समाजकैंपस दलित विद्यार्थियों के लिए कैंपस क्यों बनते जा रहे हैं असुरक्षित स्थान

दलित विद्यार्थियों के लिए कैंपस क्यों बनते जा रहे हैं असुरक्षित स्थान

हिमाचल प्रदेश की हालिया घटना हमारे समाज की एक कड़वी सच्चाई सामने रखती है। भारत में जातिवाद के कारण एक दलित महिला कहीं ज़्यादा कठिन है। जाति और जेंडर मिलकर ऐसा दबाव बनाते हैं, जिसमें दलित महिलाओं की आवाज़ आसानी से दबा दी जाती है।

जब हाशिए पर खड़े समुदायों से आने वाली कोई लड़की सपने देखने का साहस करती है, और उन्हें पूरा करने के लिए लगातार मेहनत करती है, तो वह सिर्फ़ अपने भविष्य की दिशा तय नहीं करती। उसके सपने उसके साथ-साथ उन अनगिनत लोगों की उम्मीद भी बन जाते हैं, जो समान परिस्थितियों में जीते हुए आगे बढ़ने की चाह रखते हैं। ऐसे सपने व्यक्तिगत नहीं रहते, वे पूरे समुदाय के संघर्ष और भरोसे का प्रतीक बन जाते हैं। बीते दिनों हिमाचल प्रदेश की 19 साल की दलित छात्रा की कथित तौर पर इलाज के दौरान मौत हो गई। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार कथित तौर पर उसे एक सरकारी कॉलेज में यौन हिंसा और रैगिंग का सामना करना पड़ा था।

यह घटना हमें भारत की शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक ढांचे पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर करती है। यह केवल संस्थागत कमियों की ओर इशारा नहीं करती, बल्कि समाज में गहराई तक मौजूद जाति और जेंडर आधारित भेदभाव को भी सामने लाती है। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हमारे शैक्षणिक संस्थान विद्यार्थियों के लिए खासकर हाशिए के समुदायों और महिलाओं के लिए, समान रूप से संवेदनशील और सुरक्षित है। यह घटना कोई एकल घटना नहीं है। यह हमारी सामूहिक ज़िम्मेदारी, संस्थागत संवेदनशीलता और सामाजिक सोच से जुड़ा हुआ सवाल है, जिसका सामना किए बिना आगे बढ़ना संभव नहीं है।

बीते दिनों हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला स्थित गवर्नमेंट डिग्री कॉलेज में 19 वर्षीय एक दलित छात्रा की मौत हो गई। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, परिवार वालों का कथित आरोप है कि छात्रा को कॉलेज परिसर में जातिगत भेदभाव, रैगिंग और यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ा, जिसका उसके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ा।

पूरा मामला क्या है?

बीते दिनों हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला स्थित गवर्नमेंट डिग्री कॉलेज में 19 वर्षीय एक दलित छात्रा की मौत हो गई। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, परिवार वालों का कथित आरोप है कि छात्रा को कॉलेज परिसर में जातिगत भेदभाव, रैगिंग और यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ा, जिसका उसके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ा। छात्रा के पिता ने अपनी शिकायत में बताया कि 18 सितंबर 2025 को कॉलेज के तीन सीनियर छात्रों ने उसके साथ शारीरिक हिंसा की। इसके साथ ही कॉलेज के इतिहास विभाग के एक असिस्टेंट प्रोफेसर पर कथित यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए गए हैं। रिपोर्ट अनुसार इन घटनाओं के बाद छात्रा गहरे सदमे में चली गई और उसकी तबीयत लगातार बिगड़ती गई। इलाज के लिए उसे लुधियाना के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां 26 दिसंबर 2025 को उसकी मौत हो गई। हालांकि संबंधित प्रोफेसर ने खुद पर लगे आरोपों से इनकार किया है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार छात्रा की मौत के बाद, कॉलेज एडमिनिस्ट्रेशन आरोपी प्रोफेसर के सपोर्ट में आया और यह बयान दिया कि पहले साल में 3 सब्जेक्ट में फेल होने के बाद छात्रा का स्टूडेंट के तौर पर एडमिशन नहीं हुआ था। इस मामले में छात्रा के पिता की शिकायत पर कार्रवाई करते हुए, धर्मशाला पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 75, 115(2) और 3(5) के तहत मामला दर्ज किया है, जो यौन उत्पीड़न, जानबूझकर चोट पहुंचाने और सामान्य इरादे से संबंधित हैं। एफआईआर में हिमाचल प्रदेश शैक्षणिक संस्थान (रैगिंग निषेध) अधिनियम, 2009 की धारा 3 भी शामिल है। इस बीच, हिमाचल प्रदेश सरकार ने छात्रा की मौत की जांच के लिए चार सदस्यीय समिति का गठन किया है।

