संस्कृतिसिनेमा ‘परफेक्ट फैमिली’: आदर्श परिवार की परतें खोलती एक संवेदनशील कहानी 

‘परफेक्ट फैमिली’: आदर्श परिवार की परतें खोलती एक संवेदनशील कहानी 

साल 2025 में यूट्यूब पर रिलीज हुई वेब सीरीज 'परफेक्ट फैमिली’ आठ एपिसोड की यह श्रृंखला पूरी तरह से एक थेरेपी सेशन के इर्द-गिर्द सिमटी हुई है। यह सीरीज इसलिए खास है, क्योंकि यह आदर्श परिवार के उस खोल को उतार फेंकती है, जिसे हम समाज के सामने ओढ़े रहते हैं।

भारतीय समाज में कथित आदर्श परिवार की तस्वीर अक्सर मुस्कुराते चेहरों, फ़र्ज़ों और चुपचाप किए गए समझौतों के नाम से जानी जाती है। घर के भीतर चल रहे तनाव, अनकहा दर्द और मानसिक संघर्षों को अक्सर घर की बात कहकर दबा दिया जाता है। लेकिन इन्हीं दबे हुए सवालों और अनदेखे दर्द को सामने लाती है। साल 2025 में यूट्यूब पर रिलीज हुई वेब सीरीज ‘परफेक्ट फैमिली’ आठ एपिसोड की यह श्रृंखला पूरी तरह से एक थेरेपी सेशन के इर्द-गिर्द सिमटी हुई है। यह सीरीज इसलिए खास है, क्योंकि यह आदर्श परिवार के उस खोल को उतार फेंकती है, जिसे हम समाज के सामने ओढ़े रहते हैं। पंकज त्रिपाठी के ‘जार प्रोडक्शन’ की यह पहली सीरीज मिडिल क्लास परिवार की रोजमर्रा की जद्दोजहद और आंतरिक संघर्षों को बेहद जीवंत ढंग से पेश करती है। सीरीज की रफ्तार भले ही धीमी है।

 लेकिन कलाकारों का सधा हुआ अभिनय आपको अंत तक बांधे रखता है। यह सिर्फ एक मनोरंजन का जरिया नहीं है, बल्कि एक फुल पैकेज है, जिसमें घर के छोटे-मोटे झगड़ों से लेकर महिलाओं के नजरअंदाज किए हुए संघर्षों को दिखाया गया है।इस सीरीज का सबसे मजबूत पक्ष मानसिक स्वास्थ्य और जेनरेशनल ट्रॉमा की बारीकियों को सिनेमा तक लाना है, जो दिखाती है कि कैसे इसकी शुरुआत बचपन की उन छोटी बातों से होती है, जिन्हें हम नजरंदाज कर देते हैं और धीरे -धीरे बातचीत की कमी समय के साथ एक जहरीला चक्र बन जाती है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी खुद के अलावा परिवार पर असर बनाती रहती है। फिल्म कई सामाजिक रूढ़ियों को समाने लाती है। कई बार आप छोटी बच्ची धानी की नजर से उस ट्रॉमा भरे माहौल को जीते हैं, तो कभी धानी की मां के नजरअंदाज किए हुए दर्द को महसूस करते हैं । तो कभी कहानी के एक किरदार विष्णु का फ्रस्ट्रेशन आपका अपना हो जाता है, फिल्म इतनी जुड़ी हुई (रिलेटेबल) लगती है कि आखिर में हमें महसूस होने लगता है कि सीरीज़ में दिखाया गया हर थेरेपी सेशन जितना बाकी किरदारों के लिए ज़रूरी है, उतना ही हमारे लिए भी।

साल 2025 में यूट्यूब पर रिलीज हुई वेब सीरीज ‘परफेक्ट फैमिली’ आठ एपिसोड की यह श्रृंखला पूरी तरह से एक थेरेपी सेशन के इर्द-गिर्द सिमटी हुई है। यह सीरीज इसलिए खास है, क्योंकि यह आदर्श परिवार के उस खोल को उतार फेंकती है, जिसे हम समाज के सामने ओढ़े रहते हैं।

