्रहों पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करती है।

