समाजख़बर सबरीमाला विवाद: स्त्री देह पर नियंत्रण की राजनीति या धर्म की रक्षा?

सबरीमाला विवाद: स्त्री देह पर नियंत्रण की राजनीति या धर्म की रक्षा?

सबरीमाला विवाद केवल एक मंदिर या परंपरा का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह स्त्री के शरीर, उसकी गरिमा और उसके संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा मुद्दा है। जब धार्मिक मान्यताएं महिलाओं को उनके जैविक अस्तित्व के आधार पर बाहर करती हैं, तो यह समानता के मूल सिद्धांतों के खिलाफ खड़ा होता है।

पीरियड्स एक जैविक और शारीरिक क्रिया है लेकिन रूढ़िवादी सामाजिक विचारधाराओं के कारण समाज में पीरियड्स को लेकर बहुत सी भ्रांतियां बनी हुई हैं। इन्हीं मान्यताओं की वजह से बहुत सी जगहों पर जाना, पूजा पाठ का सामान छूना आदि पीरियड्स के वक्त महिलाओं के लिए मना होता है। जैसे, इस दौरान लड़कियां और महिलाएं किसी धार्मिक स्थान पर नहीं जा सकती, रसोई घर में जाना भी अधिकांश जगहों पर मना होता है। यह बहुत बड़ी विडम्बना है कि हमारे समाज में मिथक और मान्यताओं का अनुकरण पढ़े-लिखे लोग भी करने लगते हैं, जिसके कारण बहुत सारे अंधविश्वास  समाज में फलते-फूलते हैं और धीरे-धीरे अपनी जगह बना लेते हैं। इसी संदर्भ में बीते दिनों सबरीमाला मामले की सुनवाई के दौरान, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने अनुच्छेद 17 के लागू होने के मुद्दे पर तीखी टिप्पणी की।

उन्होंने कहा कि महिलाओं को महीने में तीन दिन चुनिंदा रूप से ‘अस्पृश्यता’ की तरह नहीं माना जा सकता और चौथे दिन से उसे अछूत मानना ​​बंद नहीं किया जा सकता। यह टिप्पणी तब आई जब सॉलिसिटर जनरल  (एसजी) तुषार मेहता ने साल 2018 के फैसले की एक टिप्पणी पर आपत्ति जताई थी।न्यायमूर्ति की ये टिप्पणियां उन दलीलों के संदर्भ में आईं जिसमें पीरियड्स वाली महिलाओं के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश पर प्रतिबंध का जिक्र किया गया था। सर्वोच्च न्यायालय के साल 2018 के एक फैसले ने पीरियड्स की शुरुआत और मेनोपॉज के बीच की अवधि में महिलाओं के प्रवेश पर सदियों पुराने प्रतिबंध को हटा दिया था। न्यायालय ने कहा था कि यह प्रतिबंध धार्मिक स्वतंत्रता को निरर्थक बना देता है और महिलाओं की व्यक्तिगत गरिमा पर कलंक है।

सबरीमाला मामले की सुनवाई के दौरान, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने अनुच्छेद 17 के लागू होने के मुद्दे पर तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि महिलाओं को महीने में तीन दिन चुनिंदा रूप से ‘अस्पृश्यता’ की तरह नहीं माना जा सकता और चौथे दिन से उसे अछूत मानना ​​बंद नहीं किया जा सकता।

अधिकारों और आस्था के बीच टकराव

लाइव लॉ में छपी खबर के मुताबिक, साल 2018 में सर्वोच्च न्यायालय की पांच न्यायाधीशों की पीठ ने फैसला सुनाया था, कि पीरियड्स वाली महिलाओं को सबरीमाला में प्रवेश न देना संविधान के विरुद्ध है और सभी महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी जानी चाहिए। इस साल 4 अप्रैल को, सर्वोच्च न्यायालय ने लंबे समय से लंबित सबरीमाला पुनर्विचार मामले की सुनवाई के लिए नौ न्यायाधीशों की पीठ के गठन की अधिसूचना जारी की थी। इस पीठ में भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति नागरत्ना, एम.एम. सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ए.जी. मसीह, आर. महादेवन, प्रसन्ना बी. वराले और जस्टिस जॉयमाल्या बागची शामिल हुए। केंद्र सरकार ने विस्तृत लिखित दलीलों में 2018 के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिकाओं का समर्थन किया है। सरकार का तर्क है कि किसी पूजा स्थल में कौन प्रवेश कर सकता है। यहां सवाल लैंगिक भेदभाव का पहलू नहीं है, बल्कि धार्मिक रीति-रिवाजों, विश्वासों और देवता के विशिष्ट स्वरूप से जुड़ा है।

