इतिहास गवाह है कि जब कोई महिला समाज को बदलने या किसी पुरानी प्रथा को चुनौती देने का निश्चय कर लेती है, तो वह असंभव को भी संभव बना देती है। महाराष्ट्र के मेलघाट के घने जंगलों में, जहां आदिवासी समुदाय पीढ़ियों से शिक्षा से दूर रहा, वहां एक शिक्षिका ने कठिन पहाड़ियों और दूर-दराज़ के गांवों तक शिक्षा की रोशनी पहुंचाई। जब लोगों ने लड़कियों को स्कूल भेजने से मना किया, तो उन्होंने घर-घर जाकर अभिभावकों को समझाया। आज वही बच्चे, जो कभी स्कूल का मतलब भी नहीं जानते थे, पढ़-लिखकर अपने समाज का नेतृत्व कर रहे हैं। भारत के इतिहास में ऐसी कई प्रेरक महिलाएं हुई हैं, लेकिन इनमें एक नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है—अनुताई वाघ। वे ऐसी महिला थीं जिन्होंने बाल-विधवा होने के दर्द को अपनी ताकत में बदला। उन्होंने समाज की कठोर परंपराओं को चुनौती दी और आदिवासी शिक्षा में एक नई दिशा स्थापित की। अनुताई ने साबित किया कि दृढ़ निश्चय और साहस से कोई भी महिला कठिन परिस्थितियों से ऊपर उठकर देश के भविष्य को बदल सकती है।
जन्म और शुरुआती जीवन
अनुताई वाघ का जन्म 17 मार्च 1910 को पुणे में हुआ था। उनके पिता बालकृष्ण वाघ सार्वजनिक निर्माण विभाग में अधिकारी थे और माता यमुनाबाई एक शिक्षित परिवार से थीं। बचपन से ही अनुताई पढ़ाई में रुचि रखती थीं और हर विषय के प्रति जिज्ञासु थीं। लेकिन उन्हें नहीं पता था कि आगे जीवन में उन्हें कितनी बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा, और वे उन चुनौतियों को कैसे अवसर में बदल देंगी। साल 1923 में, जब वे केवल 13 वर्ष की थीं, उनका विवाह शंकर वामन जातेगावकर से हो गया। लेकिन विवाह के मुश्किल से छह महीने बाद ही वे विधवा हो गईं।
साल 1923 में, जब वे केवल 13 वर्ष की थीं, उनका विवाह शंकर वामन जातेगावकर से हो गया। लेकिन विवाह के मुश्किल से छह महीने बाद ही वे विधवा हो गईं। उन्होंने अपने दुख को ताकत में बदलने का फैसला किया।
उस समय बाल-विधवाओं के लिए समाज ने जीवन को केवल दुख और सीमाओं में कैद कर रखा था। लेकिन अनुताई ने इन सीमाओं को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने अपने दुख को ताकत में बदलने का फैसला किया। सौभाग्य से उनके परिवार ने उन्हें शिक्षा जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया। यह उस दौर में एक बेहद साहसिक कदम था, क्योंकि समाज विधवाओं को घर की चारदीवारी में ही बांध देना चाहता था। लेकिन अनुताई ने शिक्षा को अपना हथियार बनाया। उन्होंने अपने भविष्य को खुद गढ़ने का निश्चय किया और एक नया मार्ग चुना। उनके इसी साहस ने उन्हें उन ऊंचाइयों तक पहुंचाया, जहां से उन्होंने हजारों आदिवासी बच्चों के जीवन में बदलाव की नींव रखी।
शिक्षा की यात्रा: संघर्ष और सफलता
साल 1925 में अनुताई ने वर्नाक्युलर फाइनल परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया। यह सिर्फ एक परीक्षा में सफलता नहीं थी, बल्कि समाज को यह संदेश था कि विधवा महिलाएं भी अपनी मेहनत और योग्यता से समाज में बड़ा योगदान दे सकती हैं। आगे 1929 में उन्होंने पुणे के महिला प्रशिक्षण महाविद्यालय से प्राथमिक शिक्षक प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम प्रथम श्रेणी में पूरा किया। इसके बाद साल 1929 से 1933 तक उन्होंने नासिक जिले के चांदवड़ तालुका के एक गाँव के स्कूल में शिक्षिका के रूप में काम किया। उस समय लड़कियों की शिक्षा के खिलाफ काफी विरोध था, फिर भी अनुताई अपने संकल्प पर अडिग रहीं। उनकी नज़र में सभी लोग समान थे। वे हर व्यक्ति को ‘मित्र’ कहकर पुकारती थीं। उनका यह व्यवहार उनके प्रगतिशील और मानवीय दृष्टिकोण