भारत में जातिवाद के कारण एक दलित महिला कहीं ज़्यादा कठिन है। जाति और जेंडर मिलकर ऐसा दबाव बनाते हैं, जिसमें दलित महिलाओं की आवाज़ आसानी से दबा दी जाती है।

जांच पूरी होने तक संबंधित प्रोफेसर को निलंबित भी कर दिया गया है। वहीं शिक्षा विभाग ने कहा है कि जांच में यौन उत्पीड़न, जातिगत दुर्व्यवहार और अन्य सभी पहलुओं को गंभीरता से देखा जाएगा। इस बीच दलित अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों ने इस मामले में कड़ी कार्रवाई की मांग की है। उन्होंने कहा कि यह मामला सिर्फ़ एक छात्रा की मौत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शिक्षा संस्थानों में मौजूद जातिगत भेदभाव, लैंगिक हिंसा और सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करता है। संगठनों ने यह भी मांग की है कि संबंधित कानूनों का प्रभावी और संवेदनशील तरीके से पालन सुनिश्चित किया जाए, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके। 

जाति और जेंडर की दोहरी मार

हिमाचल प्रदेश की हालिया घटना हमारे समाज की एक कड़वी सच्चाई सामने रखती है। भारत में जातिवाद के कारण एक दलित महिला कहीं ज़्यादा कठिन है। जाति और जेंडर मिलकर ऐसा दबाव बनाते हैं, जिसमें दलित महिलाओं की आवाज़ आसानी से दबा दी जाती है। कॉलेज और विश्वविद्यालयों में दलित विद्यार्थियों को अक्सर ‘अलग’ महसूस कराया जाता है। दलित महिलाओं के लिए यह भेदभाव और भी गहरा हो जाता है। उन्हें जातिगत भेदभाव के साथ-साथ पितृसत्ता और यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। क़ानून के मुताबिक़ हर संस्थान में पॉश क़ानून के तहत आंतरिक शिकायत समिति होनी चाहिए। लेकिन हक़ीक़त में ये व्यवस्थाएं ज़्यादातर सिर्फ़ काग़ज़ों तक सीमित रहती हैं। जब किसी महिला के साथ हिंसा होती है, तो अक्सर दोष उसी पर डाल दिया जाता है। हिमाचल के इस मामले में भी कॉलेज प्रशासन ने अपनी छवि बचाने के लिए छात्रा को ही नकार दिया।

दलित अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों ने इस मामले में कड़ी कार्रवाई की मांग की है। उन्होंने कहा कि यह मामला सिर्फ़ एक छात्रा की मौत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शिक्षा संस्थानों में मौजूद जातिगत भेदभाव, लैंगिक हिंसा और सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करता है।

यह दिखाता है कि कई संस्थानों के लिए विद्यार्थियों की सुरक्षा से ज़्यादा अपनी प्रतिष्ठा मायने रखती है। यह सिर्फ़ एक कॉलेज की नाकामी नहीं है। यह हमारी पूरी शिक्षा व्यवस्था की विफलता को दिखाता है। जवाबदेही की कमी, निष्पक्ष जांच का अभाव और क़ानूनों का ढीला पालन सब मिलकर अन्याय को बढ़ावा देते हैं। जातिवाद और महिलाओं को कमतर समझने की सोच आज भी समाज में गहराई से मौजूद है। यही सोच संस्थानों और सिस्टम में भी दिखाई देती है। रोहित वेमुला, मुथुकृष्णन और पायल तडवी जैसे मामलों ने पहले भी इस सच्चाई को उजागर किया है। बावजूद इसके, व्यवस्था में ठोस बदलाव नहीं हुए। बदलाव के लिए सिर्फ़ संवेदना नहीं, बल्कि सख़्त और ईमानदार कदम ज़रूरी हैं।

क़ानूनों का सही और सख़्त पालन होना चाहिए। शिकायतों की निष्पक्ष और समयबद्ध जांच हो। संस्थानों में पॉश और एंटी-रैगिंग व्यवस्था को स्वतंत्र बनाया जाए। मानसिक स्वास्थ्य सहायता को प्राथमिकता दी जाए। जाति और जेंडर संवेदनशीलता की ट्रेनिंग अनिवार्य हो। हिमाचल की यह घटना एक चेतावनी है। जब तक शिक्षा व्यवस्था जाति और जेंडर के भेदभाव से मुक्त नहीं होगी, तब तक समानता और विकास की बात अधूरी रहेगी। सवाल सिर्फ़ सिस्टम से नहीं, हम सब से है कि क्या हम सच में एक न्यायपूर्ण और बराबरी वाला समाज बनाना चाहते हैं?

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