आदर्श परिवार के मुखौटे के पीछे छुपा ट्रॉमा

सीरीज की शुरुआत किसी रोमांटिक सीन या हीरो की एंट्री से नहीं, बल्कि मिडिल क्लास लोगों के घरों के शोर शराबे से होती है। अब सवाल यह उठता है कि, इसमें नया क्या है? नया यह है कि यह सीरीज इस शोर शराबे की शुरुआती जमीन पर बात करती है, और उससे होने वाले असर की बारीकियों को संवेदनशील तरीके से हमारे सामने रखती है। गुलशन देवैया ने विष्णु का किरदार निभाया है। विष्णु एक ऐसा इंसान है जो हमेशा अपनी क्षमताओं से ऊपर जाकर दूसरों की उम्मीदों को पूरा करने वाली मशीन बना चुका है। वह घर की रोजमर्रा के झगड़ों से दूर होने के लिए खुद का नया घर खरीदना चाहता था। घर खरीदने के लिए उसके पास पर्याप्त पैसे नहीं थे । इसलिए उसने प्रमोशन का विकल्प खोजने की कोशिश की, लेकिन तमाम मेहनतों के बावजूद भी उसे प्रमोशन नहीं मिल पाया। इसके बाद वह खुद को दुनिया का सबसे असफल इंसान मानने लगा। परिवार के ताने, झगड़े विष्णु पर इस तरह से अपना दबाव बनाते हैं, कि उसे कई बार आत्महत्या से मौत के ख़्याल आने लगते हैं। यह ख्याल भले ही नया हो पर विष्णु की कथित हार बिल्कुल नई नहीं है। इस हार का कनेक्शन उसके बचपन से जुड़ा हुआ था, जब वह अपने पिता कलाकार मनोज पाहवा की उम्मीदों पर फिट नहीं बैठ पाया तो उसे ताने मिले, बुली किया गया। यहां तक कि कई दफा उसे एक मैस्कुलिन पुरुष की श्रेणी में रखने से इनकार किया गया।

मनोज के पिता का रोल निभाने वाले मनोज पाहवा , जिनका रवैया एकदम सख्त दिखाया गया है । वह अपने परिवार को परफेक्ट आदर्शवादी फैमिली समझते हैं । जबकि परिवार के हर एक सदस्य को अपने तरीके से चलाना अपना हक समझते हैं और इसे एक आदर्शवादी फैमिली की निशानी मानते हैं । हालांकि उनका व्यक्तित्व काफ़ी कठोर दिखाई देता है, लेकिन उनका ट्रॉमा बचपन से जुड़ा हुआ है। जिस तरह वे विष्णु पर दबाव बनाते हैं, उसी तरह उनके पिता ने भी उनसे कई उम्मीदें रखी थीं। उन उम्मीदों पर खरा न उतर पाने की क़ीमत उन्हें बचपन से ही शारीरिक और मानसिक यातनाओं के रूप में चुकानी पड़ी। वह खुद जहां -जहां  सामाजिक रूप से असफल हुए। वे सारी अधूरी उम्मीदें अपने बेटे विष्णु को सौंपते चले गए, ताकि सफलता की जिस परिभाषा पर वे खुद खरे उतरना चाहते थे, उसी ढांचे में उनका बेटा भी फिट हो जाए। यह एक ऐसा चक्र है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलता आ रहा है। अब वही दबाव विष्णु अपने व्यवहार के माध्यम से, जाने-अनजाने अपने बच्चों को सौंप रहा है और इस चक्र की सबसे बड़ी शिकार उसकी बेटी धानी बन रही थी। यह घटनाएं बेहद सामान्य लग सकती हैं, क्योंकि यह आम समाज में रोजाना तौर पर होता है।

परिवार के ताने, झगड़े विष्णु पर इस तरह से अपना दबाव बनाते हैं, कि उसे कई बार आत्महत्या से मौत के ख़्याल आने लगते हैं। यह ख्याल भले ही नया हो पर विष्णु की कथित हार बिल्कुल नई नहीं है। इस हार का कनेक्शन उसके बचपन से जुड़ा हुआ था, जब वह अपने पिता कलाकार मनोज पाहवा की उम्मीदों पर फिट नहीं बैठ पाया तो उसे ताने मिले, बुली किया गया।

महिलाओं की चुप्पी पर टिका हुआ आदर्श परिवार  

धानी अपनी मां नीति से पूछती है कि तुम हमेशा चुप क्यों रहती हो मां ? कई बार यह संवाद सवाल लगता है, तो कई बार जैसे आदर्शवादी परिवारों  की नींव में सालों से दबी हुई चुप्पी। अगर घर की महिलाओं ने इस बात का जवाब देना शुरू कर दिया, तो परफेक्ट फैमिली की नींव ढह जाएगी। सीरीज में कमला ( सीमा पाहवा) अपनी बेटी को नसीहत देती हैं कि घर बचाने के लिए हर बात बोलना ज़रूरी नहीं होता है। यह नसीहत उस बेटी को दी जा रही थी, जिसकी शादी उसकी मर्जी के खिलाफ की गई थी। जब वह अपने घर में वापस लौट आई थी और पिता के बिजनेस में हाथ बंटाने लगी थी, उसके बावजूद भी उसे अपने जीवन के निजी फैसले लेने के लिए इजाजत की जरूरत पडती है। समय -समय पर उसे उसके पिता और मां के जरिए यह सुनने को मिल ही जाता है, कि बेटियां ससुराल में ही अच्छी लगती हैं और शादी होने के बाद वापस आने का विकल्प बिल्कुल भी नहीं है चाहे वह उस रिश्ते में खुश हो या न हो।

