भारत में उच्च शिक्षा को लंबे समय से सामाजिक प्रगति, उन्नति और आर्थिक सशक्तिकरण का सबसे अहम हिस्सा माना जाता रहा है। हालांकि भारत एक ऐसा देश रहा है, जहां पीढ़ियों से चली आ रही गरीबी, जातिगत भेदभाव, जागरूकता की कमी और लैंगिक असमानताएं हाशिए पर रह रहे लोगों के जीवन को सीमित करती रही हैं। लेकिन पिछले कुछ सालों से भारत में उच्च शिक्षा का विस्तार तेजी से हो रहा है। विश्वविद्यालयों और कॉलेजों की संख्या बढ़ रही है, और नामांकन दर में भी बढ़ोतरी देखी गई है। यह बदलाव बहुत ही सकारात्मक और आशाजनक लगता है, क्योंकि पढ़ेगा इंडिया तब ही तो बढ़ेगा इंडिया। इस तरह के विज्ञापन रोज़ देखने और सुनने को मिलते रहते हैं।लेकिन यह तस्वीर जितनी चमकदार दिखती है, उतनी है नहीं अगर जमीनी तौर पर इसे देखा जाए तो इसमें असमानता की कई परतें सामने आती हैं। अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय ने हाल ही में अपनी वार्षिक रिपोर्ट, ‘ द स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया, 2026’ जारी की है । यह रिपोर्ट भारत के श्रम बाजार के कई पहलुओं का विश्लेषण करती है।
द स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले चार दशकों में शैक्षिक नामांकन में तेजी से वृद्धि होने के बावजूद, 15 से 25 आयु वर्ग के लिए बेरोजगारी दर लगभग 40 फीसदी और 25 से 29 आयु वर्ग के लिए 20 फीसदी है। हालांकि भारत की युवा आबादी, 15 से 29 साल की आयु वर्ग में, 36.7 करोड़ है, जो कामकाजी आयु वर्ग की आबादी का एक तिहाई है।इस उम्र के लगभग 26.3 करोड़ लोग ऐसे हैं, जिन्हें शिक्षा का पूरा मौका नहीं मिल पाता, जबकि यही लोग आगे चलकर काम करने वाली बड़ी आबादी (वर्कफोर्स) बन सकते हैं। जबकि 28 साल की औसत उम्र के साथ, भारत विश्व स्तर पर सबसे युवा अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। लेकिन यह जनसांख्यिकीय लाभ साल 2030 के बाद कम होना शुरू हो जाएगा। इसलिए आने वाले कुछ साल बहुत अहम हैं, जिससे आने वाले दशक में रोजगार सृजन की गति बहुत ज़रूरी हो जाएगी।
द स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले चार दशकों में शैक्षिक नामांकन में तेजी से वृद्धि होने के बावजूद, 15 से 25 आयु वर्ग के लिए बेरोजगारी दर लगभग 40 फीसदी और 25 से 29 आयु वर्ग के लिए 20 फीसदी है। हालांकि भारत की युवा आबादी, 15 से 29 साल की आयु वर्ग में, 36.7 करोड़ है, जो कामकाजी आयु वर्ग की आबादी का एक तिहाई है।
उच्च शिक्षा का लोकतंत्रीकरण: प्रगति और सीमाएं