पुनर्विचार याचिकाओं की सुनवाई कर रही पीठ में एकमात्र महिला न्यायाधीश, न्यायमूर्ति नागरत्ना ने इस मामले में अनुच्छेद 17 के लागू होने पर संदेह व्यक्त किया। इसके अलावा, केंद्र ने इस बात पर जोर दिया कि सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल की उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध धार्मिक आस्था और सांप्रदायिक स्वायत्तता का मामला है, और इसलिए यह अदालत के अधिकार क्षेत्र से बाहर है। अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का हवाला देते हुए, केंद्र सरकार का प्रतिनिधित्व करते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि यदि धार्मिक प्रथाएं, सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा करती हैं, तो न्यायालय हस्तक्षेप कर सकते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने आगे कहा कि अगर कोई धार्मिक प्रथा सामाजिक बुराई के बराबर है, तो न्यायालय यह निर्धारित कर सकता है कि यह एक ज़रूरी धार्मिक प्रथा है या केवल एक हानिकारक रीति-रिवाज । स्पष्ट रूप से, सबरीमाला मंदिर केवल एक विशेष आयु वर्ग के लिए है। इसमें कोई भ्रम नहीं होना चाहिए। देश और दुनिया भर में भगवान अय्यप्पा के मंदिर सभी उम्र की महिलाओं के लिए खुले हैं। यह केवल एक मंदिर है जिसमें यह प्रतिबंध है, यह एक अनोखा मामला है।

लाइव लॉ में छपी खबर के मुताबिक, साल 2018 में सर्वोच्च न्यायालय की पांच न्यायाधीशों की पीठ ने फैसला सुनाया था कि पीरियड्स वाली महिलाओं को सबरीमाला में प्रवेश न देना संविधान के विरुद्ध है और सभी महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी जानी चाहिए।

केंद्र सरकार की महिलाओं के प्रवेश पर आपत्ति 

केंद्र सरकार ने इस फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई थी, जिसमें मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध की तुलना अस्पृश्यता से की गई थी। केंद्र सरकार ने कहा कि किसी विशेष धार्मिक संस्था में समाज के एक वर्ग के प्रवेश को विनियमित करने का किसी विशेष धार्मिक संप्रदाय का निर्णय एक धार्मिक अधिकार के रूप में संरक्षित किया जाना चाहिए। अगर सभी धार्मिक संस्थाओं में व्यक्तियों के एक पूरे वर्ग के प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया जाता है, तो न्यायालय नागरिक अधिकारों और धार्मिक संप्रदाय अधिकारों के बीच संतुलन बनाने के लिए हस्तक्षेप कर सकते हैं।मंदिर में प्रवेश निषेध की तुलना अस्पृश्यता से न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ (अब सेवानिवृत्त) ने अपने अलग मत में की थी, जो साल 2018 के सबरीमाला फैसले का हिस्सा था। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने पीरियड की स्थिति के आधार पर महिलाओं के सामाजिक बहिष्कार को ‘एक प्रकार की अस्पृश्यता’ करार दिया था और कहा था कि ‘पवित्रता और अपवित्रता’ की धारणाएं व्यक्तियों को कलंकित करती हैं। उन्होंने अपने मत में कहा था कि महिलाओं को बाहर रखना समान नागरिकता का अपमान है।

हालिया मामले में महिलाओं के प्रवेश को लेकर मेहता कहते हैं कि भारत ने हमेशा महिलाओं को न केवल समान दर्जा दिया है, बल्कि उन्हें उच्च स्थान भी दिया है। हम एकमात्र ऐसी संस्कृति हैं जो महिला देवी-देवताओं को नमन करती है। लेकिन हाल के कई फैसलों में हम पर पितृसत्ता और लैंगिक रूढ़िवादिता का आरोप लगाया गया है,ऐसा कभी नहीं था। हम महिलाओं की पूजा करते हैं। भारत के राष्ट्रपति से लेकर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों तक, हम अपनी महिला देवी-देवताओं के समक्ष नमन करते हैं। भारत उतना पितृसत्तात्मक या लैंगिक रूढ़िवादिता वाला नहीं है, जितना पश्चिम समझता है। कुछ धार्मिक रीति-रिवाज हैं जिनका हमें सम्मान करना चाहिए। सब कुछ मानवीय गरिमा और व्यक्तिगत आजादी पर निर्भर नहीं है। यह किसी धर्म की आस्था और सिद्धांतों का सम्मान करने से भी संबंधित है, न कि केवल गरिमा या शारीरिक स्वायत्तता छीनने से, मौलिक अधिकार अलग-थलग नहीं हो सकते।  

