संस्कृतिसिनेमा ‘खूबसूरत’ : अनुशासन, प्रेम और आज़ादी के बीच संतुलन रचती एक संवेदनशील कहानी 

‘खूबसूरत’ : अनुशासन, प्रेम और आज़ादी के बीच संतुलन रचती एक संवेदनशील कहानी 

साल 1980 के दशक में, जब महिला पात्रों को अक्सर त्याग और चुप्पी का प्रतीक दिखाया जाता था, तब मंजू जैसी नायिका का सामने आना ज़रूरी था। वह परिवार को तोड़ती नहीं, बल्कि उसे मानवीय बनाती है। फिल्म यह संदेश देती है कि एक महिला की आज़ादी परिवार के ख़िलाफ़ नहीं होती है।

भारतीय सिनेमा की कुछ फ़िल्में शोर नहीं मचातीं, लेकिन धीरे-धीरे दिल की गहराई में अपनी जगह बना लेती हैं। वे हंसाती हैं, सोचने पर मजबूर करती हैं और बिना उपदेश दिए ज़रूरी सवाल छोड़ जाती हैं। उन्हीं में से एक है, साल 1980 में आई फिल्म खूबसूरत। रेखा और राकेश रोशन की अभिनीत और निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी के निर्देशन, में बनी यह फिल्म आज भी उतनी ही नई और मजबूत लगती है, जितनी अपने रिलीज़ होने के समय थी। यह फिल्म न केवल एक मनोरंजक पारिवारिक कॉमेडी है, बल्कि यह अनुशासन, आज़ादी और भावनात्मक समझ के बीच संतुलन पर एक अर्थपूर्ण संवाद भी रचती है। अपने रिलीज़ के चार दशक बाद भी यह इसलिए ताज़ा लगती है, क्योंकि इसके सवाल आज भी हमारे घरों, रिश्तों और दृष्टिकोण में जीवित हैं। 

यह फिल्म हंसी और हल्के-फुल्के पलों के माध्यम से यह पूछती है, कि क्या अनुशासन के नाम पर भावनाओं को दबा देना ज़रूरी है? क्या घर केवल नियमों से चलता है या उसे जिंदा रखने के लिए बातचीत, अपनापन और आज़ाद सोच भी उतनी ही अहम है? यह फिल्म महिलाओं को न तो विद्रोही प्रतीक बनाती है और न ही मौन सहनशीलता का आदर्श, बल्कि उसे एक संवेदनशील, समझदार और सकारात्मक बदलाव लाने वाली प्रेरणा के रूप में प्रस्तुत करती है। इसी संतुलन के कारण यह केवल अपने दौर की ही सफल फिल्म नहीं है, बल्कि हर दौर में हर पीढ़ी से जुड़ जाती है।

साल 1980 में आई फिल्म खूबसूरत। रेखा और राकेश रोशन की अभिनीत और निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी के निर्देशन, में बनी यह फिल्म आज भी उतनी ही नई और मजबूत लगती है, जितनी अपने रिलीज़ होने के समय थी। यह फिल्म न केवल एक मनोरंजक पारिवारिक कॉमेडी है, बल्कि अनुशासन और आज़ादी के बीच संतुलन पर एक अर्थपूर्ण संवाद भी रचती है।

अनुशासन से बंधा घर और आज़ादी की दस्तक

फ़िल्म की कहानी एक ऐसे परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है, जहां सख़्त अनुशासन जीवन का नियम है। इस घर की मुखिया निर्मला देवी (दीना पाठक) हैं, जिनके तय किए गए नियम हर काम, हर समय और हर व्यवहार को नियंत्रित करते हैं। इस व्यवस्था में भावनाओं और संवाद के लिए मानो कोई जगह ही नहीं बचती है। लेकिन घर में प्रवेश करती है, मंजू (रेखा), एक आज़ाद, हंसमुख, ज़िंदगी से भरी युवती, जो अपने सहज स्वभाव से इस ठहरे हुए माहौल में हलचल पैदा कर देती है। इसी हलचल के बीच निर्मला देवी के अनुशासित छोटे बेटे इंदर (राकेश रोशन) को मंजू का चुलबुलापन पसंद आने लगता है। 