का प्रतीक था। साल 1933 में वे पुणे के प्रसिद्ध हुजुरपागा स्कूल से जुड़ीं। करीब ग्यारह वर्षों तक उन्होंने इस स्कूल में काम किया। वे सिर्फ शिक्षिका ही नहीं थीं, बल्कि पुस्तकालय प्रबंधन, वार्षिक स्मारिका का संपादन और स्कूल कार्यक्रमों का आयोजन भी संभालती थीं। व्यस्तता के बावजूद उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी। उन्होंने हुजुरपागा नाइट स्कूल में दाखिला लिया और 1937 में मैट्रिक परीक्षा पास की। आगे साल 1950 में उन्होंने एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री प्राप्त की।
उस समय यह क्षेत्र बेहद दुर्गम था—न सुविधाएं थीं, न संसाधन, न परिवहन। पर अनुताई के लिए यह कठिनाई नहीं, बल्कि एक बड़ा अवसर था। इसी निर्णय ने उन्हें महाराष्ट्र के आदिवासी शिक्षा आंदोलन का एक प्रमुख चेहरा बना दिया। अगले पाँच दशकों तक उन्होंने अपना जीवन इन समुदायों के उत्थान के लिए समर्पित किया।
ताराबाई मोडक से उनका मिलना
ताराबाई मोडक से अनुताई की मुलाकात एक शिविर के दौरान हुई। ताराबाई एक प्रयोगात्मक पूर्व-प्राथमिक स्कूल शुरू करना चाहती थीं। जब उन्होंने अनुताई को दहानू तालुका के बोर्डी क्षेत्र में आदिवासी बच्चों के बीच काम करने का प्रस्ताव दिया, तो अनुताई ने तुरंत इसे स्वीकार कर लिया। उस समय यह क्षेत्र बेहद दुर्गम था—न सुविधाएं थीं, न संसाधन, न परिवहन। पर अनुताई के लिए यह कठिनाई नहीं, बल्कि एक बड़ा अवसर था। इसी निर्णय ने उन्हें महाराष्ट्र के आदिवासी शिक्षा आंदोलन का एक प्रमुख चेहरा बना दिया। अगले पाँच दशकों तक उन्होंने अपना जीवन इन समुदायों के उत्थान के लिए समर्पित किया।
उन्होंने बोर्डी–कोसबाड़ (दहानू तालुका, पालघर) की पहाड़ियों में अपना काम शुरू किया। यह घना आदिवासी इलाका था, जहां न सड़क थी, न बिजली और न ही संचार की कोई सुविधा। इसके बावजूद, ताराबाई मोडक के साथ मिलकर उन्होंने यहां एक बालवाड़ी (प्लेस्कूल) की स्थापना की। 24 दिसंबर 1945 को तत्कालीन बॉम्बे प्रेसीडेंसी के मुख्यमंत्री बी.जी. खेर ने इस केंद्र का उद्घाटन किया। आसपास आठ आदिवासी बस्तियां थीं और लगभग सौ बच्चों को शिक्षा की जरूरत थी। बाद में 1957 में इस केंद्र को कोसबाड़ हिल के वर्तमान स्थान पर स्थानांतरित किया गया। उनका काम सिर्फ शिक्षा तक सीमित नहीं था, बल्कि यह समाज के सबसे हाशिए पर मौजूद आदिवासी समुदायों के लिए उम्मीद और बदलाव की शुरुआत भी था।
अपने समाजसेवी काम के लिए अनुताई वाघ को कई प्रतिष्ठित सम्मान मिले। भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। साल 1985 में उन्हें जमनालाल बजाज पुरस्कार दिया गया।
उनके लिए आदिवासी बच्चों तक शिक्षा पहुंचाना एक आसान काम नहीं था। बच्चों को स्कूल भेजने के लिए परिवारों को तैयार करना बड़ी चुनौती थी। वह रोज़ बच्चों के घर जाती थीं। उन्हें स्कूल लाती थीं। नहलाती थीं, खाना खिलाती थीं और वापस उनके घर छोड़ती थीं। बाद में उन्होंने बच्चों को स्कूल लाने के लिए बैलगाड़ी का सहारा लिया। उन्होंने गिजुभाई बधेका के शिक्षण तरीकों को अपनाया। वे बच्चों के साथ खेलती थीं, गाती थीं, उन्हें कहानियां सुनाती और उनके आस-पास की चीजों से सीखने में मदद करती थीं। फरवरी से जून के महीनों में बच्चों की अनुपस्थिति का कारण जब उन्हें पता चला कि घरों में भोजन की कमी है, तो उन्होंने स्कूल में ही भोजन की व्यवस्था शुरू की। उनके प्रयासों ने आगे चलकर आंगनवाड़ी जैसी अवधारणाओं को मजबूत दिशा दी, जो बाद में भारत की एकीकृत बाल विकास योजना का महत्वपूर्ण हिस्सा बनीं। ठाणे जिले के आदिवासी क्षेत्रों में अनुताई के निरंतर प्रयोगों से बालवाड़ी, आंगनवाड़ी और कुरण शाला जैसी अवधारणाएं उभरकर सामने आईं, जिन्हें भारतीय शिक्षा के इतिहास में नवाचार और उपयोगिता के लिए पहचाना गया।