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा था कि महिलाओं को उनकी प्राकृतिक जैविक विशेषताओं के कारण किसी कमतर देवता की संतान मानना ​​संविधान की अवहेलना है। यह प्रतिबंध एक प्रकार की अस्पृश्यता है, उन्होंने कहा कि प्रतिबंध के पीछे तर्क यह था कि महिलाओं की उपस्थिति पुरुषों को ब्रह्मचर्य से विचलित करती है। इससे पुरुषों के ब्रह्मचर्य का बोझ महिलाओं पर पड़ता है, जिससे महिलाओं को रूढ़ियों में बांधा जाता है।

पुरुष का ब्रह्मचर्य स्त्री पर बोझ नहीं हो सकता

द हिन्दू में छपी एक खबर के मुताबिक, न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा था कि महिलाओं को उनकी प्राकृतिक जैविक विशेषताओं के कारण किसी कमतर देवता की संतान मानना ​​संविधान की अवहेलना है। यह प्रतिबंध एक प्रकार की अस्पृश्यता है, उन्होंने कहा कि प्रतिबंध के पीछे तर्क यह था कि महिलाओं की उपस्थिति पुरुषों को ब्रह्मचर्य से विचलित करती है। इससे पुरुषों के ब्रह्मचर्य का बोझ महिलाओं पर पड़ता है, जिससे महिलाओं को कलंकित किया जाता है और उन्हें रूढ़ियों में बांधा जाता है। महिलाओं की व्यक्तिगत गरिमा को भीड़ के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। नैतिकता कभी बदलने वाली या थोड़े समय की नहीं होती। यह शरीर की प्राकृतिक प्रक्रियाओं या जैविक कारणों से प्रभावित नहीं होती। यह सुनवाई धार्मिक स्वतंत्रता और कानून बनाने के अधिकार से जुड़े संवैधानिक प्रश्नों के समाधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। सर्वोच्च न्यायालयका दृष्टिकोण धार्मिक प्रथाओं और कानूनी सुधारों के संबंध में शक्तियों के पृथक्करण को स्पष्ट करेगा।

इससे पहले, पांच न्यायाधीशों की पीठ ने पूर्ववर्ती फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं की समीक्षा करते हुए इन व्यापक प्रश्नों को बड़ी पीठ के पास भेज दिया था। नौ न्यायाधीशों की पीठ न्यायिक रूप से निर्धारित परीक्षणों की संवैधानिक वैधता और धार्मिक सुधारों में विधायिका की भूमिका की जांच करेगी। इस सुनवाई में धार्मिक मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाएं निर्धारित होने की उम्मीद है।पिछले सात दशकों से भारतीय न्यायालय एक ऐसा कार्य कर रहे हैं जो विश्व में कोई अन्य न्यायालय नहीं करता। जब कोई धार्मिक समुदाय किसी विशेष प्रथा के लिए संवैधानिक संरक्षण चाहता है, तो न्यायालय सबसे पहले यह प्रश्न करते हैं कि क्या वह प्रथा धर्म का ‘अभिन्न अंग’ है। केवल वे प्रथाएं जो इस कसौटी पर खरी उतरती है। अनुच्छेद 25 और 26 के अंतर्गत संरक्षित होती हैं, जो धार्मिक आज़ादी की गारंटी देते हैं।

पहला व्यक्तियों को, दूसरा धार्मिक समुदायों को प्रत्येक मामले में सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन।देखना यह है कि नौ जज की यह बेंच इस मामले में क्या फैसला देती है ? हालांकि सुप्रीम कोर्टकी 9 जजों की बेंच के समक्ष आज चौथे दिन बहस चल रही है। क्या यह बेंच केंद्र सरकार के तर्कों को अपनाएगी या फिर महिलाओं के अधिकारों को ऊपर रखेगी। सबरीमाला विवाद केवल एक मंदिर या परंपरा का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह स्त्री के शरीर, उसकी गरिमा और उसके संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा मुद्दा है। जब धार्मिक मान्यताएं महिलाओं को उनके जैविक अस्तित्व के आधार पर बाहर करती हैं, तो यह समानता के मूल सिद्धांतों के खिलाफ खड़ा होता है। इसलिए ज़रूरत है कि आस्था और अधिकारों के बीच संतुलन बनाते हुए ऐसे सामाजिक पूर्वाग्रहों को चुनौती दी जाए, जो महिलाओं को दोयम दर्जे में रखते हैं।

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