वैसे तो इंदर अपनी मां के हर नियमों का पालन करता है, पर दिल से संवेदनशील भी है। मंजू और इंदर का रिश्ता धीरे-धीरे विकसित होता है, और इसी रिश्ते के माध्यम से फिल्म यह सवाल उठाती है कि क्या अनुशासन के नाम पर भावनाओं का गला घोंटना ज़रूरी है? या फिर क्या प्रेम, हास्य और आत्मीयता ही किसी घर को सचमुच ‘खूबसूरत’ बनाते हैं? निर्मला उनके रिश्ते को स्वीकार नहीं कर पातीं, क्योंकि उनके लिए खुले विचारों वाली लड़की दूसरों के लिए ज़िम्मेदार और समर्पित हो ही नहीं सकती है। फिल्म में और भी खूबसूरत चीजें है जो हर दौर की आवश्यकता को बयां करती है। जैसे ससुर और बहू के बीच पिता और बेटी जैसा स्नेह, घर के हर सदस्य का कला के प्रति एक ख़ास  लगाव, पुरे परिवार का एक साथ खाना -खाना। हर घर से जुड़ा हुआ लगता है, यह बातें ही इस फिल्म सबसे बड़ी विशेषता है।    

फ़िल्म की कहानी एक ऐसे परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है, जहां सख़्त अनुशासन जीवन का नियम है। इस घर की मुखिया निर्मला देवी (दीना पाठक) हैं, जिनके तय किए गए नियम हर काम, हर समय और हर व्यवहार को नियंत्रित करते हैं। इस व्यवस्था में भावनाओं और संवाद के लिए मानो कोई जगह ही नहीं बचती है

नियमों और रिश्तों के बीच खड़े किरदार 

मंजू का अभिनय इस फिल्म की आत्मा है। वह न तो किसी आदर्श महिला के सांचे में ढलती हैं, न ही विद्रोह का शोर मचाती है। उनकी विद्रोहिता मुस्कान में है, चटपटी बातों में है, और सबसे बढ़कर उसके व्यवहार में है। रेखा, मंजू के किरदार  को इस तरह निभाती हैं कि वह दर्शकों को अपनी-सी लगने लगती है। कभी चंचल, कभी संवेदनशील, कभी मज़ाकिया और कभी गहरी समझ रखने वाली। यह भूमिका अभिनेत्री रेखा के करियर में एक मील का पत्थर मानी जाती है, क्योंकि इसमें उनका ग्लैमर नहीं, बल्कि उनका मानवीय आकर्षण दिखाई देता है। उनकी आंखों की चमक और सहज हाव-भाव ही फिल्म को ज्यादा भरोसेमंद बनाता है। वहीं राकेश रोशन का इंदर का किरदार भी बेहद ही संतुलन के बीच गढ़ा गया है। वह अपने प्यार और मां की सीख के बीच अंदर ही अंदर लड़ता रहता है।

वह सही समय का इंतजार करता है, कि मां को मंजू के अंदर की चमक खुद से दिखाई दे और वो उन दोनों के रिश्ते को अपना सके। इसके अलावा दीना पाठक का निर्मला देवी के रूप में अभिनय अत्यंत प्रभावशाली है। वह ‘खलनायिका’ नहीं हैं, बल्कि अपने विश्वासों में जकड़ी हुई एक महिला हैं, जिन्हें लगता है कि अनुशासन ही परिवार को जोड़े रख सकता है। उनकी सख़्ती के पीछे छिपी असुरक्षा और प्रेम को फिल्म धीरे-धीरे उजागर करती है। अशोक कुमार ससुर के रोल में बेहद ही प्रभावशील छाप छोड़ते हैं, बहु को वे बेटी मानते हैं, उनके कला प्रेम का सम्मान करते हैं और सबसे अहम बात, वह अपनी बहुओं को खुलकर अपने विचार प्रकट करने का माहौल देते हैं, उनके साथ हंसी मजाक में शामिल होते हैं। ओम प्रकाश, शशिकला और अन्य सहायक कलाकारों ने कहानी को जीवंत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस फिल्म में हर छोटा किरदार अपनी एक अलग छाप छोड़ता है।

