समाजख़बर केन-बेतवा परियोजना: महिलाओं का देह-आधारित प्रतिरोध और राजनीति

केन-बेतवा परियोजना: महिलाओं का देह-आधारित प्रतिरोध और राजनीति

8 अप्रैल को स्थानीय महिलाओं ने ‘चिता आंदोलन’ कर प्रशासन को यह संदेश देने की कोशिश की कि यह परियोजना उनके जीवन, संस्कृति और विरासत के लिए एक तरह से ‘मौत’ के समान है। धरने, प्रदर्शन और सड़क जाम करने जैसे विरोध के अलग-अलग तरीकों के ज़रिए, महिलाएं लगातार इस आंदोलन को मजबूती दे रही हैं।

देश के विकास के लिए अलग-अलग महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट की शुरुआत की जाती है, जो कई बार  उपलब्धियों से भरा होता है, तो कई बार प्रतिरोध की कहानियों से भी घिरा होता है। सत्तर के दशक में केरल की ‘साइलेंट वैली’ को बचाने का संघर्ष हो या नब्बे के दशक में ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ की गूंज, इन आंदोलनों ने बार-बार यह सवाल उठाया है कि विकास की कीमत आखिर कौन चुकाता है? आज वही सवाल केन-बेतवा लिंक परियोजना के सामने खड़ा है। बीते दिनों मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के छतरपुर इलाके में केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना को लेकर स्थानीय आदिवासी लगातार विरोध कर रहे हैं।

डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट के अनुसार धोंधन गाँव के पास बांध का निर्माण तेजी से चल रहा है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि उनसे सहमति नहीं ली गई है। उनके अनुसार उनके विरोध प्रदर्शनों को भी कथित तौर पर दबाया जा रहा है। 8 अप्रैल को स्थानीय महिलाओं ने ‘चिता आंदोलन’ कर प्रशासन को यह संदेश देने की कोशिश की कि यह परियोजना उनके जीवन, संस्कृति और विरासत के लिए एक तरह से ‘मौत’ के समान है। धरने, प्रदर्शन और सड़क जाम करने जैसे विरोध के अलग-अलग तरीकों के ज़रिए, महिलाएं लगातार इस आंदोलन को मजबूती दे रही हैं।

8 अप्रैल को स्थानीय महिलाओं ने ‘चिता आंदोलन’ कर प्रशासन को यह संदेश देने की कोशिश की कि यह परियोजना उनके जीवन, संस्कृति और विरासत के लिए एक तरह से ‘मौत’ के समान है। धरने, प्रदर्शन और सड़क जाम करने जैसे विरोध के अलग-अलग तरीकों के ज़रिए, महिलाएं लगातार इस आंदोलन को मजबूती दे रही हैं।

आखिर क्या है केन-बेतवा प्रोजेक्ट?

आज मध्य भारत की सूखी धरती पर केन-बेतवा नदी जोड़ परियोजना उम्मीद और विवाद—दोनों का केंद्र बन गई है। 440 अरब रुपये की इस योजना के तहत मध्य प्रदेश की केन नदी का पानी नहरों, सुरंगों और बांध के ज़रिए उत्तर प्रदेश की बेतवा नदी तक पहुंचाया जाएगा, जिससे सूखा-ग्रस्त बुंदेलखंड क्षेत्र को राहत मिलने की उम्मीद है। सरकार के मुताबिक, साल 2030 तक पूरी होने वाली यह परियोजना 10.6 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई, 62 लाख लोगों को पेयजल और 130 मेगावाट ऊर्जा उपलब्ध कराएगी। साल 1980 के दशक की ‘नैशनल पर्सपेक्टिव प्लान’ का हिस्सा रही इस योजना को साल 2021 में मंज़ूरी मिली और इसकी आधारशिला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रखी। लेकिन, इसके साथ न सिर्फ गाँववालों बल्कि पर्यावरणविद् की चिंताएं भी जुड़ी हैं। बांध और नहर निर्माण से 20 से अधिक गाँव प्रभावित होंगे और 7,000 से ज़्यादा परिवारों को विस्थापन का सामना करना पड़ेगा। ऐसे में यह परियोजना विकास और सामाजिक-पर्यावरणीय संतुलन के बीच एक अहम बहस को सामने लाती है।

