इतिहास निर्मल कौर सैनी: भारतीय महिला वॉलीबॉल की पहली अंतरराष्ट्रीय आवाज़| #IndianWomenInHistory

निर्मल कौर सैनी: भारतीय महिला वॉलीबॉल की पहली अंतरराष्ट्रीय आवाज़| #IndianWomenInHistory

निर्मल कौर वो महिला हैं, जिन्होंने भारतीय महिला वॉलीबॉल में नेतृत्व, दृढ़ता और सौम्यता की मिसाल पेश की थीं। निर्मल कौर सैनी का जीवन संघर्ष, मेहनत और उपलब्धियों से भरा रहा।

जिस दौर में महिलाओं के लिए खेल को करियर के रूप में देखना असामान्य माना जाता था, उस समय निर्मल कौर सैनी प्रशिक्षण, प्रतियोगिता और सामाजिक अपेक्षाओं से एक साथ संघर्ष किया। संसाधनों की कमी, सुविधाओं का अभाव और पारिवारिक जिम्मेदारियां उनकी राह में बार-बार आईं। लेकिन, खेल के प्रति उनका समर्पण स्थिर रहा। मैदान पर उनकी उपस्थिति ने यह स्पष्ट कर दिया कि प्रतिभा और मेहनत अवसरों की कमी से सीमित नहीं होती है। पंजाब की एक ऐसी महिला, जिनकी जीवन-यात्रा प्रेरणा और अनुशासन की मिसाल रही, आज धीरे-धीरे भुला दी गई है। खेल जगत में इनका विशेष योगदान होते हुए इनकी पहचान सिर्फ इतनी रही है कि ये एथलीट मिल्खा सिंह की पत्नी निर्मल कौर सैनी हैं। निर्मल कौर सैनी भारत की पहली वॉलीबॉल एथलीट थीं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वॉलीबॉल में भारत का प्रतिनिधित्व किया था।

जिस दौर में महिलाओं को सिर्फ घर पर रहने और घर के काम सीखने की सलाह दी जाती थी उस समय कौर ने अलग पहचान हासिल की। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी संतुलन और गरिमा बनाए रखते हुए अपने खेल से भारत देश का नाम रोशन किया। निर्मल कौर वो महिला हैं, जिन्होंने भारतीय महिला वॉलीबॉल में नेतृत्व, दृढ़ता और सौम्यता की मिसाल पेश की थीं। निर्मल कौर सैनी का जीवन संघर्ष, मेहनत और उपलब्धियों से भरा रहा। उनका जन्म 8 अक्टूबर 1938 को शेखूपुरा में हुआ, जो अब पाकिस्तान में है। उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी से राजनीति विज्ञान में मास्टर्स की पढ़ाई की। उस दौर में महिलाओं के लिए उच्च शिक्षा पाना आसान नहीं था। ऐसे समय में मास्टर्स डिग्री हासिल करना उनकी बड़ी उपलब्धि थी।

निर्मल कौर को बचपन से खेलों में रुचि थी। वे अपने आस-पास खेले जाने वाले खेलों को ध्यान से देखती थीं। उनके पिता मेहर चंद सैनी ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और पूरा सहयोग दिया।

निर्मल कौर को बचपन से खेलों में रुचि थी। वे अपने आस-पास खेले जाने वाले खेलों को ध्यान से देखती थीं। उनके पिता मेहर चंद सैनी ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और पूरा सहयोग दिया। समाज और रिश्तेदार इस फैसले से खुश नहीं थे, लेकिन कौर ने लोगों की बातों को नजरअंदाज किया। उन्होंने अपने सपनों को चुना। उनकी मेहनत रंग लाई। कौर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वॉलीबॉल खेलने वाली पहली भारतीय महिला बनीं। वे पंजाब टीम और भारतीय महिला राष्ट्रीय वॉलीबॉल टीम की कप्तान भी रहीं।

उस समय जब खेलों में महिलाओं के लिए सीमित मौके थे, तब वे नई ऊंचाइयों पर थीं। उनके खेल ने कई महिलाओं को आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। इतनी प्रतिभाशाली खिलाड़ी होने के बावजूद कौर को वह पहचान नहीं मिली, जिसकी वे हकदार थीं। लेकिन, उनके परिवार ने हमेशा उनके हुनर को समझा। द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, मिल्खा सिंह कहते हैं कि मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी उपलब्धि मेरी पत्नी है। उन्होंने कहा कि उनके सभी मेडल और ट्रॉफी से बढ़कर कौर हैं। उनकी पहली मुलाकात साल 1956 में श्रीलंका में एक खेल प्रतियोगिता के दौरान हुई। कौर वहां वॉलीबॉल टीम की कप्तान थीं और मिल्खा सिंह प्रतियोगिता में शामिल थे। हालांकि शादी के लिए उन्हें लंबा इंतजार करना पड़ा।