स्त्री शक्ति जागृति समिति की अध्यक्ष
साल 1977 से अनुताई “ठाणे जिला स्त्री शक्ति जागृति समिति” की अध्यक्ष रहीं। गांधी और विनोबा भावे के विचारों से प्रेरित होकर उन्होंने महिलाओं के मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। वे मानती थीं कि हर महिला में अपार शक्ति छिपी होती है, जो सही समय पर जागृत हो तो पूरा समाज बदल सकती है। इस संगठन के तहत उन्होंने महिलाओं और बच्चों के कल्याण के लिए कई गतिविधियाँ शुरू कीं। महिला सम्मेलनों में परिवार कल्याण, स्वास्थ्य, स्वच्छता, पोषण, कुटीर उद्योग, अंधविश्वास और सामाजिक शिक्षा जैसे विषयों पर जागरूकता फैलाई गई। 23 जून 1980 को अनुताई ने बधिर बच्चों के लिए एक फ्री स्कूल भी शुरू किया। उन्होंने “शिक्षण पत्रिका” नामक मराठी पत्रिका की संपादक भी थीं, जो बच्चों, शिक्षकों और अभिभावकों के लिए महत्वपूर्ण सामग्री प्रकाशित करती थी। साल 1981 में सावित्रीबाई फुले पुरस्कार मिलने के बाद उन्होंने “सावित्री” नाम की एक नई मासिक पत्रिका शुरू की, जो महिलाओं के मुद्दों, उनके संघर्षों और उनके योगदान को समर्पित थी। वे उसमें उन लोगों का ज़िक्र करती थीं जो समाज के लिए उल्लेखनीय काम कर रहे थे।
साल 1983 में उन्होंने दभोन नाम के एक दूरस्थ आदिवासी गाँव में “ग्राम-मंगल” परियोजना शुरू की। यह गाँव वारली समुदाय का क्षेत्र था। अनुताई ने यहां मुक्त स्कूल का प्रयोग शुरू किया। एक ऐसा स्कूल जिसके पास न इमारत थी, न तय पाठ्यक्रम।
उनका काम, दिए गए सम्मान और लेगसी
साल 1983 में उन्होंने दभोन नाम के एक दूरस्थ आदिवासी गाँव में “ग्राम-मंगल” परियोजना शुरू की। यह गाँव वारली समुदाय का क्षेत्र था। अनुताई ने यहां मुक्त स्कूल का प्रयोग शुरू किया। एक ऐसा स्कूल जिसके पास न इमारत थी, न तय पाठ्यक्रम। शिक्षा गतिविधियों और बच्चों के अनुभवों से जन्म लेती थी। साल 1982 में उन्होंने रमेश पानसे के साथ मिलकर ग्राम-मंगल की सह-स्थापना की। यह संस्था आज भी महाराष्ट्र और अन्य राज्यों में बच्चों के सीखने की प्रक्रिया को समृद्ध कर रही है। अनुताई का मानना था कि शिक्षा वह सबसे ताक़तवर हथियार है जिससे दुनिया बदली जा सकती है। अपने समाजसेवी काम के लिए अनुताई वाघ को कई प्रतिष्ठित सम्मान मिले। भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। साल 1985 में उन्हें जमनालाल बजाज पुरस्कार दिया गया। साल 1981 में उन्हें सावित्रीबाई फुले पुरस्कार मिला। बाल कल्याण के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर सर्वश्रेष्ठ कार्यकर्ता का सम्मान भी मिला। वे इन सम्मानों को अपनी उपलब्धि नहीं, बल्कि उन बच्चों की जीत मानती थीं जिनके लिए वे जीवनभर काम करती रहीं।
27 सितंबर 1992 को अनुताई वाघ का निधन हो गया, लेकिन उनका काम आज भी जीवित है। कोसबाड़ की पहाड़ियों में बने उनके स्कूल आज भी आदिवासी बच्चों को शिक्षा दे रहे हैं। एक बाल विधवा से पद्मश्री बनने का उनका जीवन-सफर बताता है कि दृढ़ इच्छाशक्ति हो तो कोई भी बाधा बड़ी नहीं होती। उन्होंने न केवल बच्चों को शिक्षा दी, बल्कि उन्हें अपनी संस्कृति और पहचान के साथ आगे बढ़ना भी सिखाया। आज जब हम किसी आंगनवाड़ी को देखते हैं, हमें अनुताई वाघ याद आती हैं क्योंकि इस विचार को आकार देने में उनका योगदान सबसे महत्वपूर्ण था। उनकी विरासत हर उस बच्चे की मुस्कान में ज़िंदा है जो आज शिक्षा पा रहा है, खासकर उन बच्चों में जो हाशिए पर हैं।


Inspiring story and very well articulated
Thank You Samruddhi
So good dear. We all proud of you. Well done
Very well written