रिपोर्ट के मुताबिक,पिछले चार दशकों में शिक्षा में नामांकन में तेजी से बढ़ोतरी हुई है, जिससे भारत की 28 फीसदी उच्च शिक्षा नामांकन दर समान प्रति व्यक्ति आय वाले देशों के बराबर हो गई है। 15 से 19 साल के लड़कों में नामांकन दर 49 फीसदी से बढ़कर 73 फीसदी हो गई है। वहीं लड़कियों में यह बढ़ोतरी और भी अधिक रही है, जो कि 38 फीसदी से बढ़कर 2023 में 68 फीसदी तक पहुंच गई है। इसके अलावा 20 से 24 साल के युवाओं में भी 2004 के बाद से नामांकन में बढ़ोतरी देखी गई है।पुरुषों और महिलाओं में उच्च शिक्षा में नामांकन दर उन देशों के बराबर है जिनकी प्रति व्यक्ति आय भारत जैसी है। लेकिन इसके बावजूद जाति आधारित असमानताएं आज भी बनी हुई हैं, जो सबको बराबर अवसर नहीं देतीं।अनुसूचित जाति (एस सी) का नामांकन साल 2011 और 2023 के बीच 11 फीसदी से बढ़कर 26 फीसदी हो गया, और अनुसूचित जनजाति (एस टी ) का नामांकन 8 फीसदी से बढ़कर 21 फीसदी हो गया, हालांकि दोनों ही राष्ट्रीय औसत से नीचे हैं।
इससे साफ तौर पर देखा जा सकता है कि उच्च शिक्षा में भागीदारी बढ़ी जरूर है, लेकिन आज भी यह सभी के लिए बराबर नहीं है।इसके साथ ही रोजगार के अवसरों में कमी भी आई है। साल 2023 में 20 से 29 साल की उम्र के 63 करोड़ स्नातकों में से 11 करोड़ बेरोजगार थे। युवा पुरुष ग्रेजुएट्स में से लगभग 50 फीसदी को एक साल के अंदर कोई न कोई अस्थायी नौकरी मिल जाती है, लेकिन उनमें से केवल 7 फीसदी को ही स्थायी नौकरी मिल पाती है।रिपोर्ट में पुरुषों के नामांकन में हाल ही में आई गिरावट के बारे में भी लिखा गया है। शिक्षा में युवा पुरुषों की हिस्सेदारी साल 2017 में 38 फीसदी से घटकर साल 2024 के अंत तक 34 फीसदी हो गई। हालांकि इनमें से 72 फीसदी पुरुषों ने अपने परिवार की आय बढ़ाने की ज़रूरत के कारण शिक्षा छोड़ दी।
20 से 24 साल के युवाओं में भी 2004 के बाद से नामांकन में बढ़ोतरी देखी गई है।पुरुषों और महिलाओं में उच्च शिक्षा में नामांकन दर उन देशों के बराबर है जिनकी प्रति व्यक्ति आय भारत जैसी है। लेकिन इसके बावजूद जाति आधारित असमानताएं आज भी बनी हुई हैं, जो सबको बराबर अवसर नहीं देतीं।
निजीकरण का विस्तार, महंगी पढ़ाई और कम होते मौके
शिक्षा के क्षेत्र में जो इतना विस्तार हुआ है, वह काफी हद तक निजी संस्थानों की बढ़ती संख्या की वजह से हुआ है। उदारीकरण के बाद उच्च शिक्षा संस्थानों की संख्या 1,644 से बढ़कर 69,534 हो गई है।कॉलेजों की उपलब्धता भी बढ़ी है, क्योंकि साल 2010 में प्रति एक लाख युवाओं पर 29 कॉलेज थे, जो साल 2021 में संख्या बढ़कर 45 हो गई है।लेकिन इसके साथ शिक्षकों की कमी की समस्या भी सामने आई है। अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) के प्रति शिक्षक 15 से 20 छात्रों के मानक के मुकाबले, निजी कॉलेजों में औसतन 28 छात्र और सरकारी कॉलेजों में 47 छात्र हैं।संसाधनों की कमी के कारण शिक्षण परिणामों पर कोई असर न पड़े, इसके लिए शिक्षकों की भर्ती और रिक्त पदों को भरना बहुत जरूरी है।उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले लोगों की संख्या को प्रभावित करने वाला एक प्रमुख कारक शिक्षा की लागत है।
आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के विद्यार्थियों के लिए पाठ्यक्रमों के चयन के संबंध में यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। हालांकि उच्च शिक्षा का लोकतंत्रीकरण हुआ है, लेकिन सबसे गरीब परिवारों से आने वाले विद्यार्थियों का प्रतिशत साल 2007 में 8 फीसदी से बढ़कर साल 2017 में 15 फीसदी हो गया। लेकिन वित्तीय बाधाएं अभी भी बनी हुई हैं। चिकित्सा की डिग्री की वार्षिक लागत लगभग 97,400 रुपये है, और इंजीनियरिंग की डिग्री की लागत लगभग 1,23,000 रुपये है। ये लागतें अक्सर गरीब परिवारों के प्रति व्यक्ति वार्षिक व्यय से अधिक होती हैं, जिससे व्यावसायिक पाठ्यक्रमों तक पहुंच सीमित हो जाती है और उच्च वेतन वाली नौकरियों में असमानताएं और बढ़ जाती हैं। साल 2007 में, चिकित्सा और इंजीनियरिंग जैसे पाठ्यक्रमों में लगभग पूरी तरह से धनी परिवारों के छात्रों का ही दबदबा था। मानविकी विषयों में गरीब छात्रों की संख्या अधिक थी। साल 2017 तक भी यह प्रवृत्ति जारी रही। अब चिकित्सा और इंजीनियरिंग में गरीब परिवारों के छात्रों की संख्या में मामूली वृद्धि हुई है। इस अंतर का कारण स्पष्ट रूप से परिवार की आय है।
गरीब परिवारों से आने वाले विद्यार्थियों का प्रतिशत साल 2007 में 8 फीसदी से बढ़कर साल 2017 में 15 फीसदी हो गया। लेकिन वित्तीय बाधाएं अभी भी बनी हुई हैं। चिकित्सा की डिग्री की वार्षिक लागत लगभग 97,400 रुपये है, और इंजीनियरिंग की डिग्री की लागत लगभग 1,23,000 रुपये है।
खेती से उद्योग तक, महिलाओं की नई भूमिका और पलायन
रिपोर्ट के मुताबिक, जहां पहले युवा खेती से दूर जा रहे थे। अब कुछ हद तक यह बदलाव रुक गया है, और महिलाओं की भागीदारी खेती के क्षेत्र में बढ़ी है। पुरुषों में चाहे वे युवा हों या उम्रदराज़, दोनों ही लगभग एक जैसे नॉन-एग्रीकल्चर क्षेत्रों में काम करते हैं।लेकिन हाल के सालों में महिलाओं के मामले में बड़ा फर्क देखने को मिला है।पहले महिलाओं के काम करने के मुख्य क्षेत्र तंबाकू उद्योग, शिक्षा और स्वास्थ्य हुआ करते थे।लेकिन अब इन क्षेत्रों में युवा महिलाओं की एंट्री कम हो रही है। युवा महिलाएं अब ज्यादा मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में काम कर रही हैं, खासकर टेक्सटाइल और कपड़ा उद्योग में। वहीं बड़ी उम्र की महिलाएं ज़्यादातर कम्युनिटी और पर्सनल सर्विसेज में काम करती हैं।
पुरुषों की बात करें तो, युवा पुरुष आमतौर पर ट्रेड (व्यापार), ट्रांसपोर्ट और कंस्ट्रक्शन जैसे क्षेत्रों में काम शुरू करते हैं इन क्षेत्रों में ज़्यादातर उम्रदराज़ पुरुष भी काम करते हैं। यानी पुरुषों में काम के क्षेत्र ज्यादा नहीं बदलते, लेकिन महिलाओं में उम्र के हिसाब से काम के क्षेत्र काफी अलग-अलग हैं। गौरतलब है कि समय के साथ जाति और जेंडर के आधार पर काम का बंटवारा थोड़ा कम हुआ है। यानी पहले कुछ काम ऐसे थे जो खास तौर पर एस सी और एस टी समुदायों से जुड़े माने जाते थे,लेकिन अब इन समुदायों के युवा उसी पारंपरिक काम में ही जाने को मजबूर नहीं हैं। जबकि युवा बड़ी संख्या में काम के लिए एक राज्य से दूसरे राज्य की ओर पलायन कर रहे हैं।अनौपचारिक (इन्फॉर्मल) मजदूरी के लिए जो लोग एक जगह से दूसरी जगह काम करने जाते हैं, उनमें करीब 40 फीसदी युवा होते हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य मुख्य रूप से युवा प्रवासी भेजने वाले राज्य हैं, जबकि दिल्ली, हरियाणा और पंजाब बड़े पैमाने पर प्रवासी प्राप्त करने वाले राज्य हैं, जो क्षेत्रीय असमानताओं को संतुलित करते हैं।