उस समय जब खेलों में महिलाओं के लिए सीमित मौके थे, तब वे नई ऊंचाइयों पर थीं। उनके खेल ने कई महिलाओं को आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। इतनी प्रतिभाशाली खिलाड़ी होने के बावजूद कौर को वह पहचान नहीं मिली, जिसकी वे हकदार थीं।

हर महिला को साथ लेकर चलने का जज़्बा

खेल की दुनिया में निर्मल कौर सैनी का योगदान केवल उनकी अपनी पहचान तक सीमित नहीं था। वे हमेशा उभरती महिला खिलाड़ियों का हौसला बढ़ाती थीं। उनका मानना था कि खेल महिलाओं के आत्मविश्वास को मजबूत करता है, खासकर पुरुष-प्रधान समाज में। कौर ने पंजाब सरकार में महिला विभाग की निदेशक के रूप में भी अहम भूमिका निभाई। उनकी प्रशासनिक क्षमता ने खेल संस्कृति को मजबूती दी। उनके कार्यकाल में चंडीगढ़ में कई खेल कॉम्प्लेक्स और स्टेडियम विकसित किए गए, जिससे खिलाड़ियों को बेहतर सुविधाएं मिलीं। वे शहरी और ग्रामीण, दोनों क्षेत्रों की महिला खिलाड़ियों के लिए समान रूप से काम करती थीं। खेल परमिट, प्रशिक्षण कार्यक्रम और स्थानीय टूर्नामेंट के ज़रिए उन्होंने कई प्रतिभाओं को आगे बढ़ने का मौका दिया। उनके विचारों ने खासकर ग्रामीण खिलाड़ियों में नया उत्साह भरा। निर्मल कौर का मानना था कि खेल हर महिला के लिए ज़रूरी है। उनका विश्वास था कि खेल में मेहनत और ईमानदारी से काम करने पर सम्मान ज़रूर मिलता है। वे महिलाओं की शिक्षा और स्वतंत्रता को भी हमेशा प्राथमिकता देती थीं।

निर्मल कौर और उनकी विरासत 

साल 2021 में वे कोविड-19 से संक्रमित हुईं और अस्पताल में भर्ती रहीं। 13 जून 2021 को 85 वर्ष की आयु में निर्मल कौर सैनी का निधन हो गया। आज वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी प्रेरणादायक कहानी हमें आगे बढ़ने की ताक़त देती है। खेल और समाज में उनका योगदान बेहद महत्वपूर्ण है। उनका समर्पण, नेतृत्व और संवेदनशीलता महिला सशक्तिकरण का प्रतीक है। उनकी विरासत उन सभी महिलाओं के लिए प्रेरणा है, जो खेल, शिक्षा और परिवार के बीच संतुलन बनाना चाहती हैं। निर्मल कौर सैनी भारतीय खेल जगत का एक ऐसा नाम हैं, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता।

About the author(s)

मैं एक फ्रीलांस हिन्दी राइटर हूं। मेरे लेखन सफर की शुरुआत आकाशवाणी से हुई, जहाँ मैंने पाँच वर्षों तक कैजुअल अनाउंसर के रूप में अपनी आवाज़ और अभिव्यक्ति को निखारा। इसके बाद मैंने दैनिक भास्कर और ईटीवी न्यूज़ चैनल में काम करते हुए पत्रकारिता और मीडिया की बारीकियों को करीब से समझा। अब तक मैं कई शानदार शॉर्ट फ़िल्मों की स्क्रिप्ट लिख चूकी हूं और रचनात्मक लेखन की नई दिशाओं को तलाश रही हूँ। मैं महिलाओं से जुड़े मुद्दों, उनकी चुनौतियों और सशक्तिकरण पर बेहतरीन लेख लिखना पसंद करती हूँ। जीवन में आने वाले उतार-चढ़ाव ने मुझे और मजबूत बनाया है। मैं हमेशा सीखने की चाह रखती हूँ और अपने शब्दों को अपनी पहचान बनाना चाहती हूं। ट्रैवल मेरी पसंद है जहां से मुझे लिखने की प्रेरणा मिलती है।

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