महिलाएं क्यों कर रही हैं प्रोजेक्ट को लेकर विवाद

डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट के अनुसार धोंधन गाँव के पास बांध का निर्माण तेजी से चल रहा है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि उनसे सहमति नहीं ली गई है। उनके अनुसार उनके विरोध प्रदर्शनों को भी कथित तौर पर दबाया जा रहा है। 8 अप्रैल को स्थानीय महिलाओं ने ‘चिता आंदोलन’ कर प्रशासन को यह संदेश देने की कोशिश की कि यह परियोजना उनके जीवन, संस्कृति और विरासत के लिए एक तरह से ‘मौत’ के समान है। धरने, प्रदर्शन और सड़क जाम करने जैसे विरोध के अलग-अलग तरीकों के ज़रिए, महिलाएं लगातार इस आंदोलन को मजबूती दे रही हैं। रिपोर्ट अनुसार इस परियोजना से कुल 24 गाँव प्रभावित हो रहे हैं। इनमें से 8 गाँव पूरी तरह से डूब क्षेत्र में आ रहे हैं, जबकि 16 गाँवों को पन्ना टाइगर रिज़र्व के विस्तार के लिए दूसरी जगह बसाया जा रहा है।

बांध और नहर निर्माण से 20 से अधिक गाँव प्रभावित होंगे और 7,000 से ज़्यादा परिवारों को विस्थापन का सामना करना पड़ेगा। ऐसे में यह परियोजना विकास और सामाजिक-पर्यावरणीय संतुलन के बीच एक अहम बहस को सामने लाती है।

नतीजतन, पर्यावरण और बाघों के आवास पर एक गंभीर खतरा मंडरा रहा है। यह एक ऐसा मुद्दा है जिसपर पहले भी सुप्रीम कोर्ट और विशेषज्ञ संस्थाओं ने विचार-विमर्श किया है। आंदोलन में शामिल लोग ‘भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और मुआवज़ा अधिनियम, 2013’ के तहत उचित मुआवज़े और पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं। उनकी प्रमुख मांगों में ज़मीन के बदले ज़मीन, सांस्कृतिक अधिकारों की सुरक्षा और ग्राम सभा की वास्तविक सहमति शामिल है। उनका आरोप है कि उन्हें प्रक्रिया की सही जानकारी नहीं दी गई और सिर्फ अपर्याप्त मुआवज़ा या अनौपचारिक प्रस्ताव दिए जा रहे हैं।

रिपोर्ट अनुसार वन अधिकार अधिनियम, 2006 के पालन पर भी सवाल उठ रहे हैं क्योंकि आदिवासी समुदायों के वन अधिकार अब तक पूरी तरह मान्यता नहीं पा सके हैं। बता दें कि कमलेश प्रजापति बनाम मध्य प्रदेश राज्य मामले में भी अदालत ने कहा था कि बिना वास्तविक सहमति और कानून के पालन के; विस्थापन वैध नहीं माना जा सकता। मीडिया रिपोर्ट्स बताती है कि इसके बावजूद परियोजना पर काम जारी है और विरोध प्रदर्शनों पर पाबंदियां भी लगी हुई हैं।

नैशनल हेराल्ड में छपी रिपोर्ट अनुसार, केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट अथॉरिटी के मुताबिक, 77 मीटर ऊंचे धोंधन बांध के बनने से छतरपुर ज़िला के 5,288 परिवार और पन्ना ज़िला के करीब 1,400 परिवारों को अपना घर छोड़ना पड़ेगा। यह ज़मीन के डूबने और बांध के लिए ज़मीन अधिग्रहण की वजह से होगा। यह बांध पन्ना टाइगर रिज़र्व को दो हिस्सों में बांट देगा और लगभग 5,578 हेक्टेयर जंगल भी पानी में डूब जाएगा।

अपने हक के लिए संघर्ष कर रहे हैं ग्रामीण

विकास की हर बड़ी परियोजना अपने साथ विस्थापन का दर्द भी लेकर आती है। सरकार के बहुआयामी केन-बेतवा प्रोजेक्ट ने जल संकट दूर करने और लाखों हेक्टेयर भूमि की सिंचाई के जरिए एक सुनहरे भविष्य का सपना दिखाया है, लेकिन इसी विकास की कीमत सैकड़ों आदिवासी परिवार अपने वर्तमान सपनों को खोकर चुका रहे हैं। वे लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। नैशनल हेराल्ड में छपी रिपोर्ट अनुसार, केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट अथॉरिटी के मुताबिक, 77 मीटर ऊंचे धोंधन बांध के बनने से छतरपुर ज़िला के 5,288 परिवार और पन्ना ज़िला के करीब 1,400 परिवारों को अपना घर छोड़ना पड़ेगा। यह ज़मीन के डूबने और बांध के लिए ज़मीन अधिग्रहण की वजह से होगा। यह बांध पन्ना टाइगर रिज़र्व को दो हिस्सों में बांट देगा और लगभग 5,578 हेक्टेयर जंगल भी पानी में डूब जाएगा।

