बीते दिनों झांसी की पहली महिला ऑटो रिक्शा चालक अनीता चौधरी की हत्या ने देश में महिला सुरक्षा पर बहस छेड़ दी है। उत्तर प्रदेश की इस घटना ने असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं की सुरक्षा व्यवस्था की ख़ामियों को उजागर करने का भी काम किया है। हालांकि मामला निजी संबंधों के टकराव का बताया जाता है। लेकिन यह समाज में मौजूद उस कड़वी सच्चाई को भी सामने लाने का काम करता है जिसका सामना सार्वजनिक जगहों पर काम करने वाली महिलाओं करना पड़ता है। तालपुरा इलाके के अंबेडकर नगर में रहने वाली 45 साल की अनीता शादीशुदा और तीन बच्चों की माँ थीं।
15 सालों तक इन्होंने एक निजी कंपनी में काम किया था। साल 2020 में कोरोना महामारी के समय इनकी नौकरी छूट गई। इस दौरान परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होने से इन्होंने ऑटो रिक्शा चलाने का फ़ैसला किया। इसके लिए इन्हें बैंक से भी सहयोग नहीं मिला साथ ही परिवार और रिश्तेदारों का भी विरोध का भी सामना करना पड़ा। इसके बावजूद इन्होंने हिम्मत नहीं हारी और 18 फरवरी 2021 को फाइनेंस पर ऑटो खरीदा और उसे शहर में चलाने लगीं। इस तरह इन्होंने झांसी शहर की पहली महिला ऑटो रिक्शा चालक का दर्ज़ा हासिल किया।
झांसी की पहली महिला ऑटो रिक्शा चालक अनीता चौधरी की हत्या ने देश में महिला सुरक्षा पर बहस छेड़ दी है। उत्तर प्रदेश की इस घटना ने असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं की सुरक्षा व्यवस्था की ख़ामियों को उजागर करने का भी काम किया है।
क्या थी घटना
4 जनवरी को वह रात करीब 9.30 बजे घर से काम के लिए निकली थी और उसने परिवार को अपने रोज़ के काम के बारे में बताया था। जब वह देर रात तक घर नहीं लौटी, तो परिवार परेशान हो गया। उन्हें सुबह करीब 3.30 बजे एक कॉल आया जिसमें बताया गया कि अंकिता स्टेशन रोड पर घायल मिली है। उनके पति द्वारिका चौधरी, जो बस स्टैंड के पास एक छोटी सी ठेला लगाते हैं, ने कथित आरोप लगाया कि लूट के बाद उनकी हत्या कर दी गई। अनीता का ऑटो-रिक्शा थोड़ी दूरी पर पड़ा मिला, जबकि गहने और मोबाइल फोन गायब थे। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट अनुसार आरोपी ने पुलिस को बताया कि उसकी और अनीता की पहले शादी हुई थी, लेकिन बाद में यह रिश्ता नहीं चल पाया। पुलिस के अनुसार, आरोपी ने इस घटना का बदला लेने के लिए उनकी शादी की सालगिरह की रात को अपराध को अंजाम दिया। रिपोर्ट अनुसार कथित आरोपी मानता था कि अनीता ने उसके साथ विश्वासघात किया है। इसी सोच के तहत उसने बदला लेने के लिए उनकी शादी की सालगिरह की रात को चुना था।
असंगठित क्षेत्र में महिलाओं के सामने चुनौतियां
असंगठित क्षेत्र की महिलाओं के लिए सामाजिक सुरक्षा का अभाव एक बड़ा संकट है। औपचारिक कर्मचारियों को मिलने वाले स्वास्थ्य बीमा, पेंशन, मेटरनिटी लिव जैसे लाभ असंगठित क्षेत्र में उपलब्ध नहीं होते हैं, जिससे बीमारी, गर्भावस्था या वृद्धावस्था में इन्हें भारी आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा, कई क्षेत्रों में महिलाओं की मौजूदगी दर्ज करने के बावजूद, उन्हें कार्यस्थल पर यौन हिंसा से सुरक्षा नहीं मिलता। स्टैटिस्टा के अनुसार भारत के कुल रोजगार का लगभग 90 फीसद हिस्सा असंगठित क्षेत्र में है। घरों में अवैतनिक और वैतनिक काम करने वाली, खेतों में मजदूरी करने वाली और रेहड़ी पटरी पर छोटे-छोटे काम धंधे करने वाली महिलाएं इसका एक बड़ा हिस्सा हैं।
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट अनुसार आरोपी ने पुलिस को बताया कि उसकी और अनीता की पहले शादी हुई थी, लेकिन बाद में यह रिश्ता नहीं चल पाया। पुलिस के अनुसार, आरोपी ने इस घटना का बदला लेने के लिए उनकी शादी की सालगिरह की रात को अपराध को अंजाम दिया।
प्रेस इनफॉर्मेशन ब्यूरो के 2023-24 के आंकड़ों के अनुसार लगभग 61 फीसद महिला कामगार अनौपचारिक असंगठित क्षेत्रों में काम करती हैं। इनको सार्वजनिक जगहों पर बहुत सारी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले पुरुष कामगारों की तुलना में महिलाओं को ज़्यादा जोख़िम उठाना पड़ता है। इसके बावजूद इनके लिए कोई विशेष प्रावधान मौजूद नहीं हैं। सार्वजनिक जगहों जैसे कि सड़कों-बाज़ारों में काम करने वाली महिलाओं के साथ हिंसा और उत्पीड़न के ख़तरे कई गुना ज़्यादा होते हैं। पुरुष प्रधान पेशों में जाने वाली महिलाओं को समाज में पहले से मौजूद पूर्वाग्रह और लैंगिक भेदभाव से भी जूझना पड़ता है। इसके अलावा किसी भी तरह की घटना होने पर इन्हें अकेले ही उससे निपटना पड़ता है।