वैसे तो इंदर अपनी मां के हर नियमों का पालन करता है, पर दिल से संवेदनशील भी है। मंजू और इंदर का रिश्ता धीरे-धीरे विकसित होता है। निर्मला उनके रिश्ते को स्वीकार नहीं कर पातीं, क्योंकि उनके लिए खुले विचारों वाली लड़की दूसरों के लिए ज़िम्मेदार और समर्पित हो ही नहीं सकती है।

हास्य, संवेदनशीलता और सामाजिक सोच का संतुलन

फिल्म ‘खूबसूरत’ में ऋषिकेश मुखर्जी की निर्देशन शैली अपनी परिपक्वता पर है। वह बिना किसी भारी-भरकम उपदेश के, हल्के हास्य और संवेदनशीलता के साथ गहरी बातें कह जाते हैं। फिल्म का अंदाज़ हल्का और सहज है, भले ही विषय गंभीर हो। यही बेहतर निर्देशन की खासियत है, वह हंसाते-हंसाते सोचने पर मजबूर कर देते हैं। फिल्म का संगीत सरल और मधुर है, जो कहानी के साथ सहजता से बहता है। गीत कथानक को रोकते नहीं, बल्कि आगे बढ़ाते हैं। तबले पर ससुर की थाप के साथ बहुओं का शास्त्रीय नृत्य बेहद सुंदर लगता है। फिल्म के डायलॉग, हास्यपूर्ण पर अर्थपूर्ण हैं। खासकर मंजू के संवाद आज भी उतने ही प्रासंगिक लगते हैं, क्योंकि वे आज़ाद सोच और आत्मसम्मान की बात करते हैं।

अपने समय के हिसाब से यह एक साहसिक फिल्म थी। साल 1980 के दशक में, जब महिला पात्रों को अक्सर त्याग और चुप्पी का प्रतीक दिखाया जाता था, तब मंजू जैसी नायिका का सामने आना ज़रूरी था। वह परिवार को तोड़ती नहीं, बल्कि उसे मानवीय बनाती है। फिल्म यह संदेश देती है कि एक महिला की आज़ादी परिवार के ख़िलाफ़ नहीं होती है। वह परंपराओं को चुनौती देकर भी रिश्तों को मज़बूत कर सकती है, अगर संवाद और समझ की गुंजाइश हो। आज जब वर्क-लाइफ बैलेंस, मानसिक स्वास्थ्य और पारिवारिक संवाद जैसे मुद्दे चर्चा में हैं। यह फिल्म और भी प्रासंगिक हो जाती है। यह याद दिलाती है कि नियम ज़रूरी हैं, पर इंसानियत उससे भी ज़्यादा। हंसी, अपनापन और भावनात्मक खुलापन किसी भी परिवार की बुनियाद हैं।

‘खूबसूरत’ फिल्म ज़िंदगी को सही नजरिए से देखने का एक प्यारा संदेश देती है। यह हमें समझाती है कि जीवन को सुंदर और खुशहाल बनाने के लिए सख़्ती, नियमों और डर की नहीं, बल्कि समझदारी, अपनापन और संवेदनशीलता की ज़रूरत होती है। फिल्म के किरदार बहुत स्वाभाविक लगते हैं, और यही इसकी सबसे बड़ी ताक़त है। रेखा की चुलबुली लेकिन सच्ची अदाकारी और राकेश रोशन का सहज अभिनय कहानी को और असरदार बना देता है। ऋषिकेश मुखर्जी का निर्देशन सरल होते हुए भी गहरी बात कहता है, जिसमें न कोई दिखावा है और न ही ज़रूरत से ज़्यादा नाटकीयता। फिल्म के संवाद आसान हैं, लेकिन वे सीधे दिल तक पहुंचते हैं और चेहरे पर मुस्कान ले आते हैं। यही वजह है कि चार दशक बीत जाने के बाद भी यह फिल्म पुरानी नहीं लगती है। आज भी इसे देखना अच्छा लगता है, क्योंकि यह न सिर्फ हमें हंसाती है, बल्कि रिश्तों को समझना, दूसरों की भावनाओं की कद्र करना और इंसान बने रहना भी सिखाती है।

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