पहले महिलाओं के काम करने के मुख्य क्षेत्र तंबाकू उद्योग, शिक्षा और स्वास्थ्य हुआ करते थे।लेकिन अब इन क्षेत्रों में युवा महिलाओं की एंट्री कम हो रही है। युवा महिलाएं अब ज्यादा मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में काम कर रही हैं, खासकर टेक्सटाइल और कपड़ा उद्योग में। वहीं बड़ी उम्र की महिलाएं ज़्यादातर कम्युनिटी और पर्सनल सर्विसेज में काम करती हैं।
नीतिगत सुझाव और आगे का रास्ता
भारत में बड़ी संख्या में पढ़े-लिखे और आगे बढ़ने की इच्छा रखने वाले युवा हैं। अगर इनके लिए सही तरह की नौकरी के मौके बनाए जाएं, तभी देश अपने डेमोग्राफिक डिविडेंड का सही फायदा उठा पाएगा। युवाओं की पढ़ाई और उनकी उम्मीदों के हिसाब से स्थायी नौकरियां बढ़ानी होंगी। अगर खासकर महिलाओं को ज्यादा संख्या में काम में शामिल करना है, तो और भी ज्यादा नौकरियां बढ़ाने की जरूरत है। स्कूल और कॉलेज से निकलने के बाद नौकरी तक पहुंचना आसान होना चाहिए।इसके लिए ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जिससे युवाओं को सही जानकारी, ट्रेनिंग और मौके मिल सकें ताकि वे आसानी से काम शुरू कर सकें। इसके साथ ही नेशनल करियर सर्विस (एन सी एस) को मजबूत बनाना जरूरी है। इससे नौकरी ढूंढने वाले युवाओं और कंपनियों के बीच बेहतर संपर्क बनेगा, और नौकरी मिलने की प्रक्रिया आसान हो सकेगी । इसके अलावा सोशल सिक्योरिटी को बढ़ाया जाए, ताकि खासकर माइग्रेंट युवा भी सुरक्षित और बेहतर परिस्थितियों में काम कर सकें।
नीतियों का ध्यान सिर्फ नौकरी दिलाने तक सीमित न हो, बल्कि यह भी सुनिश्चित करे कि युवा असंगठित क्षेत्र से संगठित क्षेत्र की ओर बढ़ सकें।हर युवा काम के लिए बाहर नहीं जा सकता, इसलिए जरूरी है कि स्थानीय स्तर पर ही अच्छे और सम्मानजनक रोजगार के मौके मिलें। इससे ही सुधार की प्रक्रिया की तरफ एक कदम उठाया जा सकता है । रिपोर्ट यह साफ दिखाती है कि भारत में उच्च शिक्षा का विस्तार जरूर हुआ है, लेकिन इसके साथ बराबरी और रोजगार के अवसर नहीं बढ़ पाए हैं। आज ज्यादा युवा पढ़-लिख रहे हैं, लेकिन उन्हें स्थायी और सम्मानजनक नौकरी मिलना अब भी मुश्किल है। वहीं जाति, जेन्डर और आर्थिक स्थिति के आधार पर असमानताएं अभी भी बनी हुई हैं, जिससे सभी को समान अवसर नहीं मिल पाते। इसलिए जरूरत है कि शिक्षा को केवल डिग्री तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उसे रोजगार, कौशल और समान अवसरों से जोड़ा जाए। तभी यह बढ़ती युवा आबादी देश की ताकत बन सकेगी ।