किसी भी तरह के संगठन या यूनियन न होने से इन्हें अपने हक़ और सुरक्षा से भी समझौता करना पड़ जाता है। इसके अलावा परिवहन के क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं के सामने अलग तरह की चुनौतियां होती हैं। ऑटो या टैक्सी चलाने के लिए देर रात काम करना पड़ता है जो कि काफ़ी जोख़िम भरा होता है। इस तरह का काम ज़्यादातर अकेले होता है इसलिए किसी भी तरह की समस्या होने पर तुरंत मदद मिलना मुश्किल होता है। क़ानून और प्रशासन की मदद भी अक्सर देरी से मिलती है और कई बार तो कोई मदद मिलती ही नहीं। इस हत्याकांड से पता चलता है कि निजी विवाद और पेशेगत जोख़िम जब मिल जाते हैं तो ख़तरनाक रूप ले लेते हैं।
प्रेस इनफॉर्मेशन ब्यूरो के 2023-24 के आंकड़ों के अनुसार लगभग 61 फीसद महिला कामगार अनौपचारिक असंगठित क्षेत्रों में काम करती हैं। इनको सार्वजनिक जगहों पर बहुत सारी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले पुरुष कामगारों की तुलना में महिलाओं को ज़्यादा जोख़िम उठाना पड़ता है।
महिला सुरक्षा के लिए देश में मौजूद क़ानून
असंगठित क्षेत्र में महिलाओं को यौन हिंसा, उत्पीड़न, दुर्व्यवहार और सुरक्षित कार्यस्थल की कमी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यौन हिंसा के रोकथाम कानून (शोषण रोकथाम अधिनियम) तो है, पर इसका असंगठित क्षेत्र में लागू होना मुश्किल है क्योंकि वहां स्थानीय शिकायत समितियां या शिकायत निवारण तंत्र मौजूद नहीं है। घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम, 2005, दहेज निषेध अधिनियम, 1961, महिलाओं का अश्लील चित्रण (निषेध) अधिनियम, 1986, कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 इनमें से महत्त्वपूर्ण हैं। इसके बावजूद इनके प्रभावी तरीके से लागू होने में समस्याएं हैं जिस वजह से इनका पूरा फ़ायदा नहीं मिल पाता है। ख़ास तौर पर असंगठित क्षेत्र में उनकी पहुंच बहुत सीमित है। इसके अलावा देश में स्ट्रीट वेंडर्स (आजीविका संरक्षण एवं स्ट्रीट वेंडिंग विनियमन) ऐक्ट, 2014 भी मौजूद है लेकिन इसमें भी महिलाओं की ख़ास ज़रूरतों और सुरक्षा को लेकर कोई ख़ास प्रावधान नहीं है।
क्या हो सकता है समाधान?
इन समस्याओं के समाधान के लिए सबसे पहले तो प्रशासन के स्तर पर काम करने की ज़रूरत है। महिलाओं की सुरक्षा के लिए ख़ास तौर पर नीतियां बनाने की ज़रूरत है। असंगठित क्षेत्र को भी मौजूदा क़ानून के दायरे में शामिल किया जाना चाहिए। तकनीक का इस्तेमाल जैसे कि जीपीएस, पैनिक बटन और इमरजेंसी ऐप्स का इस्तेमाल महिला सुरक्षा के लिए किया जा सकता है। सिर्फ सीसीटीवी कैमरे से निगरानी रखना ही नहीं, सार्वजनिक जगहों पर 24 घंटे पुलिस गश्त अपराध को रोकने में प्रभावी हो सकता है। जरूरी है कि प्रसाशन भी यौन हिंसा और सर्वाइवर्स के प्रति संवेदनशील बने। इसके अलावा किसी भी तरह की घटना होने पर शिकायत और मदद के लिए विशेष सेल बनाने से जल्दी समाधान सुनिश्चित किया जा सकता है। महिलाओं के लिए अलग से सेफ्टी नेटवर्क और यूनियन बनाने की भी ज़रूरत है।
इसके अलावा समाज से लैंगिक भेदभाव और रूढ़िवादी पितृसत्तात्मक सोच को ख़त्म करना भी बेहद ज़रूरी है। जिससे सभी जेंडर्स को बराबर अधिकार मिले और महिलाओं के अधिकारों और फ़ैसलों को सम्मान मिले। जिससे कोई पुरुष महिला को कमोडिटी समझकर उस पर अपनी मनमानी चलाने की कोशिश ना करे जैसा कि अनीता चौधरी के मामले में हुआ। अनीता चौधरी हत्याकांड केवल एक मामला नहीं पूरे क़ानून व्यवस्था के लिए भी एक चेतावनी है। अनीता के परिवार को न्याय मिलना बेशक ज़रूरी है लेकिन इसके साथ-साथ यह भी ज़रूरी है कि आने वाले समय में ऐसी घटनाएं न हों और महिलाएं बिना किसी डर के अपनी मर्ज़ी से ज़िन्दगी जी सकें इसके लिए मजबूत क़ानून व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
About the author(s)
प्रीति खरवार एक स्वतंत्र लेखिका हैं, जो शोध-आधारित हिंदी-लेखन में विशेषज्ञता रखती हैं। मनोविज्ञान में पोस्ट ग्रेजुएट प्रीति नारीवाद, जेण्डर और समानता जैसे विषयों में विशेष रुचि रखती हैं।


