इतिहास रति बार्थोलोम्यू: भारतीय रंगमंच में स्त्री दृष्टि और प्रतिरोध की सशक्त आवाज़| #IndianWomenInHistory

रति बार्थोलोम्यू: भारतीय रंगमंच में स्त्री दृष्टि और प्रतिरोध की सशक्त आवाज़| #IndianWomenInHistory

थिएटर परंपरा को मज़बूती देने वालों में रति बार्थोलोम्यू का नाम बहुत सम्मान के साथ लिया जाता है। वह एक निर्देशक, अभिनेत्री, नाटककार और बुद्धिजीवी रंगमंच कलाकार थीं ।

भारतीय थिएटर केवल मनोरंजन का माध्यम ही नहीं है, बल्कि समाज यह की रूढ़िवादी सच्चाइयों को सामने लाने का एक मजबूत माध्यम भी है। हालांकि इसमें महिलाओं का जगह बना पाना काफी संघर्षपूर्ण रहा है। इसके बावजूद भी बहुत सी ऐसी महिलाएं रही हैं, जिन्होंने इस क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई। इस थिएटर परंपरा को मज़बूती देने वालों में रति बार्थोलोम्यू का नाम बहुत सम्मान के साथ लिया जाता है। वह एक निर्देशक, अभिनेत्री, नाटककार और बुद्धिजीवी रंगमंच कलाकार थीं ।

उन्होंने इस मंच को मनोरंजन की सीमाओं से बाहर निकालकर समाज की जटिल सच्चाइयों, महिलाओं के अनुभवों और पितृसत्ता की रुढ़िवादी धारणाओं पर सवाल उठाने का माध्यम बनाया। उन्होंने अपने नाटकों और कार्यक्रमों के माध्यम से हाशिए पर रह रही, उन आवाज़ों को सामने रखा, जिन्हें अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। उनका जीवन हर उस महिला के लिए एक प्रेरणा का स्रोत है, जो अपनी कला के माध्यम से रूढ़िवादी परंपराओं को तोडकर समाज में बदलाव लाना चाहती हैं।  

थिएटर परंपरा को मज़बूती देने वालों में रति बार्थोलोम्यू का नाम बहुत सम्मान के साथ लिया जाता है। वह एक निर्देशक, अभिनेत्री, नाटककार और बुद्धिजीवी रंगमंच कलाकार थीं ।

शुरुआती जीवन और रंगमंच से लगाव

रति बार्थोलोम्यू का जन्म जन्म 4 जनवरी 1927 को कलकत्ता में हुआ था। उनकी माता का नाम सुप्रिति था और उनके पिता का नाम अत्तर चंद बत्रा था, जो कि कलकत्ता उच्च न्यायालय में वकालत किया  करते थे। लेकिन वह अपने परिवार के साथ अपने पैतृक स्थान सरगोधा जो कि अब पाकिस्तान में है वहां लौट गए। रति ने लाहौर के किन्नर्ड कॉलेज में पढाई की। भारत विभाजन के बाद उनके परिवार को मजबूर होकर विस्थापित होना पड़ा था और इसके बाद उन्हें एक शरणार्थी के तौर पर भारत आना पड़ा। शरणार्थी के रूप में दिल्ली में बसने के लिए मजबूर होकर, उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित सेंट स्टीफंस कॉलेज में पढ़ाई की। पढ़ाई के दौरान, उनकी मुलाकात रिचर्ड बार्थोलोम्यू से हुई, जो खुद भी एक शरणार्थी थे । उनका परिवार दुसरे विश्व युद्ध के दौरान जापान की बढ़ती सेना के कारण बर्मा से भागकर भारत आया था। 

साल 1940 के दशक में उन दोनों ने शादी कर ली। द वायर में छपे एक लेख के मुताबिक, रति का व्यक्तित्व बहुत ही प्रभावशाली था । वह बड़ी बिंदी लगाया करती थी और अक्सर पारंपरिक साड़ियां पहनती थीं और बाल अक्सर फ्रेंच बन में बंधे होते थे और उनकी आवाज़ गहरी और स्पष्ट थी। शादी के बाद रति ने अपना काम जारी रखा, उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के इंद्रप्रस्थ कॉलेज में अध्यापन कार्य किया, लेकिन उनका असली जुड़ाव रंगमंच से था। एक रंगमंच कलाकार के रूप में उन्होंने भारतीय थिएटर को नई सोच और नई दिशा देने का महत्वपूर्ण काम किया। 

उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के इंद्रप्रस्थ कॉलेज में अध्यापन कार्य किया, लेकिन उनका असली जुड़ाव रंगमंच से था। एक रंगमंच कलाकार के रूप में उन्होंने भारतीय थिएटर को नई सोच और नई दिशा देने का महत्वपूर्ण काम किया। 

रति बार्थोलोम्यू की दृष्टि और योगदान

द वायर में छपे एक लेख के मुताबिक, उन्होंने त्रिपुरारी शर्मा के लिखे हुए बहू नाटक का निर्देशन किया और इसे खुले मैदान में मंचित किया। इस नाटक के मंच पर एक ग्रामीण पंजाबी परिवार की ज़िंदगी को सादगी से दिखाया गया था अनाज, भूसा, गोबर, मिट्टी और पीतल के बर्तन, यहां तक कि चरखा भी। उंचे पेड़ों और खुले आसमान के बीच यह दृश्य बहुत सुंदर और प्रभावशाली लगता था। रति की बहू एक मजबूत चरित्र थी, जो नाटक में अपना ससुराल छोड़ देती है। वह कई दूसरी प्रस्तुतियों में दिखने वाली आत्म-दया से अलग थी। रति हमेशा कहती थीं कि हर नाटक का अपना एक नज़रिया होता है और यही उसकी राजनीति होती है। उनके अनुसार यह राजनीति केवल बातचीत से नहीं, बल्कि पूरी प्रस्तुति और नाट्य भाषा से सामने आती है। उनका मानना था कि हर नाटक किसी न किसी रूप में राजनीतिक होता है।

उन्होंने कई नाटकों में काम किया उनमें से एक था, ‘अक्स पहेली’ जो त्रिपुरारी शर्मा ने लिखा था और रति के साथ मिलकर निर्देशन भी किया। इसका उदेश्य सीता, कैकेयी और लैला जैसी प्रतीकात्मक छवियों के माध्यम से समाज में बनी रूढ़ियों को सामने लाना था। यह नाटक दिल्ली के आगा खान हॉल में मीडिया में महिलाओं के चित्रण के लिए गठित संस्था के सहयोग से मंचित किया गया था। यह संस्था महिला आंदोलन की प्रमुख हस्तियों जैसे कमला भसीन और बीना अग्रवाल की पहल है। इसके अलावा रति को थिएटर करना बहुत पसंद था। वह छोटे-बड़े हर काम को लेकर उत्साहित रहती थीं और कई परियोजनाओं में उनकी अहम भूमिका होती थी, क्योंकि वह हर प्रयास को समझकर दिल से उसमें योगदान देती थीं।

उन्होंने कई नाटकों में काम किया उनमें से एक था, ‘अक्स पहेली’ जो त्रिपुरारी शर्मा ने लिखा था और रति के साथ मिलकर निर्देशन भी किया। इसका उदेश्य सीता, कैकेयी और लैला जैसी प्रतीकात्मक छवियों के माध्यम से समाज में बनी रूढ़ियों को सामने लाना था।

भारतीय रंगमंच में सेंसरशिप के खिलाफ संघर्ष

साल 1964 में वह दिल्ली के पहले द्विभाषी थिएटर समूह यात्री की सह-संस्थापक थी और साल 1969 में स्थापित दिशान्तर की उपाध्यक्ष के रूप में, वह भारत के रंगमंच जगत की जानी-मानी हस्तियों से सजे नाटकों के केंद्र में थीं। राष्ट्रीय नाटक विद्यालय (एनएसडी)  निदेशक के नेतृत्व के समय से ही उन्हें राष्ट्रीय नाटक विद्यालय में अतिथि शिक्षक और परीक्षक के रूप में आमंत्रित किया जाता रहा है। न्यूज़ क्लिक में छपी एक खबर के मुताबिक, साल 1965 में उन्होंने थॉट नामक एक प्रकाशन में मोहन महर्षि के निर्देशित और एनएसडी के स्टूडियो थिएटर में प्रदर्शित आद्या रंगाचारी के नाटक ‘सुनो जन्मजय’ के पहले हिंदी मंचन की समीक्षा लिखी, जिसमें उन्होंने रंगमंच के नए कलाकारों की गढ़ी गई नई शैलियों और नई भाषाओं के आने की बात की। साल 1970 के दशक के उत्तरार्ध से ही वह नुक्कड़ रंगमंच में सक्रिय थीं। उन्होंने थिएटर यूनियन के नाटक ‘टोबा टेक सिंह’ के निर्माण में सहयोग किया और उसे आकार देने में मदद की, जिसका मंचन भारत के कई शहरों में हुआ। इसके अलावा उन्होंने पाकिस्तान और बांग्लादेश की यात्रा की, जहां उन्होंने कार्यकर्ता समूहों के साथ काम किया, कार्यशालाओं का नेतृत्व किया और नाटकों का निर्देशन किया।