 थेरेपिस्ट नेहा धूपिया कमला से उनके बारे में सवाल पूछती है कि वो कौन से काम हैं, जो आपको अपने लिए करना बेहद पसंद है या जिसे करके आपको खुशी मिलती है। इस जवाब के लिए उन्हें 2 दिन का समय दिया जाता है। लेकिन कमला इस सवाल का जवाब नहीं दे पाती है। उसकी यह चुप्पी दरअसल भारत की अनगिनत घरेलू महिलाओं की आवाज़ है, जिन पर जाने-अनजाने परिवार की ज़िम्मेदारियां डाल दी जाती हैं। यहां तक कि उनसे उम्मीद की जाती है कि वे हर सदस्य को खुद से ऊपर रखें, और जब वे यह सब सफलता से निभा लेती हैं, तो समय-समय पर उन्हें आदर्श बहू या माँ का तमगा थमा दिया जाता है। इसी प्रक्रिया में महिलाओं की अपनी इच्छाएं धीरे-धीरे परिवार की उम्मीदों के बीच कहीं खो सी जाती हैं।

कमला ( सीमा पाहवा) अपनी बेटी को नसीहत देती हैं कि घर बचाने के लिए हर बात बोलना ज़रूरी नहीं होता है। यह नसीहत उस बेटी को दी जा रही थी, जिसकी शादी उसकी मर्जी के खिलाफ की गई थी।

बंद दरवाज़ों से थेरेपी तक का सफर 

इसकी शुरुआत बचपन से होती है, कमला की बहु की कहानी इस बात को तरीके से पूरा करती है। नीति का मानसिक तनाव शारीरिक बन चुका था, उसका इकलौता कारण यह था, कि भरे पूरे परिवार में भी वह खुद को अकेला महसूस करती थी। वह अपनी कसक और शिकायतें अपने भीतर ही दबाए रखती थी और इस तनाव को सहने का कोई न कोई तरीका ढूंढ लेती थी। इसके तार भी उसके बचपन से जुड़े हैं। उसका चिड़चिड़ापन, जो उसने अपनी माँ से पाया, अब वही वह जाने-अनजाने में अपनी बेटी धानी को सौंप रही है। इसका असर धानी में भी दिखना शुरू हो गया है। वह एक दिन किसी साथ पढ़ने वाले बच्चे को चोट पहुंचा देती है, तब पता चलता है कि धानी परिवार के इस माहौल के कारण मानसिक रूप से बीमार है।बच्चे अक्सर अपनी माँ के बहुत करीब होते हैं। लेकिन नीति के पास कोई नहीं था।

धानी में हो रहे नकारात्मक बदलावों और विष्णु के घर छोड़ने के फैसले के लिए बार-बार नीति को ही जिम्मेदार ठहराया जाता था। ऐसे में नीति के हिस्से सिर्फ चुप्पी आती है। थेरेपी इस चुप्पी को तोड़ने का काम करती है। यह लोगों के रवैये से मन पर पड़ने वाले असर और उनसे होने वाले मानसिक बदलावों पर खुलकर बात करने की जगह देती है।घर की बात घर में ही रहनी चाहिए। इसी सोच ने बरसों से हमारे परिवारों के भीतर घुटन और चुप्पी की संस्कृति को पाला है। वेब सीरीज ‘परफेक्ट फैमिली’ इसी मिथक को तोड़ती है और दिखाती है, कि कभी-कभी घर के बंद दरवाजों के पीछे दबी चीखों को सुनने के लिए एक ‘थेरेपिस्ट’ की जरूरत होती है। यह हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि हम जिस ममता और त्याग का महिमामंडन करते हैं। वह वाकई में महिलाओं को चुप रखने का हथियार है।

फिल्म यह साफ तौर पर बताती है, कि जब तक घर की महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य और उनकी व्यक्तिगत इच्छाओं को नजरअंदाज किया जाता रहेगा, तब तक कोई भी परिवार परफेक्ट नहीं कहला सकता। फिल्म का अंतिम संवाद सीरीज के सार को और स्पष्ट करता है कि परफेक्ट फैमिली जैसी कोई चीज़ नहीं होती। आज के दौर में यह सीरीज मानसिक स्वास्थ्य को लेकर समाज के संकुचित नजरिए को आईना दिखाती है। यह स्पष्ट करती है कि मानसिक बीमारी भी शरीर की चोट की तरह सामान्य हैं। जिस तरह हम बुखार या चोट लगने पर बिना किसी शर्म के दवा लेते हैं, ठीक उसी तरह मानसिक तनाव या आघात के लिए मनोचिकित्सक की सलाह लेना या थेरेपी लेना पूरी तरह सामान्य है।

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