यह रिज़र्व कुल 543 वर्ग किलोमीटर में फैला है और खास इसलिए है क्योंकि यहां साल 2009 में बाघों को दोबारा बसाया गया था, जब वे लगभग खत्म हो चुके थे। साल 2019 में सुप्रीम कोर्ट के बनाए गए एक विशेषज्ञ पैनल ने भी इस परियोजना पर चिंता जताई थी। पैनल ने कहा था कि इस प्रोजेक्ट की आर्थिक उपयोगिता पर सवाल  है और इससे इलाके के वन्यजीवों को नुकसान हो सकता है। उन्होंने सरकार को सुझाव दिया था कि नदी के पानी के इस्तेमाल के लिए दूसरे तरीकों, जैसे बेहतर सिंचाई योजनाओं, पर भी विचार किया जाना चाहिए। बीबीसी की रिपोर्ट बताती है कि इस प्रोजेक्ट से सालों की संरक्षण की कोशिशें बेकार हो सकती हैं। रिपोर्ट में पर्यावरणविद अमित भटनागर कहते हैं कि यह अभूतपूर्व है। हमने पहले कभी किसी नैशनल पार्क के मुख्य क्षेत्र का इस्तेमाल इतने बड़े पैमाने के इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट के लिए होते हुए नहीं देखा है।

पर्यावरणविद अमित भटनागर कहते हैं कि यह अभूतपूर्व है। हमने पहले कभी किसी नैशनल पार्क के मुख्य क्षेत्र का इस्तेमाल इतने बड़े पैमाने के इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट के लिए होते हुए नहीं देखा है।

पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता परियोजना 

चिंता का विषय केवल विस्थापन नहीं है बल्कि यह प्रतिष्ठित परियोजना पर्यावरण के दृष्टि से भी कई सवाल खड़े करता है। आधिकारिक तौर पर यह बताया गया है कि केन नदी के  अतिरिक्त जल को बेतवा नदी में स्थांतरित किया जाएगा लेकिन केन नदी में अतिरिक्त जल का कोई प्रमाण नहीं मिलता। इसके अलावा, भारत में नदी जोड़ने वाली परियोजनाओं पर किए गए कई स्वतंत्र अध्ययनों में भी ऐसे ही खतरे और चिंताएं सामने आई हैं। ‘नेचर कम्युनिकेशंस’ जर्नल में साल 2023 में प्रकाशित एक अध्ययन में कहा गया है कि इस तरह के प्रयास पूरे देश में जल संकट को और भी बदतर बना सकते हैं, जिससे ये परियोजनाएं अप्रभावी या संभवतः विपरीत परिणाम देने वाली भी साबित हो सकती हैं।

द प्रिन्ट में छपी रिपोर्ट मुताबिक जल शक्ति मंत्रालय के अनुसार मध्य प्रदेश में महत्वाकांक्षी ‘केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना’ के लिए 17,000 से अधिक पेड़ काटे जाएंगे, जिनमें पन्ना टाइगर रिज़र्व के भीतर के 12,000 से अधिक पेड़ भी शामिल हैं। केन-बेतवा लिंक परियोजना आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि बुंदेलखंड को पानी की सख्त जरूरत है और कृषि के विकास के लिए सिंचाई की व्यवस्था भी जरूरी है। लेकिन, ‘साइलेंट वैली’ और ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ का इतिहास हमें यह सिखाता है कि जो विकास पारिस्थितिकी और स्थानीय जनमानस के हितों को नजरअंदाज करता है, वह स्थायी नहीं हो सकता।

लाखों पेड़ों का काटा जाना, पर्यावरण का नुकसान और हजारों परिवारों का बेघर होना प्रगति नहीं हो सकता। सरकार को चाहिए कि वह इस परियोजना को केवल एक ‘इंजीनियरिंग टास्क’ न मानकर, एक मानवीय संवेदना और पर्यावरणीय संकट के रूप में भी देखे। उचित मुआवजे का निर्धारण, विस्थापितों का सम्मानजनक पुनर्वास और पर्यावरण की क्षतिपूर्ति के लिए पारदर्शी कदम उठाना ही इस गतिरोध का एकमात्र समाधान है। यदि समय रहते इन आंदोलनों की आवाज़ को नीति-निर्माण का हिस्सा नहीं बनाया गया, तो केन-बेतवा प्रोजेक्ट भी उपलब्धियों के बजाय संघर्ष की एक और ऐसी कहानी बनकर रह जाएगा, जिसमें प्यास तो बुझेगी लेकिन प्रकृति और विश्वास की नींव हमेशा के लिए दरक जाएगी। विकास वही सार्थक है, जो धरती को हरा और मनुष्य को सुरक्षित रखे।

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