 साल 1989 में सफदर हाशमी मेमोरियल ट्रस्ट ( एसएएचएम्एटी ) की सह-संस्थापक के रूप में रति एक नए और अधिक सक्रिय दौर में पहुंचीं। उन्होंने एसएएचएम्एटी के अभियान के तहत आयोजित पहले अखिल भारतीय स्ट्रीट थिएटर महोत्सव ‘चौराहा’ की योजना बनाने में अहम भूमिका निभाई। यह महोत्सव औपनिवेशिक दौर के कठोर नाट्य प्रदर्शन अधिनियम के खिलाफ था, जिसका इस्तेमाल अभिव्यक्ति की आज़ादी को दबाने के लिए किया जाता था। उस समय उनका ‘नाट्य प्रदर्शन अधिनियम पर: रंगमंच में सेंसरशिप’ नामक निबंध प्रकाशित हुआ था। इस निबंध ने रंगमंच में सेंसरशिप के मुद्दे पर एसएएचएम्एटी की भूमिका को सामने लाया और इस विषय पर चर्चा को आगे बढ़ाया।

उन्होंने एसएएचएम्एटी के अभियान के तहत आयोजित पहले अखिल भारतीय स्ट्रीट थिएटर महोत्सव ‘चौराहा’ की योजना बनाने में अहम भूमिका निभाई। यह महोत्सव औपनिवेशिक दौर के कठोर नाट्य प्रदर्शन अधिनियम के खिलाफ था, जिसका इस्तेमाल अभिव्यक्ति की आज़ादी को दबाने के लिए किया जाता था।

इसके साथ ही उन्होंने अनामिका हक्सर के नाटक राज दर्पण के लिए नाट्य प्रदर्शन अधिनियम पर शोध किया। यह नाटक इसी अधिनियम पर आधारित था और इसका मंचन 1994 में पहले एनएसडी के छात्रों नें और बाद में एनएसडी रिपर्टरी कंपनी ने किया। इसके अलावा वे हर विद्यार्थी और कलाकार के काम में रुचि रखती थीं और उन्हें प्रेरित करती थीं, उनका मार्गदर्शन करती थीं और उन्हें ऐसे नाटकों की अवधारणा के नए तरीके सोचने के लिए प्रोत्साहित करती थीं जो उनके परिवेश से मेल खाते हों। वह अपने पुरे जीवन इससे जुड़े कार्यों में समर्पित रहीं, हालांकि साल 2021 में उनकी मृत्यु हो गई। लेकिन भारतीय थिएटर के क्षेत्र में और कला प्रेमियों के लिए वह भी न भुलाई जाने वाली याद की तरह हमेशा उनके दिलों में जीवित रहेंगी। 

रति बार्थोलोम्यू ने भारतीय रंगमंच को नई सोच और नई दिशा दी। उन्होंने थिएटर को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाज की रूढ़िवादी मानसिकता पर सवाल उठाने और बदलाव की आवाज़ बनाने का माध्यम भी बनाया। महिलाओं के अनुभव, हाशिए की आवाज़ें और अभिव्यक्ति की आज़ादी उनके काम के केंद्र में रहीं। इसके अलावा सेंसरशिप के खिलाफ उनका संघर्ष, युवा कलाकारों का मार्गदर्शन और नाटकों में उनका स्पष्ट राजनीतिक नजरिया उन्हें भारतीय थिएटर की एक यादगार और प्रेरक शख्सियत बनाती है। उनका योगदान आज भी रंगमंच और कला प्रेमियों को प्रेरित करता है।

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